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नृत्य समारोह: ‘कर्ण’ की कथा और व्यथा

इस नृत्य रचना के संदर्भ में बाला देवी ने कहा कि महाभारत कथा का हर पात्र आकर्षक है। मुझे महाभारत की कथा में पूर्णता नजर आती है। पर फिर, भी मन में कई सवाल ऐसे लगते हैं कि अनुत्तरित हैं। जैसे-द्युत क्रीड़ा में द्रौपदी को हारना, द्रौपदी का जीवन संघर्ष, कर्ण का जन्म से ही भाग्य भरोसे रहना? ये कुछ प्रसंग हैं, जो मुझे रोमांचित करते हैं।

नृत्यांगना बाला देवी चंद्रशेखर मानती हैं कि कर्ण का व्यक्तित्व समकालीन है।

महाभारत के पात्रों को हर कलाकार अपनी तरह से सोचता है। कुछ पात्रों जैसे कृष्ण, द्रौपदी, अर्जुन, कर्ण को केंद्र में रखकर कई कलाकारों ने नृत्य रचनाएं प्रस्तुत की हैं। कर्ण एक ऐसा पात्र है, जिससे किसी को सहानुभूति होती है, किसी को कर्ण से शिकायत रहती है तो कोई कर्ण को वीर महायोद्धा के रूप में स्वीकार करता है। भरतनाट्यम नृत्यांगना बाला देवी चंद्रशेखर ने एकाहार्य अभिनय के जरिए कर्ण के जीवन को मोहक अंदाज में पेश किया है। इसमें वह कर्ण के पात्र को चुनौती से परिपूर्ण दर्शाती हैं। इंडिया इंटरनेशनल सेंटर के हॉल में आयोजित समारोह में नृत्य रचना ‘कर्ण-द डेस्टिनीज चाइल्ड’ को पेश किया गया। इस नृत्य रचना के संदर्भ में बाला देवी ने कहा कि महाभारत कथा का हर पात्र आकर्षक है। मुझे महाभारत की कथा में पूर्णता नजर आती है। पर फिर, भी मन में कई सवाल ऐसे लगते हैं कि अनुत्तरित हैं। जैसे-द्युत क्रीड़ा में द्रौपदी को हारना, द्रौपदी का जीवन संघर्ष, कर्ण का जन्म से ही भाग्य भरोसे रहना? ये कुछ प्रसंग हैं, जो मुझे रोमांचित करते हैं। मेरी नजर में कर्ण एक महान चरित्र है। उनकी उदारता, वीरता, वफादारी और मित्रता के प्रति समर्पण मुझे बहुत अपील करता है। इसलिए मैंने चार साल तक अनेक साहित्यों में उनके चरित्रों का अध्ययन किया। इसके बाद, इस नृत्य रचना की परिकल्पना की।

नृत्यांगना बाला देवी चंद्रशेखर मानती हैं कि कर्ण का व्यक्तित्व समकालीन है। कर्ण के जीवन की तरह ही आम जीवन में भी हर किसी को किसी न किसी द्वंद्व और संघर्ष से जूझना पड़ता है। हम लोग भी अपने निजी जीवन में अनेक परीक्षाओं और समस्याओं का सामना नैतिकता के साथ करें, यह प्रेरणा हमें कर्ण के जीवन से मिलती है। यह संदेश देता है कि आप धार्मिक हैं, लेकिन अगर आप अधर्म का साथ देते हैं तो आपका धर्म और कर्म भी इससे प्रभावित होता है। इस नृत्य रचना में नृत्यांगना ने कुंती, कृष्ण, द्रौपदी, कर्ण आदि पात्रों का निर्वहन बहुत सुंदर तरीके से किया। उन्होंने बहुत स्फूर्ति और सरलता से अलग-अलग पात्रों के भावों को त्वरित मुखाभिनय और आंखों के जरिए अभिव्यक्त किया। उनके नृत्य को देखकर अभिनवगुप्त का कथन सत्य प्रतीत होता है कि नाट्य और नृत्य में कोई अंतर नहीं है। इस तरह का नृत्य अभिनय कुचिपुड़ी नृत्य में तो नजर आता है, पर भरतनाट्यम में कम देखने को मिलता है।

नृत्य रचना के लिए महाभारत, रश्मीरथी, मुखीशिवम, विष्णु पुराण और कर्णभाष्यम ग्रंथों के अंशों का चयन किया गया था। संगीत का समायोजन मधुर था। नृत्य रचना के आरंभ में सूर्य की अराधना करती कुंती के भावों का चित्रण था। इसके लिए ‘सूर्याय नम: पित्राय नम:’ श्लोक को आधार बनाया गया था। इसके बाद, छोटे-छोटे छंदों के जरिए कर्ण की कथा को नृत्यांगना ने नृत्य में पिरोया। ‘नील मेघम श्याम वर्ण’, ‘रूधिरगात फाल्गुनी’, ‘सर्पमुखम ज्वलंतम’, ‘त्वम अब्रवीत वासुदेव’, ‘दानवीर कर्ण भूतले’, ‘धर्मम रक्षति-रक्षति धर्मपरायणम’ रचनाओं के जरिए कृष्ण, कर्ण, अभिमन्यु, द्रौपदी के भावों को नृत्यांगना बाला देवी ने संचारी अभिनय में बखूबी चित्रित किया। उन्होंने जतीस, अड़वुओं, करणों, गतियों व चारी भेद का प्रयोग बहुत सधे अंदाज में किया। हस्तकों और मुद्राओं के प्रयोग में काफी स्पष्टता दिखी। वास्तव में, एक संक्षिप्त प्रस्तुति के जरिए बाला देवी अपने दर्शकों को पूरी तरह बांध लेती हैं। इसमें वीर, रौद्र और करूण रस समावेशित था, जो प्रभावकारी था।

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