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किताबें मिलीं: गांव मेरा देस, मिस काउ : ए लव स्टोरी

कमल कुमार मूलत: स्त्रीवादी रचनाकार हैं। उनमें पत्रकारीय चेतना भी तीक्ष्ण है, इसलिए उनकी रचनाओं का तेवर तीखा और दोÞटूक होता है। अनलंकारिक, सीधा और बेधक। उनकी कविताओं का यह नया संकलन पांच खंडों में विभक्त है- मरणधर्मा, तुमसे है सवाल, नई इबारत, इंद्रधनुष और प्रतिध्वनि।

Author February 25, 2018 5:25 AM
मिस काउ : ए लव स्टोरी किताब का कवर पेज।

मिस काउ : ए लव स्टोरी

सुधीश पचौरी की पहचान एक गंभीर आलोचक और मीडिया विमर्शकार के रूप में है। एक तरफ जहां वे साहित्य के गंभीर विषयों पर बारीकी से अपनी राय रखते हैं, वहीं दूसरी तरफ मीडिया की खूबियों-खामियों पर भी उनकी पैनी नजर रहती है। देश के राजनीतिक माहौल पर भी लगातार बहुत स्पष्ट राय रखते रहते हैं। अब उनका एक नया रूप सामने आया है- कथाकार का, किस्सागो का। उनकी किताब ‘मिस काउ : ए लव स्टोरी’ इस बात की तस्दीक करती है कि वे न सिर्फ अच्छे कथाकार और व्यंग्यकार हैं, बल्कि कथा में किस तरह विमर्शों को पिरोया जा सकता है, किस तरह अपने समय की घटनाओं पर सवाल उठाया जा सकता है, वे इसकी भी राह देते हैं। यह किताब इस बात का प्रमाण है कि जो बातें सीधे-सीधे लेखों के जरिए उठाने पर प्रभाव नहीं छोड़ पातीं, उन्हें कथा-सूत्र में गूंध कर किस तरह धार दी जा सकती है। कथा में मुसलसल व्यंग्य का पुट बना हुआ है, जो कथा को नीरस होने से तो बचाता ही है, पर कथन को और तीखा बनाने में भी मदद करता है। सुधीश पचौरी का ‘विट’ हमारे समय की बड़ी विडंबनाओं पर बड़े चुटीले ढंग से चोट करता चलता है। यह एक छोटी-सी ‘लव स्टोरी’ है जो बहुत-सी ‘हेट स्टोरीज’ के बरक्स जन्म लेती है। यहां कुछ कलिकथा है, कुछ कल्कि अवतार कथा है और यहां मैकाले भी है। इस आख्यान का नायक ‘आत्मा’ एक हिंदू चित्त है, जो त्रिधा-विभक्त है, जिसके नाम अनेक ‘कीर्तिमान’ दर्ज हैं। नाना उपाख्यानों के बीच जिज्ञासावश वह अपने गुरुदेव से अपना ‘संशय’ प्रकट कर बैठता है और ‘संशयात्मा विनश्यति’ के शाप का भागी बनता है। गुरुदेव के शाप से बचाती है इस कहानी की नायिका ‘मिस काउ’। यह एक जटिल उत्तर-आधुनिक विमर्शात्मक आख्यान है जो कल्पना की शुद्ध आवारगी से उपजा है। इसका नायक अपनी तमाम खूबियों और दुष्टताओं के बावजूद लेखक की हमदर्दी का पात्र है।
मिस काउ : ए लव स्टोरी : सुधीश पचौरी, वाणी प्रकाशन, 4695, 21- ए, दरियागंज, नई दिल्ली; 195 रुपए।

गांव मेरा देस

वरिष्ठ आलोचक एवं लेखक श्रीभगवान सिंह की यह कृति उनके आलोचक नहीं, ललित निबंधकार ने सृजित की है। जाहिर है, यहां स्मृतियों का महत्त्वपूर्ण स्थान है, अत: उनका संस्मरणकार भी चुपके से साथ हो लिया है। जिस गांव में हमारा समय विशेष गुजरा होता है, उसकी स्मृतियां कभी खत्म नहीं होतीं। यह किताब एक तरह से गांव के बदलते स्वरूप का समाज-वैज्ञानिक अध्ययन है। यहां आंकड़े नहीं हैं, स्मृतियां हैं, पर यह न तो महज किस्सागोई है और न आत्मालाप या विगत का श्रेष्ठताबोध। स्मृतियों के सहारे, कथा शैली में पुराने के बरक्स नए को रख कर देखने-परखने का प्रयास है। इसे निरी आत्मकथा भी नहीं कह सकते, क्योंकि बार-बार इसमें गांधी-विचारों के माध्यम से स्थितियों को व्याख्यायित-विश्लेषित करने का प्रयास है। इसी तरह यह एक समाज-वैज्ञानिक अध्ययन बन जाता है। श्रीभगवान सिंह के इस आख्यान में उनसे आत्मीय रस बरसता है। इसकी रचनात्मक उठान ही ऐसी है कि सिवान जिले का निखतीकलां नामक गांव भारतीय ग्राम की आत्मा का प्रतिनिधि बन जाता है। इसलिए ही वह ‘देस’ हुआ है। लेखक ने इस ‘देस’ का समाज वैज्ञानिक अध्ययन इतनी संलग्नता से किया है कि पाठक इसके साथ-साथ अपने-अपने गांवों की स्मृतियों में डूब-उबर सकते हैं।

लेखक की गांधीवादी दृष्टि उनके अध्ययन का आधार बनी है, जिसके चलते यह एक भावुक स्मृति आख्यान न रह कर परिवर्तित होते गांव का सजग विश्लेषण बन गया है। बचपन, शिक्षा, समाज व्यवहार, गांव-प्रबंधन, मनोविनोद, पर्व-त्योहार और संयुक्त परिवार ही नहीं, याद रहे लोग भी पुस्तक को जीवंत बनाते हैं। लेखक की नजर गांवों की वर्तमान दशा और दिशा पर तो है ही, साथ ही वह हिंदी में एक ऐसे विरल गद्य की रचना करते हैं, जो विचार की अनंत संभावनाएं खोलता है। सही मायनों में एक नवीन विधा का सृजन है ‘गांव मेरा देस’। आज जिस तरह विकास और बदलाव के नारों के साथ गांवों को स्मार्ट बनाने की कोशिशें चल रही हैं, उस पर तंज कसते हुए श्रीभगवान सिंह अफसोस जाहिर करते हैं कि ‘काश, हमारा शिक्षित वर्ग इस देश की संपन्नता का आधार स्तंभ रहे इस गांव-समाज, इस कृषक समुदाय की वास्तविकता को समझ पाता! किंतु उन्हें भारत की हर वस्तु आदिमकालीन, अपरिष्कृत, संकीर्ण, अंधविश्वासपूर्ण प्रतीत होती है, इसलिए आधुनिकता और अब भूमंडलीकरण के इन दीवानों में कोई भारत को अमेरिका जैसा बनाना चाहता है, तो कोई चीन या जापान जैसा, लेकिन भारत तभी भारत के रूप में अपनी पहचान रख सकेगा, जब उसके गांवों को उसके पारंपरिक उद्योग-शिल्प, पारंपरिक खेती-उद्योग वापस किए जा सकें।’
गांव मेरा देस : श्रीभगवान सिंह, सामयिक प्रकाशन, 3320-21, जटवाड़ा, नेताजी सुभाष मार्ग, दरियागंज, नई दिल्ली; 500 रुपए।

तुमसे है सवाल

कमल कुमार मूलत: स्त्रीवादी रचनाकार हैं। उनमें पत्रकारीय चेतना भी तीक्ष्ण है, इसलिए उनकी रचनाओं का तेवर तीखा और दोÞटूक होता है। अनलंकारिक, सीधा और बेधक। उनकी कविताओं का यह नया संकलन पांच खंडों में विभक्त है- मरणधर्मा, तुमसे है सवाल, नई इबारत, इंद्रधनुष और प्रतिध्वनि। पर इनमें संकलित कविताओं का रंग एक है। कमल कुमार कविताओं के जरिए विमर्श रचती हैं, विमर्शों को आगे बढ़ाती हैं। इसलिए कई कविताओं में विमर्शपरक शब्द और विचार सीधे-सीधे प्रयुक्त हुए हैं। कविताएं सवाल करती हैं- परंपराओं, मान्यताओं, मिथकों और विमर्शों पर भी। इसलिए इनका स्वर कई जगह राजनीतिक हो उठा है।

‘मरणधर्मा’ खंड की सारी कविताएं दार्शनिक प्रश्नों से जूझती हैं, उनके पेंचों को खोलने और उन्हें सुलझाने का प्रयास करती हैं। वहां केंद्र में स्त्री होते हुए भी मूल रूप से मानुस सत्ता है। स्त्री इन कविताओं में अपनी इयत्ता, अपनी अस्मिता को उच्चावस्था में पहचानने, स्थापित करने का प्रयास करती है। दूसरे खंड ‘तुमसे है सवाल’ में संकलित कविताएं महापुरुषों, मिथकीय चरित्रों, समाज और धर्म के तथाकथित नायकों से सवाल करती हैं। उनमें सीता, द्रौपदी, गांधारी, तुलसी, भीष्म पितामह यहां तक कि शहरी विकास मंत्री भी शामिल हैं। इनसे सीधे सवाल हैं, धिक्कार और उनकी गलतियों पर फटकार भी है। तीसरे खंड ‘नई इबारत’ की कविताएं सीधे-सीधे स्त्री को संबोधित हैं। स्त्री विमर्श को आवाज देती, उसे आगे बढ़ाती कविताएं। चौथे खंड ‘इंद्रधनुष’ की कविताएं प्रकृति के सौंदर्य, विकास कार्यक्रमों की असलियत, कुछ बेहतरी की उम्मीद में देखे गए या देखे जा रहे सपनों और खुशहाली के नारों के बीच पनप रहे नए सपनों के साथ अपने पंख तोलती हैं। पांचवें खंड ‘प्रतिध्वनि’ की कविताओं में सांस्कृतिक अनुगूंजें हैं। कमल कुमार ने अपने पसंदीदा संगीतकारों, अभिनेताओं, कलाकारों पर कविताएं लिखी हैं। इस तरह इस संकलन की कविताएं सिर्फ सवाल नहीं करतीं, जीवन के कोमल और सुंदर पक्षों को भी उकेरती और बेहतरी की उम्मीद बुनने का प्रयास करती हैं।
तुमसे है सवाल : कमल कुमार; बोधि प्रकाशन, सी-46, सुदर्शनपुरा इंडस्ट्रियल एरिया एक्सटेंशन, नाला रोड, 22 गोदाम, जयपुर; 150 रुपए।

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