ताज़ा खबर
 

दिल्ली को पूर्ण राज्य के दर्जे पर भाजपा काट रही कन्नी

मनोज मिश्र नई दिल्ली। दिल्ली को पूर्ण राज्य का दर्जा देने की मुहिम चलाने वाली भाजपा के अध्यक्ष शाह और किरण बेदी अब इस मुद्दे से लगातार कन्नी काट रहे हैं। यह मुद्दा संवेदनशील है तो पिछले चार दशक से भाजपा के हर घोषणापत्र में इसे प्राथमिकता से क्यों शामिल किया जाता रहा है। इतना […]

मनोज मिश्र

नई दिल्ली। दिल्ली को पूर्ण राज्य का दर्जा देने की मुहिम चलाने वाली भाजपा के अध्यक्ष शाह और किरण बेदी अब इस मुद्दे से लगातार कन्नी काट रहे हैं। यह मुद्दा संवेदनशील है तो पिछले चार दशक से भाजपा के हर घोषणापत्र में इसे प्राथमिकता से क्यों शामिल किया जाता रहा है। इतना ही नहीं बेदी पर अफसर की तरह काम करने का आरोप लगाकर पार्टी के सालों पुराने नेता नरेंद्र टंडन ने पार्टी छोड़ने की घोषणा तक कर दी। हालांकि बाद में वे पलट गए। भाजपा की दिल्ली इकाई के पूर्व सचिव एवं दिल्ली प्रदेश कार्यकारी समिति में स्थायी आमंत्रित सदस्य टंडन ने अपना त्यागपत्र सुबह पार्टी अध्यक्ष अमित शाह को भेज दिया था जिसे स्वीकार कर लिया गया था। हालांकि टंडन ने बाद में कहा कि वे अपना त्यागपत्र वापस ले रहे हैं क्योंकि यह एक भावनात्मक निर्णय था।

कायदे में किसी भी केंद्र सरकार ने दिल्ली की शासन व्यवस्था में बदलाव करने पर कभी भी गंभीरता से बहस नहीं करवाई। आजादी के बाद 1952 में दिल्ली को पहले कम अधिकारों वाली विधानसभा दी गई थी लेकिन केंद्र के समानांतर सत्ता बन जाने के चलते दूसरे बहाने से उसे खत्म कर दिया गया। फिर 1958 में नगर निगम और 1967 में महानगर परिषद बना। लंबे आंदोलन के बाद 1993 में पुलिस (दिल्ली पुलिस) और जमीन (डीडीए) के बिना विधानसभा दी गई। दिल्ली के वीआइपी इलाके यानी एनडीएमसी और दिल्ली छावनी के इलाकों को इससे अलग रखा गया। नगर निगम भी अलग रही। शीला दीक्षित के लंबे प्रयासों के बाद 2011 में दिल्ली नगर निगम को तीन हिस्से में बांट तो दिया गया लेकिन उसे सीधे दिल्ली सरकार के अधीन नहीं किया गया। दिल्ली के शहरी विकास विभाग के जरिए उस पर दिल्ली सरकार का अप्रत्यक्ष नियंत्रण है। दिल्ली की सरकार ने अपने प्रयासों से निगम से बिजली, पानी, परिवहन, फायर सर्विस, सीवरेज और बड़ी सड़कें अपने अधीन किया लेकिन जब दिल्ली और केंद्र में टकराव की नौबत आई तो केंद्र ने अपने अधिकार कम नहीं होने दिए। अभी की केंद्र सरकार तो खुलेआम दिल्ली को अधिकार देने पर कन्नी काटती नजर आ रही है।

अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व वाली भाजपा की केंद्र सरकार ने जाते जाते दिखावे के लिए ही सही 18 अगस्त, 2003 को दिल्ली राज्य विधेयक 2003 संसद में पेश किया। उसमें नई दिल्ली नगर पालिका परिषद (एनडीएमसी) इलाका केंद्र सरकार के पास रखने और वीआइपी सुरक्षा को छोड़कर बाकी पुलिस दिल्ली सरकार को देने की बात थी। उस विधेयक में बड़ी बात गैर एनडीएमसी इलाके की जमीन के अधिकार दिल्ली सरकार के पास होते। मौजूदा अधिकारों में थोड़ी ही बढ़ोतरी होती लेकिन दिल्ली तकनीकी रूप से भी केंद्र शासित प्रदेश से पूर्ण राज्य बन जाता। बाद में सरकार की ओर से पहल करके उसमें कई संशोधन कराए जा सकते थे। यह विधेयक भी राजनीतिक शोशे से ज्यादा कुछ साबित नहीं हुआ। इसे प्रवर समिति में भेजा गया और फिर इसे दफन ही कर दिया गया। कांग्रेस की अगुआई वाली यूपीए सरकार तो दिल्ली को पूर्ण राज्य बनाना तो दूर कुछ भी अतिरिक्त देने को तैयार न थी।

दिल्ली राज्य के मुद्दे को भाजपा जनसंघ के समय से उठाती रही है। 1967 में महानगर परिषद से इसकी शुरुआत की गई। इतना ही नहीं 1993 में दिल्ली को विधानसभा दिलवाने में भाजपा के नेता मदन लाल खुराना के लंबे संघर्ष की भूमिका रही। कायदे से दिल्ली भाजपा को सबसे ज्यादा खुराना ने ही प्रभावित किया। अभी खुराना लंबे समय से बीमार और अचेत अवस्था में हैं। पूर्व केंद्रीय मंत्री शांतिभूषण से मिलने का समय मांगने वाली किरण बेदी के अभी तक उनसे मिलने जाने की जानकारी नहीं आई है। भाजपा सरकार बनते ही 1994 में भाजपा विधायक मेवाराम आर्य ने दिल्ली को पूर्ण राज्य का दर्जा देने का प्रस्ताव किया था। संयोग से केंद्र में ज्यादा समय तक कांग्रेस सरकार में रही और माना जाता है कि अगर दिल्ली को पूर्ण राज्य का दर्जा मिल जाए तो केंद्र सरकार के दो मलाईदार विभाग-गृह और शहरी विकास मंत्रालय के अधिकारी बेजान हो जाएंगे। यह स्थिति लंबे समय तक रही। इसीलिए भाजपा हर चुनाव में पूर्ण राज्य को मुद्दा बनाती थी और कांग्रेस इससे उसी तरह बचती थी जिस तरह से अब भाजपा के नेता बच रहे हैं।

भाजपा के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार ने 2002 में शीला दीक्षित और तत्कालीन उप राज्यपाल विजय कपूर के विवाद में भी उप राज्यपाल का साथ दिया था और बिलों के बारे में दिल्ली विधानसभा को मिले अधिकारों में कटौती कर दी। उसी के बाद कांग्रेस ने रणनीति बदली और 11 सितंबर, 2002 को दिल्ली विधानसभा का विशेष सत्र बुलाकर दिल्ली को पूर्ण राज्य देने का प्रस्ताव पास किया। प्रस्ताव सर्वसम्मति से पास हुआ जाहिर है और इसको भाजपा का भी समर्थन था। भाजपा के नेतृत्व ने अपनी पुरानी घोषणा पर अमल करने के लिए कुछ कम अधिकारों वाली दिल्ले राज्य के लिए 2003 में विधेयक पेश किया। बीच में दोनों ही जगह कांग्रेस की सरकार होने पर इस मुद्दे को उठाने की कोशिश की गई तो यूपीए सरकार के गृह मंत्री रहे पी चिदंबरम ने दिल्ली को पूर्ण राज्य बनाने से इनकार कर दिया।

उसी तरह विधानसभा और नगर निगम चुनाव ही नहीं लोकसभा चुनाव तक में दिल्ली के लिए हर बार पूरक घोषणापत्र जारी करने वाली भाजपा इस बार घोषणापत्र के बजाय दृष्टिपत्र जारी करने वाली है। चुनाव सात फरवरी को है और चुनाव प्रचार पांच फरवरी को खत्म हो जाएगा। ऐसे में आगे के दो दिनों में ही उसे जो भी वादे करने होंगे, वह करेगी। इसका नाम चाहे कुछ भी दिया जाए लेकिन लोग तो इसे घोषणापत्र ही कहेंगे। यह सवाल अपनी जगह है कि आखिर टृष्टि पत्र आने से क्या भाजपा के पुराने वादे झूठे हो जाएंगे या वे बदल जाएंगे। दिल्ली में हर रोज बदलते राजनीतिक समीकरण से भाजपा हड़बड़ी में हर रोज कोई न कोई नई बात कह जा रही है जिसका विरोधी राजनीतिक लाभ उठाने में नहीं चूक रहे हैं।

Hindi News के लिए हमारे साथ फेसबुक, ट्विटर, लिंक्डइन, टेलीग्राम पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News AppOnline game में रुचि है तो यहां क्‍लिक कर सकते हैं।

Next Stories
1 2013 में सरकार बनाने में ‘आप’ को भाजपा का समर्थन करना चाहिए था
2 दिल्ली चुनाव में ‘आप’ को बहुमत: सर्वे
3 मोदी सरकार ‘भाजपा’ का वादा: विश्वस्तरीय बनाएंगे दिल्ली
आज का राशिफल
X