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BLOG: 210 में से 24 नस्लों की बकरियां हमारे यहां हैं, हम सबसे ज्यादा बकरी का दूध उत्पादक हैं, फिर भी नहीं उठा पा रहे बकरियों से आर्थिक लाभ

अच्छी नस्ल से संभोग कराने पर औसतन नर बच्चों का वजन 1.65 किलोग्राम बढ़ जाएगा। अगर आप रोगनिरोधी उपाय अपनाते हैं तो बच्चों की मौत दर 18 से 7 फीसद और किशोरों की मौत दर 12 से 5 फीसदी तक कम हो सकती है।

साल 2007 से 2012 के बीच में भारत में बकरियों की संख्या में थोड़ी कमी देखने को मिली। 2007 में 140 मिलियन थी जो कि साल 2012 में घटकर 135 मिलियन रह गई।

यह कहानी अप्रमाणिक है, लेकिन विचित्र है। हर चार-पांच साल में मवेशियों की गणना होती है। ताजा गणना साल 2012 में हुई थी। पश्चिम बंगाल के एक गांव में 31 कुलहंस थे, जिनमें से 17 नर और 14 मादा थे। अपनी अंग्रेजी भाषा के ज्ञान पर गर्व करने वाले अधिकारी ने रिपोर्ट में 17 गैन्डर( हंस का अंग्रेजी अनुवाद) और 14 कुलहंस बताए। इसके बाद एक उच्च अधिकारी जिन्हें अधीनस्थ कर्मचारियों की गलतियां निकालने पर गर्व था ने इसे ‘गैंडा’ समझा। उसने रिपोर्ट को बदलकर रिपोर्ट में 17 गेंडें और 14 कुलहंस बता दिए। पश्चिम बंगाल के एक गांव में 17 गेंडों के घूमने की जानकारी सोचने को मजबूर कर देती है, ऐसे में रिपोर्ट के दोबारा से चेक होना स्वभाविक था। मवेशियों की गणना विकास का एक अच्छा सूचक साबित हो सकती है, अगर यह सही तरीके से की जाए। क्या आप जानते हैं कि साल 2012 में भारत में 11.7 मिलियन कुत्ते थे, जो कि साल 2007 में 19.1 मिलियन थे। ग्लोबल एवरेज ऑफ ह्यूमनःडॉग्स रेशियो के मुताबिक भारत में कुछ कुत्तें हैं, ना कि बहुत ज्यादा। लेकिन शहरीकरण की वजह से नर कुत्तों के लिंगानुपात में गड़बड़ देखने को मिली है। ऐसे ही गायों का लिंगानुपात सुधरा है, जबकि सांडों का लिंगानुपात बिगड़ा है।

हालही मैं जयपुर एक समारोह में मशहूर फोटोग्राफर स्टेव मैककरी और यूपी के सेंट्रल इंस्टी्ट्यूट फॉर रिसर्च ऑन गोट्स(सीआईआरजी) के एक फेकल्टी मेंबर के साथ बैठा था। मैं बकरियों के बारे में थोड़ा जानता था। मैंने उनसे बकरियों से संबंधित कुछ मुद्दों पर चर्चा की। साल 2007 से 2012 के बीच में भारत में बकरियों की संख्या में थोड़ी कमी देखने को मिली। 2007 में 140 मिलियन थी जो कि साल 2012 में घटकर 135 मिलियन रह गई। 2012 के आंकड़ों के मुताबिक 129 मिलियन बकरियां ग्रामीण भारत में, जबकि 6 मिलियन शहरी भारत में हैं। शहरी क्षेत्रों वाली बकरियां ज्यादात्तर यूपी में बताई गई हैं। बाकी और बकरियां आंध्रप्रदेश, असम, बिहार, झारखंड, एमपी, महाराष्ट्र, ओडिशा, राजस्थान, तमिलनाडु, यूपी और पश्चिम बंगाल के ग्रामीण क्षेत्र में हैं।

मैंने उम्मीद की थी कि सीआईआरजी के फैकल्टी मेंबर बकिरयों में रुचि दिखाएंगे। मैंने नहीं सोचा था कि मैककरी बकरियों में ज्यादा रुचि दिखाएंगे। मैककरी ने स्मार्टफोन निकाला और हमें दुनियाभर की बकरियों की तस्वीरें दिखाई, जो उन्होंने क्लिक की थीं। उनमें से एक तस्वीर अच्छी थी, शायद वो मोरक्को की थी। इस तस्वीर में कुछ बकरियां एक पेड़ पर चढ़ी हुई थीं और वे टहनियों पर खड़ी होकर चर रही थीं। बातचीत में एक बात सामने निकलकर आई कि पूरी दुनिया में 210 नस्ल की बकरियां है, जिनमें से 24 नस्लें भारत में पाई जाती हैं। मैं महसूस नहीं कर पाया कि भारत दुनिया का सबसे ज्यादा बकरी का दूध उत्पादक है और दुनिया का दूसरा सबसे ज्यादा बकरी का मीट पैदा करने वाला देश है। भारत में पूरी दुनिया की 18 फीसद बकरियां हैं। मेरी बकरियों में रुचि इसलिए पैदा हुई क्योंकि फैकल्टी मेंबर ने मुझे बकरियों पर एक पर्चा भेजा था, जिसके वे सहलेखक थे। इस पर्चे में टेक्नोलॉजिक और मार्केटिंग उपायों के जरिए आर्थिक लाभ पर फोकस किया गया था। इनमें अहम थे टीकाकरण, पोषण, अच्छी नस्ल से संपर्क और बकरियों के बच्चों को 9-10 महीने की उम्र में बेचा जाए, बजाय 5-6 महीने की उम्र में। भारत में 50 फीसदी बकरियां पांच-छह महीने की उम्र में ही बेच दी जाती हैं।

हालांकि, यह पर्चा परावर्तन मॉडल पर आधारित था, इसके परिणाम भी असाधारण थे। अच्छी नस्ल से संभोग कराने पर औसतन नर बच्चों का वजन 1.65 किलोग्राम बढ़ जाएगा। अगर आप रोगनिरोधी उपाय अपनाते हैं तो बच्चों की मौत दर 18 से 7 फीसद और किशोरों की मौत दर 12 से 5 फीसदी तक कम हो सकती है। यह सुझाए गए चार उपायों प्रजनन, हेल्थकेयर, पोषण और मार्केटिंग का कीमत-लाभ विश्लेषण है। यहां मुख्य मुद्दा यह है कि ये बदलाव लाए कैसे जाएं? बकरी पालन पहले से ज्यादा ढांचागत तरीके से किया जा रहा है। दूसरे शब्दों में कहें तो हम खेती और पशुपालन को अलग-अलग नहीं कर सकते। आखिरकार यह कीमत भी किसी द्वारा पैदा की जाती है। हालांकि, मैं सोचता हूं कि सूचना का प्रचार और सेवाओं का विस्तार मूलतत्व साबित होगा।

(लेखक नीति आयोग के सदस्य हैं और ये उनके निजी विचार हैं)

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