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फिल्म बत्ती गुल मीटर चालू की समीक्षा: हंसी के लिफाफे में बंद एक अहम मुद्दा

फिल्म बिजली जैसी आम समस्या से जुड़ी है। देश में शायद ही कोई ऐसी जगह हो जहां बिजली का निजीकरण किया गया हो और फिर उपभोक्ताओं के पास बड़ी राशि के बिल न आते हों। निर्देशक ने इस समस्या को फिल्म में जोरदार ढंग से उठाया है।

निर्देशक-श्री नारायण सिंह, कलाकार-शाहिद कपूर, श्रद्धा कपूर, दिव्येंदु शर्मा, यामी गौतम, सुष्मिता मुखर्जी।

उत्तराखंड में बोलते समय वाक्य के अंत में ‘बल’ शब्द का इस्तेमाल होता है। चूंकि इस हफ्ते रिलीज हुई फिल्म ‘बत्ती गुल मीटर चालू’ में उत्तराखंड की कहानी है, इसलिए इस फिल्म के किरदार भी ‘मैं आया बल’, ‘मैं आऊंगी बल’ जैसे वाक्यों का काफी इस्तेमाल करते हैं। लेकिन इससे यह नहीं समझना चाहिए कि यह फिल्म उत्तराखंडियों को ही पसंद आएगी। फिल्म की कहानी बिजली का बिल अनाप-शनाप बढ़कर आने से जुड़ी है, इसलिए पूरे देश के दर्शक इससे जुड़ सकेंगे। उसी तरह, जिस तरह निर्देशक श्री नारायण सिंह की पिछली फिल्म ‘टॉयलेट-एक प्रेम कथा’ उत्तर प्रदेश के एक गांव पर केंद्रित होने के बावजूद हर जगह पसंद की गई थी।

फिल्म में एक प्रेम त्रिकोण भी है। एक लड़का है सुशील कुमार पंत (शाहिद कपूर), जिसका नाम तो सुशील है लेकिन उसमें शील नाम की कोई चीज नहीं है। पेशे से वकील है और तीरंदाजी भी करता है, लेकिन उसका मुख्य धंधा है लोगों को ब्लैकमेल करके पैसा बनाना। उसका एक दोस्त है सुंदर त्रिपाठी (दिव्येंदु शर्मा), जोकि सुंदर भी है और शरीफ भी। सुशील और सुंदर में पक्की दोस्ती है। दोनों की एक कॉमन गर्लफ्रेंड है ललिता नौटियाल (श्रद्धा कपूर), जिसे सब लोग नॉटी बुलाते हैं। तीनों तय करते हैं कि नॉटी एक-एक हफ्ते सुशील और सुंदर को डेट करेगी। इसके बाद वह जिसे पसंद करेगी उसी से शादी कर लेगी। डेटिंग के दौरान नॉटी सुंदर के ज्यादा करीब आ जाती है और यह बात सुशील को अच्छी नहीं लगती। तभी एक हादसा होता है। सुंदर एक प्रिंटिंग प्रेस चलाता है जिसका बिजली का बिल 54 लाख रुपए आता है। वह कई विभागों में शिकायत करता है, लेकिन कहीं भी उसकी सुनवाई नहीं होती। सुंदर हताश होकर झील में कूदकर खुदकुशी कर लेता है। इसके बाद सुशील अपने दोस्त को इंसाफ दिलाने के लिए बिजली विभाग के खिलाफ मुकदमा लड़ने की ठान लेता है।

फिल्म बिजली जैसी आम समस्या से जुड़ी है। देश में शायद ही कोई ऐसी जगह हो जहां बिजली का निजीकरण किया गया हो और फिर उपभोक्ताओं के पास बड़ी राशि के बिल न आते हों। निर्देशक ने इस समस्या को फिल्म में जोरदार ढंग से उठाया है। निर्देशक ने अदालती दृश्य को संजीदा बनाने के साथ-साथ उसे हास्य से भरपूर भी बना दिया है। खासकर वकील के रूप में शाहिद ने खूब हंसाया है। बिजली कंपनी की वकील के रूप में यामी गौतम भी शुरू में जमती हैं, लेकिन बाद में उनका किरदार कमजोर हो जाता है। शाहिद के किरदार को असरदार बनाने के लिए निर्देशक ने यामी के साथ थोड़ी ज्यादती कर दी है। श्रद्धा कपूर एक कस्बाई लड़की की भूमिका में सहज और खुशमिजाज लगी हैं। बात करें दिव्येंदु शर्मा की तो, उन्होंने इस फिल्म में अब तक का सबसे अच्छा किरदार निभाया है। फिल्म में पहाड़ी हिंदी का स्वाद भी मिलता है।

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