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मुद्दाः सुंदरता और क्रीम

सुंदरता बढ़ाने वाले उत्पाद और सर्जरी आदि सामानों और उपायों को केवल सिर्फ उपभोक्ता अदालतों के भरोसे छोड़ना ठीक नहीं है। जिस तरह खानेपीने की चीजों में खतरनाक रसायनों के इस्तेमाल पर सरकार और अदालतों चिंतित दिखती हैं, उसी तरह सुंदरता के नाम पर घटिया क्रीम बेचने को भी एक गुनाह के तौर पर लिए जाने की जरूरत है।

Author March 13, 2016 02:06 am

देश-दुनिया में एकतरफा प्रेम में कुंठित पुरुषों का एक तबका है जो महिलाओं के चेहरे को तेजाब से झुलसा देना चाहता है। दूसरी तरफ बाजार है कि जो महिलाओं की सुंदर दिखने की इच्छा का दोहन करते वक्त यह देखने की जहमत तक नहीं उठाता है कि क्रीम, पाउडर, लोशन, सिंदूर और लाली के नाम पर जो कुछ बेच रहा है उसमें तेजाब जैसे कितने जहर मिले हुए हैं। सौंदर्य निखारने के लिए महिलाओं की इच्छा का इस आधुनिक जमाने में नतीजा यह निकला है कि बाजार दुनिया भर की क्रीम-पाउडर जैसे नुस्खों और उपकरणों से अटा पड़ा है। इनमें से कोई क्रीम किसी स्त्री को कितना सुंदरता बनाती है, इसे लेकर दावे तो अनगिनत हैं पर इनकी सचाई संदिग्ध है।

भुक्तभोगी जब खराब सौंदर्य प्रसाधनों की शिकायत लेकर अदालत जाते हैं तो वहां उन्हें कभी ऐसी हिदायतें भी मिलती हैं कि कि अगर क्रीम लगाने से गोरापन न आए तो इसमें अदालतें क्या कर सकती हैं। कभी-कभार कुछ उपभोक्ता मुआवजा भी पा जाते हैं। हाल में, एक अमेरिकी अदालत के फैसले ने क्रीम-पाउडर आदि सौंदर्य प्रसाधनों के खोखले दावों और उनसे होने वाले नुकसान की तरफ दुनिया का ध्यान खींचा है। खास तौर पर शिशुओं-बच्चों को केंद्र में रखकर उनके लिए उत्पाद और सौंदर्य प्रसाधन बनाने वाली कंपनी के एक टेलकम पाउडर से हुए नुकसान और उस पर दिए गए हर्जाने ने। शिकायत की गई थी कि इस कंपनी का पाउडर इस्तेमाल करते रहने के कारण 62 वर्षीय अमेरिकी महिला की गर्भाशय के कैंसर से मृत्यु हो गई। अदालत ने महिला के परिजनों को करीब 490 करोड़ रुपए हर्जाना चुकाने का हुक्म कंपनी को दिया है।

समस्या यह है कि एक तरफ ये कंपनियां अपने उत्पादों को सुंदरता बढ़ाने के लगातार दावे करती हैं और दूसरी तरफ क्या शहर और क्या गांव-देहात, सभी जगहों की महिलाएं अपनी जानकारी और हैसियत के हिसाब से उनका इस्तेमाल करती हैं। बिना इसकी फिक्र किए कि इनमें उनकी त्वचा और सेहत को भयानक नुकसान पहुंचाने वाली चीजें हो सकती हैं।

सुंदरता बढ़ाने वाले उत्पाद और सर्जरी आदि सामानों और उपायों को केवल सिर्फ उपभोक्ता अदालतों के भरोसे छोड़ना ठीक नहीं है। जिस तरह खानेपीने की चीजों में खतरनाक रसायनों के इस्तेमाल पर सरकार और अदालतों चिंतित दिखती हैं, उसी तरह सुंदरता के नाम पर घटिया क्रीम बेचने को भी एक गुनाह के तौर पर लिए जाने की जरूरत है। वजह यह है कि जिन क्रीम-पाउडरों के बल पर महिलाएं सुंदरता हासिल करने का सपना पाले हुए हैं, उनमें से बहुतेरे उत्पाद कैंसरकारी हैं।

यह मामला गंभीर इसलिए भी हो गया है क्योंकि त्वचा की रंगत सुधारने से लेकर बालों आदि की देखभाल के ज्यादा ऊंचे दावे अब सौंदर्य प्रसाधन कंपनियां करने लगी हैं। स्पष्ट है कि वे ऐसा उनमें डाले जाने वाले रसायनों के आधार पर कर रही हैं, लेकिन यह मात्रा कितनी है और क्या वह खतरनाक स्तर को पार तो नहीं कर गई है। इस बारे में कहीं से कोई निर्देश नहीं मिल रहा है। सुंदरता के रखरखाव के बहाने जहरीले और घातक रसायन इंसानों के शरीर में पहुंच रहे हैं, यह बात कई अध्ययनों से साबित हुई है। लंदन स्थित ब्रूनेल यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिकों द्वारा 28 देशों में संचालित किए गए एक अध्ययन के नतीजे कुछ ही अरसा पहले सामने आए हैं। इस अध्ययन में आम जीवन में प्रयोग किए जाने वाले 25 रसायनों को शामिल किया गया। पाया गया कि इनमें से 50 रसायन ऐसे हैं जो अकेले तो ज्यादा नुकसान नहीं पहुंचाते, लेकिन दूसरे रसायनों के साथ मिलाए जाने पर क्रियाएं करके वे कैंसरकारी रसायनों में बदल जाते हैं।

वर्तमान में जिस तरह से विभिन्न सौंदर्य प्रसाधन कंपनियां अपने उत्पादों में पहले के मुकाबले ज्यादा असर होने के दावे कर रही हैं, उससे प्रतीत होता है कि उन्होंने रसायनों की मात्रा बढ़ाई होगी या विभिन्न रसायनों के ऐसे मिश्रण तैयार किए होंगे, जो तुरंत परिणाम तो देते हैं पर उनसे स्वास्थ्य संबंधी अत्यधिक खतरे हो सकते हैं। पर समस्या यह है कि सुंदर दिखने की चाह महिलाओं को बिना जांचे-परखे ऊंचे दावों वाले लोशन, क्रीम, शैंपू की तरफ खींचे ले जा रही है जो आखिर में उनमें कैंसर जैसे गंभीर मर्ज पैदा कर देते हैं। स्त्रियों की सुंदरता की स्वाभाविक चाह और आज के कामकाजी माहौल में स्वस्थ-सुंदर दिखने की अनिवार्यता जैसे पहलुओं ने महिलाओं को अपनी सुंदरता कायम रखने के लिए सतत काम करने को प्रेरित किया है। गांव-कस्बों की महिलाएं भी इसमें पीछे नहीं है। वहां भी टीवी के प्रभाव और शहरी महिलाओं की देखादेखी ब्यूटी पार्लर जाने का चलन जोर पकड़ रहा है।

लंदन की ब्रूनेल यूनिवर्सिटी की चेतावनी नई जरूर है पर ऐसे नतीजों के बारे में दूसरी संस्थाएं पहले भी आगाह करती रही हैं। 2014 में दिल्ली स्थित एक पर्यावरणवादी संस्था- विज्ञान एवं पर्यावरण केंद्र (सीएसई)ने एक स्वतंत्र देशव्यापी जांच में यह दावा किया था कि देश में महिलाएं जिन सौंदर्य प्रसाधनों का इस्तेमाल कर रही हैं, उनमें तरह-तरह के जहरीले तत्त्वों की जरूरत से ज्यादा मात्रा है। ऐसे प्रसाधन महिलाओं में त्वचा कैंसर, पेट की रसौली जैसे गंभीर रोग पैदा कर रहे हैं। देश में बिकने वाले कई नामी प्रसाधन कंपनियों के उत्पादों की जांच की सीएसई ने अपनी प्रयोगशाला में, इसलिए उसके नतीजों को ज्यादा अहमियत नहीं दी गई।

पर यह सच है कि उन नतीजों में वैसे ही भयावह संकेत छिपे थे, जिसकी तरफ लंदन की ब्रूनेल यूनिवर्सिटी ने इशारा किया है। सीएसई ने यह निष्कर्ष निकाला था कि त्वचा का रंग निखारने वाली क्रीमों, लिप बाम और एंटी एजिंग क्रीमों में कई रसायन खतरनाक मात्रा तक मौजूद है। इनमें पारा, क्रोमियम और निकिल जैसी भारी धातुओं का अत्यधिक इस्तेमाल पाया गया था। रंग गोरा बनाने वाली 44 फीसद फेयरनेस क्रीमों में पारे की मात्रा के मुकाबले ज्यादा था और 50 प्रतिशत लिपस्टिक ब्रांडों में क्रोमियम और निकिल की मात्रा काफी ज्यादा थी।

सुप्रीम कोर्ट ने क्रीम-पाउडर वाले मामले में लाई गई याचिका भले खारिज की हो पर भोजन की तरह सौंदर्य प्रसाधनों के हानिकारक तत्वों की मात्रा सुनिश्चित रखने के संबंध में देश में ड्रग्स एंड कॉस्मैटिक नामक कानून पहले से लागू है। इसके मुताबिक अगर कॉस्मैटिक्स में निर्धारित मात्रा से ज्यादा रसायन पाए जाते हैं तो इसे कानून का उल्लंघन माना जाएगा और दोषी व्यक्ति संस्था या कंपनी को सजा और जुर्माना भुगतना पड़ेगा। पर कानून के वजूद में होने के बाद भी सौंदर्य प्रसाधनों में बड़ी मात्रा में खतरनाक तत्त्वों का मिलना साबित करता है कि न तो उनकी नियमित जांच हो रही है और न उनकी बिक्री रोकी जा रही है। महिलाओं को ऊपरी तौर पर सुंदर बनाने की कोशिशों का छल साबित करते हुए एक दावा यह भी किया जा चुका है कि 1930 के बाद शुरू हुए पेट्रोकेमिकल युग में दुनिया की प्रत्येक आठ में से एक महिला स्तन कैंसर की शिकार हो रही है और इसके पीछे रसायनों की वजह से जहरीले होते गए सौंदर्य प्रसाधन ही हैं। कुछ साल पहले अमेरिका की एक पर्यावरणवादी संगठन ने अपने अध्ययन में साबित किया था कि सौंदर्य प्रसाधन उन्हें इस्तेमाल करने वाली महिलाओं की सेहत के साथ-साथ गर्भस्थ शिशुओं के स्वास्थ्य पर भी असर डालते हैं और उनमें कैंसर समेत दूसरी जन्म संबंधी विकृतियां पैदा कर देते हैं।

जहां अमेरिका आदि देशों में कुछ संगठन ‘स्टॉप ब्रेस्ट कैंसर, व्हेयर इट स्टार्ट्स’ और ‘कैंपेन फॉर सेफ कॉस्मैटिक्स’ जैसे अभियानों के तहत लोगों को सौंदर्य प्रसाधनों में मिलाए गए हानिकारक तत्त्वों के प्रति जागरूक बना रहे हैं, वहीं भारतीयों में विदेशों से आयातित सौंदर्य प्रसाधनों का जबर्दस्त मोह है। विदेशी ब्रांडों की ऐसी मांग है कि उन पर आंख मूंदकर भरोसा किया जाता है। यहां तो अभी किसी सरकारी संस्था ने यह पता लगाने की शायद कोई कोशिश भी नहीं की है कि भारतीय महिलाओं में कैंसर के जो मामले बढ़ रहे हैं, कहीं उनके पीछे सौंदर्य प्रसाधनों की ही तो कोई भूमिका नहीं है। गौर करने वाली बात यह भी है कि भारत में तो स्थापित ब्रांडों की नकल भी धड़ल्ले से की और बेची जाती रही है। ऐसे में, किसी नामी ब्रांड की नकल के रूप में बिक रहे उत्पाद में कितने अधिक खतरनाक-जहरीले तत्त्व मौजूद हो सकते हैं। इसका अंदाजा उपयोगकर्ता को शायद ही हो पाए।

लोग इस बात की तो शिकायत जरूर करते हैं कि उन्हें नामालूम कारणों से बड़ी-बड़ी बीमारियां हो जाती हैं, जबकि वे तो अच्छे से अच्छा खाते हैं, पर वे यह जांच करने की जहमत शायद ही उठाते हैं कि जो शैंपू, क्रीम, पाउडर, डियोडरेंट आदि इस्तेमाल कर रहे हैं, कहीं वे नकली तो नहीं? या फिर कहीं उनमें सेहत को नुकसान पहुंचाने वाले जहरीले रसायन तो नहीं? शहरों में इससे संबंधित जागरूकता दिखाई पड़ सकती है, पर गांव-कस्बों की महिलाओं में तो सौंदर्य प्रसाधनों का और भी चाव होता है। ऐसे में वे बड़ी आसानी से उन उत्पादों की गुलाम हो जाती हैं जिनके विज्ञापन जोरशोर से टीवी पर दिखाई देते हैं। काश, सरकार या कोई संस्था इतने ही जोरशोर से देश की महिलाओं को बता पाए कि सुंदरता का मतलब चेहरे पर क्रीम-पाउडर पोत लेना नहीं है बल्कि खुद को स्वाबलंबी बनाते हुए समाज में अपनी उपयोगिता को साबित करना है।

मनीषा सिंह

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