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बाखबरः मालहरण लीला

अंत में सब लोग एनजीटी को कोसते दिखे कि पांच करोड़ का जुर्माना ही क्यों लगाया? चैनलों में होती आलोचना आलोच्य वस्तु की महिमा ही स्थापित करती है इसीलिए उसकी आलोचना को कोई सीरयसली नहीं लेता! वह जिसकी निंदा करती है उसकी ही स्तुति बन जाती है!

Author March 13, 2016 2:55 AM
शराब कारोबारी विजय माल्या

‘इंडिया का टाप मोस्ट स्केम!’ ‘माल्या भागा या भगाया गया?’ ‘अठहत्तर हजार करोड़ का माल चीरा!’ ‘सब देखते रहे वह निकल गया!’
‘माल हरण लीला’ अपनी कहानी कहती रही। कहानी एकदम हिट थी। दर्जनों अधनंगी सुदरियां, उनके बीच एकमात्र केसानावा अपने माल्या जी! कभी क्रूज पर कभी हवाई जहाज की सीढ़ी पर पांच दाएं पांच बाएं कपड़ों की तरह चिपटी सुंदरियां! भोग-विलास के शौकीन बिजनैसमैन को और क्या चाहिए? नया बुर्जुआ नया विलास!एक चैनल ने भोग-विलास की कहानी को सात शाम बजाया, एक ने तीन, एक ने दो, बाकी ने एक-एक दिन! टीवी की स्क्रीन के एक ओर एंकर बोलता रहता, दूसरी ओर ‘इंडियाटुडे’ लिख-लिख कर बताता रहा कि किस बैंक से कितना लोन लिया, सत्रह बैंकों से कुल इतना मारा और एलर्ट होने पर भी निकल गया! कौन उगाहेगा, कैसे उगाहेगा?

हर कहानी माल्या माल चीरने की लीला की एक चमत्कारी कहानी रही। माल्या जी जब भी दृश्य में आते, उनके संग लिपटती चिपटती दस-पांच सुदरियां जरूर होतीं। वे कभी सेठ कभी पंक दाढ़ी कभी चोटी में प्रकट होते। कई सुंदरियों के चेहरे फिल्मी हीराइनों से मिलते-जुलते। ये जलवे आम दर्शक को जलाने वाले दिखते! काश हम भी माल्याजी की तरह मालामाल होते! हम भी उनके जैसे केसानोवा होते! जिस तरह कहानी आई उससे माल्या जी जितने एक्सपोज हुए उतना ही उनका रुतबा बढ़ता दिखा कि देखो इस सब के बावजूद अगर माल हो तो हर हरामगीरी के बाद आप बच कर निकल भाग सकते हैं!

ऐसे मामलों को खोलने की, उनके पीछे पड़ जाने के लिए प्रख्यात टाइम्स नाउ के एंकर ने अपने फ्रे म में बैठे-बैठे क्रोध में अपने हाथ मले और लाख टके का जासूसी सवाल पूछा कि बताइए इस वक्त माल्या किस शहर में है? सब चुप, लेकिन एक खबरदार ने कड़क कर दावे के साथ कहा कि वो इस वक्त लंदन में है! तब एंकर ने आगे जोड़ा कि वो जेट एअरवेज की इस फ्लाइट से इतने बजे भागा है! मन हुआ कि माल्या जी के इस पराक्रम पर उनको माला पहना दूं! माल्या जी की लीला का जलवा कि उनकी कहानी निंदा-स्तुति से परे होकर कमनीय हो उठी! भ्रष्टाचार की कहानियां जिस तरह आती हैं उनमें अक्सर खलनायक क्रमश: नायक बनता नजर आने लगता है क्योंकि हम जानते होते हैं कि उसे पकड़ से बाहर ही रहना है! उसकी बदमाशाी हम पर रौब गांठने लगती है।

अब चैनल के एंकर दस वकीलों को लिए लाख बैठे रहें और कानून की पेंचोखम खोलते रहें, बंदा तो अब भी सुंदरियों के बीच क्रूज पर नाचे जा रहा है! ऐसी कहानियों में एंकरों की आपसी ईर्ष्याएं ऐसी कहानी को और तीखा बना देती हैं। एक ने कहा कि वो मीडिया उसे बचाने में लगा है जिनके लोग उसके विलास के हिस्से हुआ करते थे! यानी कि माल्या जी अगली लीला करें तो उनका भी खयाल कर लें!
जब सबकुछ संपन्न हो गया, जमुना का कछार पट गया, मंत्र बन गया, पोस्टर लग गए, तब जाकर पर्यावरण के पहरुए बने एनजीओज को होश आया और अपील में गए। तभी चैनल जागे वरना न जागते और एनजीटी ने जब पांच करोड़ का फाइन लगाया तो विश्व सांस्कृतिक समारोह का आयोजन बहसों में आया। मीडिया के जनतंत्र में एक ओर पर्यावरण-पक्षी और संस्कृति-पक्षी आपस में हिसाब करने के लिए चैनलों में आ विराजे!

एक चैनल जमुना के ऐन उस ठिकाने से बातचीत दिखाने लगा जहां समारोह का मंच बना था। समारोह वालों की कुर्सियां और वहीं बैठ उनकी निंदा! लेकिन समारोह वाले इसे ‘डेमोक्रेटिकली’ सह गए। एक ने कहा कि हमने जमुना का खयाल रखा है, एक पेड़ तक नहंीं काटा है, और गुरुजी ने कहा है कि हम यहां बायोडाइवर्सिटी पार्क बनाएंगे, हमारे स्वयंसेवक जमुना को साफ करने में अरसे से लगे हैं।
अंत में संस्कृति मंत्री ने समाहार किया कि गंगा ज्ञान की नदी है, जमुना रास की यानी संस्कृति की नदी है। जमुना किनारे इस आयोजन से भारतीय संस्कृति को हम दुनिया के लिए ‘शो केस’ कर सकेंगे कि किस तरह हमारी संस्कृति विश्व शांति के लिए उपयोगी है। अंत में सब लोग एनजीटी को कोसते दिखे कि सिर्फ पांच करोड़ का जुर्माना ही क्यों लगाया? लेकिन संदेश यही प्रसारित हुआ कि इस तरह के निपटान से भावी आयोजनों के लिए रास्ता खुला! चैनलों में होती आलोचना आलोच्य वस्तु की महिमा ही स्थापित करती है इसीलिए उसकी आलोचना को कोई सीरयसली नहीं लेता! वह जिसकी निंदा करती है उसकी ही स्तुति बन जाती है!

लेकिन एबीपी के लिए अनुपम खेर सबसे बडेÞ टोलरेंट हीरो नजर आए जो जस्टिस गांगुली की इंटोलरेंस पर जमकर बरसे और सबकी बोलती बंद कर दी! टेलीग्राफ द्वारा आयोजित संवाद में खेर ने अफजल गुरु के जेएनयू पक्षधरों को माइक पर आते आडेÞ हाथों लिया और ऐसी खरी-खोटी सुनाई कि जनता के साथ काजोल तक तालियां बजाने लगीं। जस्टिस जी को तो एक से एक निंदा-वाक्य कहे और अंत में ‘आदरणीय श्रीमन माफ कीजिएगा’ की पतली गली से निकल गए! मंच पर दो बहसीले ग्रुप थे: एक ओर बरखा दत्त और रणदीप सुरजेवाला टाइप थे, दूसरी ओर सुपर फाइटर खेर, काजोल और सुहेल सेठ टाइप थे! वाक्कौशल ही नहीं, अरक्षणीय को रक्षणीय बनाने के लिए चंटई और बुद्धिकौशल की जरूरत होती है और अपने यहां ऐसी अक्लमंदी की कमी नहीं!

जमानत पर आते ही कामरेड कन्हैया एक निंदक अंग्रेजी चैनल को छोड़ बाकी तीनों अंग्रेजी चैनलों के एंकरों का दुलारा बन गया। एंकर उसे इस तरह से देखते जैसे साक्षात चे ग्वेवारा के दर्शन कर रहे हों! एक एंकर का वात्सल्य एक बार इतना उमड़ा कि पूछा कि आप जेल से आ रहे हैं, आपको कभी किसी पर गुस्सा नहीं आया, दर्द महसूस नहीं हुआ? आय हाय!
लेकिन कामरेड की महानता पीछा ही नहीं छोड़ रही। ‘सरेआम पेशाब करने के एक युवती के आरोप में’ उस पर पिछले बरस तीन हजार रुपया जुर्माना हुआ था! क्या पता, स्वच्छ भारत अभियान के खिलाफ यह उसका एक विमर्श हो? फिर उसके सेना को बलात्कार करने वाला बताने की बात से नाराज एक बाहरी छात्र ने उसको पीटने की कोशिश की, वह पकड़ा गया, मगर कामरेड ने उसके भविष्य को देख उसे माफ किया!हिंसा के आगे अहिंसक होने का ऐसा उदाहरण दुर्लभ है!

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