ताज़ा खबर
 

बेबाक बोल : अपना गिरेबां

अरविंद केजरीवाल को जहां अपने घोषित सरोकारों को साबित करते हुए अपने प्रमुख सचिव राजेंद्र कुमार पर लगे आरोपों की जांच के लिए खुद पहल करके उन्हें पाक-साफ निकल आने का इंतजार करना चाहिए था..

सोनिया गांधी, राहुल गांधी और अरविंद केजरीवाल। (बाएं से)

देश में आजादी के बाद पांच दशक से भी ज्यादा समय तक सत्ता पर काबिज रही कांग्रेस पार्टी फिलहाल अगर परेशान है तो इसकी वजह भी उतनी ही ऊंची है। इस पार्टी को चलाने के लिए अब तक इस पर एकछत्र राज करने वाले गांधी परिवार को अदालत के कठघरे में आना पड़ा, यह एक असहज करने वाली बात तो है ही। दूसरी ओर, देश के दिल के तौर पर मशहूर दिल्ली में सभी बड़ी पार्टियों के बीच से अप्रत्याशित बहुमत के साथ सत्ता हथियाने वाले अरविंद केजरीवाल के अपने अधिकारियों के चुनाव पर सवाल हैं। भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई की दुहाई देकर लोगों का प्रचंड बहुमत हासिल करने वाले केजरीवाल के अपने हाथ और उनकी ईमानदारी आज संदेह के दायरे में है क्योंकि उनके नजदीकी बाबू के दामन खंगाले जा रहे हैं।

इसके अलावा, अमृतसर में पंजाब के पूर्व मुख्यमंत्री अमरिंदर सिंह के हाथों करारी हार झेल कर भी केंद्र में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की कृपा के कारण एक ताकतवर मंत्री पद से नवाजे गए अरुण जेटली के आसपास उनकी अपनी ही पार्टी के सांसद कीर्ति आजाद ने घेरा कसा तो ‘आजाद लब’ को ही निलंबित करना पड़ा।

यह सब तब हो रहा है जबकि देश में सहिष्णुता और असहिष्णुता पर बहस अब भी जारी है। यह समझ से बाहर है कि देश को असहिष्णुता का पाठ पढ़ाने वाले ये राजनेता खुद पर सवाल उठते ही इतने असहिष्णु क्यों हो जाते हैं? इसे शायद देश की राजनीति का एक और अफसोसनाक अध्याय ही माना जाएगा कि अरविंद केजरीवाल को जहां अपने घोषित सरोकारों को साबित करते हुए अपने प्रमुख सचिव राजेंद्र कुमार पर लगे आरोपों की जांच के लिए खुद पहल करके उन्हें पाक-साफ निकल आने का इंतजार करना चाहिए था, वहां वे उनके दफ्तर पर पड़े सीबीआइ छापे को इस तरह पेश करने में लग गए, मानो खुद उनके कार्यालय पर छापा पड़ा हो। उम्मीद की जानी चाहिए कि इस छापे के केंद्र में उनके प्रमुख सचिव ही रहे होंगे और जिस वजह से यह छापा पड़ा था, उसके छींटे से केजरीवाल पूरी तरह आजाद हैं।

लेकिन छापे के बाद यह समझना मुश्किल था कि उनकी उद्विग्नता एक तरह से बेलगाम रूप में क्यों फूट पड़ी! उनके गुस्से और परेशानी का आलम यह था कि वे आपा और शिष्टाचार दोनों से नाता तोड़ बैठे। वरना एक राजनीतिक के तौर पर नरेंद्र मोदी और उनके बीच जिस तरह की दूरी है, उसमें मोदी के प्रति उनके सहज होने की उम्मीद नहीं थी, लेकिन कम से कम मुख्यमंत्री पद पर बैठे व्यक्ति से एक प्रधानमंत्री पद पर बैठे व्यक्ति का लिहाज करना लाजिमी होता है। लेकिन आमतौर पर एक सौम्य व्यक्ति के रूप में मशहूर अरविंद केजरीवाल के भीतर क्या और किस शक्ल में छिपा था, जो अचानक ही फूट कर बाहर आ गया! भारत के इतिहास में एक ऊंचे और जिम्मेदार पद पर बैठे किसी व्यक्ति ने शायद पहली बार प्रधानमंत्री को ‘मनोरोगी’ और ‘कायर’ कह कर आलोचना की होगी।

भ्रष्टाचार के मसले पर किसी को भी नहीं बख्शने के मुद्दे की राजनीति की जमीन पर खड़े केजरीवाल आखिर क्यों इतने विचलित हो गए? भ्रष्ट आचरण के किसी भी आरोपी की जांच और उसे सजा दिलाने की बात करने वाले केजरीवाल के नजदीक जब इसी तरह की एक जांच की आंच पहुंची तो किस वजह से वे बौखला गए? अब तक जिन्होंने उनकी राजनीति को बाहर से देखा है, उन्हें तो यही उम्मीद रही होगी कि वे छापे में आरोपी के खिलाफ खड़े मिलेंगे। लेकिन राजनीति में अपनों के खिलाफ खड़ा होना थोड़ी मुश्किल अपेक्षा है! शायद यही वजह है कि अरविंद केजरीवाल की प्रतिक्रिया ने समूचे देश को हैरान किया। यह भ्रष्टाचार के मुद्दे के सहारे राजनीति में अचानक धमके और सत्ता की कुर्सी तक पहुंचे अरविंद केजरीवाल का एक खालिस राजनीतिज्ञ की तरह किया गया व्यवहार था।

वरना सत्ता में आने के पहले वे राजनीति के इस फार्मूले पर चल रहे थे कि फाइलें खंगालो, सत्तारूढ़ दल में अपना निशाना ढूंढ़ो और इल्जाम के बदले में इल्जाम लगाओ। दिल्ली में अभी की लड़ाई की मौजूदा शक्ल यही हो गई है। अव्वल तो राजेंद्र कुमार नाम के ये अफसर पहले भी कई तरह के भ्रष्टाचार के आरोपों में घिरे रहे। उसके बावजूद वे ईमानदारी की लड़ाई लड़ने का दावा करने वाले मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल के भी चहेते बने। क्या केजरीवाल को राजेंद्र कुमार का इतिहास मालूम नहीं था?लेकिन इस कसौटी पर केजरीवाल अकेले नहीं हैं। हां, चूंकि उन्होंने खुद को सबसे अलग करके पेश किया था, इसलिए उनके भीड़ में सबसे अलग दिखने की उम्मीद थी। लेकिन वे अब शायद अपने बरक्स खड़ी कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी जैसी पार्टियों के साथ प्रतियोगिता में हैं!

दिलचस्प है कि ‘नेशनल हेरल्ड’ मामले में गड़बड़ी का मुद्दा उठते ही कांग्रेस की ओर से ऐसी स्थिति पैदा करने की कोशिश की गई, मानो किसी पड़ोसी देश ने हमला कर दिया हो। यह देश के लिए तो नहीं, लेकिन गांधी परिवार के लिए सचमुच एक हिला देने वाला प्रसंग जरूर है, क्योंकि सीधे सोनिया गांधी और राहुल गांधी के अदालत के दर पर हाजिर होने की बाध्यता के साथ इस परिवार की प्रतिष्ठा का भी सवाल जुड़ा है। इसके बाद इल्जाम की भाषा इस हद तक चली गई कि प्रतिक्रिया के लिए कोई मर्यादा बाकी नहीं रखी गई। ऐसा लगा मानो सरकार कांग्रेस के खिलाफ न्यायिक प्रक्रिया का इस्तेमाल कर रही हो। हालांकि, मामला बस यह था कि भाजपा नेता सुब्रमण्यम स्वामी की ओर से डाली गई एक याचिका के आधार पर अदालत ने कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी को तलब कर लिया था। हर रोज लाखों लोग अदालतों में हाजिरी भरते हैं। न्यायिक प्रक्रिया से होकर गुजरते हैं। हजारों सजा पाते हैं और निर्दोष करार दिए जाते हैं। लेकिन सिर्फ अदालत में हाजिरी के सवाल पर इस कदर भूचाल की तरह पेश करने के मायने क्या थे?

आखिर किन वजहों से कांग्रेस ने देश भर में इसे अपने शक्ति प्रदर्शन का मौका बना डाला। क्यों नहीं इसे न्यायिक प्रक्रिया को प्रभावित करने की कोशिश के तौर पर देखा जाए? पेशी से पहले गांधी परिवार के सिपहसालारों की अलग-अलग प्रेस कांफ्रेंस और पेशी के बाद सोनिया-राहुल का छत पर चढ़ कर यह कहना कितना जरूरी था कि ‘हम लड़ेंगे’, यह कांग्रेस के रणनीतिकारों को बेहतर मालूम होगा। लेकिन अब यह भी थोड़ा साफ होता जा रहा है कि राजनीतिक हिसाब-किताब बराबर करने के लिए अदालती फैसले भी राजनीति का मुद्दा बनते जा रहे हैं। जो भी नई सरकार आती है, पुरानी फाइलें खंगाल कर पुरानी सरकार और उसमें कुछ चुने हुए लोगों के ‘भ्रष्ट कारनामों’ की ‘पोल खोलने’ की कोशिश शुरू कर देती है।

बिना किसी अपवाद के हर तरफ यही हो रहा है। पंजाब, हरियाणा, दिल्ली या दक्षिण का कोई राज्य, एक बार कोई पार्टी सत्ता से बाहर हुई नहीं कि उसके नेता अदालत के दरवाजे या फिर कठघरे में पहुंचा दिए जाते हैं। जहां तक ‘नेशनल हेरल्ड’ मामले का सवाल है तो यह मामला कई साल से चल रहा है। इसमें अगर सब कुछ इतना ही बेदाग है, जितना जाहिर किया जा रहा है तो फिर इसमें किसी को भी किसी से डरने की जरूरत क्यों पड़नी चाहिए?

लेकिन आलम यह है कि इस मामले को पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के मामले के समकक्ष खड़ा कर दिया गया। आपातकाल और उसके बाद की इंदिरा गांधी की छवि के रूप में सोनिया गांधी को पेश कर अब कांग्रेस पूरी तरह इस कोशिश में लग गई है कि किस तरह से इस मामले का पार्टी के हित में राजनीतिक इस्तेमाल किया जाए। शायद यही वजह है कि इस मसले पर देश भर में कांग्रेस की ओर से इसके लिए प्रदर्शन हुए, जनता का ध्यान खींचने की कोशिश हुई कि हमारे साथ अत्याचार हो रहा है।

इसके अलावा, भाजपा का कांग्रेस के प्रति जो आग्रह और गुस्सा है, वह कोई हैरानी की बात नहीं। अपनी स्थापना से लेकर अब तक भाजपा को ज्यादातर कांग्रेस के ही हाथों शिकस्त खानी पड़ी है। इसलिए इस पर उसकी प्रतिक्रिया स्वाभाविक है कि भ्रष्टाचार के मामले में पेशी के अभिुयक्तों को ऐसे पेश न किया जाए, जैसे वे स्वतंत्रता सेनानी हैं। जबकि सच यह है कि अभियुक्तों को फैसले तक वैसे भी जबरन पेश करना न्यायोचित नहीं। लेकिन राजनीति को एक जंग मान कर मैदान में खड़े नेताओं को यह सब ध्यान रखना रास नहीं आता। इसलिए राजनीतिक टकराव आग्रहों की लड़ाई में बदल जाता है, जहां द्वेष अपना खुला खेल खेलता है।

अफसोस की बात यह है कि भारतीय राजनीति में चाल, चेहरा और चरित्र की कसौटी पर खुद को सबसे अलग और खास बताने वाली भारतीय जनता पार्टी को अपनी बताई गई खासियतों का खयाल रखना जरूरी नहीं लगता। आज भाजपा और ‘आप’ में एक बड़ी समानता यह है कि दोनों ही पक्ष खुद को बेदाग और दूसरे को दागदार समझते हैं। अरविंद केजरीवाल के नजदीकी नौकरशाह को आरोपों के घेरे में देख कर खुश होने वाली भाजपा सुषमा स्वराज, वसुंधरा राजे और शिवराज चौहान के आरोपों के दायरे में आ जाने के बावजूद इनकी वकालत करने में नहीं हिचकती। इसी तरह, सत्ता में आने के बाद केजरीवाल के जो विधायक जेल की हवा खा चुके हैं, पार्टी उनकी वकालत का रुख अख्तियार न करती।

अब जब खुद अरुण जेटली जैसे कद्दावर नेता बेहद गंभीर आरोपों के घेरे में हैं तब भाजपा का रवैया हास्यास्पद दिख रहा है। अरुण जेटली दिल्ली में क्रिकेट की सबसे बड़ी संस्था डीडीसीए में कई व्यापक घोटालों या गड़बड़ियों के जिन आरोपों में घिरे हैं और वे जिस तरह की सफाई पेश कर रहे हैं, उस पर कोई उन्हें ‘भोला’ शख्स ही कह दे सकता है। लेकिन क्या सचमुच ऐसा है? पहले अरविंद केजरीवाल और फिर भाजपा के नेता कीर्ति आजाद ने जिस तरह के आरोप लगाए हैं, वे बेहद गंभीर हैं और जेटली को मामला टालने के बजाय इस पर पूरी तरह पाक-साफ होने के लिए खुद ही कठघरे में खड़ा हो जाना चाहिए, और प्रधानमंत्री ने तो उन्हें खुद को आडवाणी जी की तरह ‘बेदाग’ दिखने की सलाह दे ही डाली है।

यों भी, जब भ्रष्टाचार के आरोपों पर केजरीवाल के प्रधान सचिव के घर या दफ्तर में छापे या उसकी जांच होनी चाहिए तो जेटली की क्यों नहीं? उन पर तो इल्जाम केजरीवाल ने नहीं, उनकी अपनी पार्टी के ही सांसद कीर्ति आजाद ने लगाए थे। लेकिन जांच में सहयोग करने के बजाए कीर्ति आजाद को ही निलंबित कर दिया गया। क्या यही भाजपा का बाकी पार्टियों के बरक्स अलग ‘चाल, चरित्र और चेहरा’ है? अगर केजरीवाल को अपने अफसर पर लगे आरोपों की जांच में खुद सक्रिय होना चाहिए तो भाजपा को भी जेटली की जांच करवाने में क्यों हिचकने की जरूरत है। और अगर कांग्रेस को इन मामलों में जांच की मांग जायज लग रही है तो ‘नेशनल हेरल्ड’ मामले में उसे परेशान होने की जरूरत क्यों है? अगर आरोप के आधार हैं तो वे किसी पर भी हों, उनकी निष्पक्ष जांच हो।

यह समझना होगा कि राजनीति कोई सर्फ कंपनी का इश्तिहार नहीं कि मेरी कमीज तुम्हारी कमीज से उजली है। यह जुमला बेचने के लिए है। कानून की नजर में अगर केजरीवाल के अफसर को कठघरे में खड़ा होना होगा, तो अरुण जेटली को भी यह साबित करना होगा कि उन पर सामने आए आरोपों का कोई आधार नहीं था। इसके बाद अगर वे पाक-साफ निकलते हैं तो अपनी ही विश्वसनीयता में इजाफा करेंगे। अगर नहीं, तो भारतीय न्याय-व्यवस्था एक बार फिर यह साबित करेगी कि उसके कठघरे में खड़े लोगों का कद नहीं, उसकी नजर में इंसाफ अहम है।

दरअसल, अपनी सुविधा से न्याय-व्यवस्था को शक के दायरे में रखने वाले राजनीतिज्ञ यह भूल जाते हैं कि देश की न्यायिक प्रक्रिया इतनी भी कमजोर बुनियाद पर नहीं खड़ी है कि कोई भी उसे अपने हक में या खिलाफ यों ही इस्तेमाल कर ले। अगर वास्तव में ऐसा आम होता तो व्यवस्था कब की चरमरा गई होती। न्यायिक व्यवस्था को प्रभावित करने की कोशिशें भी ज्यादातर नाकाम ही रही हैं। इतिहास का यही इशारा है।

आरोपों का कोलाहल
जब मोदी मुझसे राजनीतिक लड़ाई नहीं लड़ पाए तो इस तरह की कायरता पर उतरे। वे कायर और मनोरोगी हैं। ममता दीदी यह अघोषित इमरजेंसी है। अगर राजेंद्र मेरे सचिव न होते तो क्या सीबीआइ रेड करती। नहीं। तब कौन निशाना है, राजेंद्र या मैं। … अरविंद केजरीवाल, दिल्ली के मुख्यमंत्री
जेटली पर आडवाणी का ‘हवाला’
सरकार को बदनाम करने के लिए कांग्रेस मुद्दे गढ़ रही है और जेटली के खिलाफ लगाए गए आरोपों में भी वैसा ही होने जा रहा है जैसा आडवाणी पर लगाए गए हवाला के आरोपों का हुआ था। सुषमा स्वराज, शिवराज सिंह चौहान और वसुंधरा राजे जैसे भाजपा नेताओंं को ऐसे ही ‘गलत’ आरोपों का सामना करना पड़ा था। –नरेंद्र मोदी, प्रधानमंत्री

न्याय करेंगे प्रधानमंत्री
मेरी लड़ाई डीडीसीए में भ्रष्टाचार के खिलाफ है, न कि किसी व्यक्ति के खिलाफ। मैं उम्मीद करता हूं कि प्रधानमंत्री मेरे आग्रह को सुनेंगे और न्याय करेंगे। मैं मार्गदर्शक मंडल से भी कहूंगा कि वह आगे आए और इस मामले को देखे। मैं कब और कहां पार्टी-विरोधी गतिविधियों में लिप्त रहा? मेरा असल दोष क्या है? सुब्रमण्यम स्वामी ने मुझसे कहा है कि वे नोटिस का जवाब तैयार करने में मेरी मदद करेंगे। मैं पार्टी के बाहर से डीडीसीए में भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई लड़ता रहा। इसलिए मैं जानना चाहूंगा कि क्या मेरा निलंबन भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज उठाने की वजह से है?… कीर्ति आजाद, निलंबित भाजपा सांसद

अब बता रहे प्रतिशोध
कीर्ति के मुद्दे हैं-पहला, क्या क्रिकेट का मामला पार्टी अनुशासन के दायरे में आता है और दूसरा, उच्चतम न्यायालय में बीसीसीआइ पर चल रहे मामले के कारण क्या पार्टी का निर्णय अदालत में उत्तरदायी है। जब मैंने नेशनल हेरल्ड मामला दायर किया तो सीआरटी (कांग्रेस ट्वीपल) मूर्खों ने कहा कि यह मेरा प्रतिशोध है। अब मैं कीर्ति का मार्गदर्शन कर रहा हूं और उन्होंने इसे एजे (अरुण जेटली) के खिलाफ प्रतिशोध बताया है।  …सुब्रमण्यम स्वामी, भाजपा नेता

आजाद आज के नायक
वित्त मंत्री के लिए यह मुद्दा राजनीतिक रूप से लड़ा जाना चाहिए, ना कि कानूनी तरीके से। जैसा कि हमारे ऊर्जावान, गतिशील प्रधानमंत्री ने सलाह दी है, हमारे वित्त मंत्री आडवाणीजी का अनुसरण कर पाक-साफ निकल सकते हैं। कीर्ति आजाद-आज के नायक हैं। दोस्तों से विनम्र निवेदन है कि किसी साथी के खिलाफ बिना सोचे समझे, बलपूर्वक कार्रवाई नहीं की जाए, जो भ्रष्टाचार के खिलाफ संघर्ष कर रहा है।… शत्रुघ्न सिन्हा,भाजपा सांसद

आरोपी या ‘स्वतंत्रता सेनानी’!
देश के इतिहास में पहली बार हम भ्रष्टाचार के लिए लड़ते हुए देख सकते हैं, वह भी काफी शर्मनाक तरीके से। देश ने भ्रष्टाचार के समर्थन में आज उनके (कांग्रेस)आंदोलनकारी रवैये को देखा। लगता है कि वे भ्रष्टाचार के मामले में आरोपी नहीं हैं बल्कि कोई महान स्वतंत्रता सेनानी हैं जो सड़कों पर उतरे हैं। जो लोग बेईमान हैं उन्हें ऐसे लोगों के तौर पर पेश किया जा रहा है कि उन्होंने कुर्बानियां दी हैं।…. मुख्तार अब्बास नकवी, भाजपा नेता

जेटली को इस्तीफे का संकेत
आडवाणी के साथ तुलना करके प्रधानमंत्री ने अरुण जेटली को संकेत दिया है कि उन्हें इस्तीफा देना चाहिए, खुद को पाक-साफ साबित करना चाहिए और फिर वापसी करनी चाहिए। मैं इसे जेटली को मिले इस संकेत के तौर पर देखता हूं कि आप भी वही करिए।… सीताराम येचुरी, माकपा अध्यक्ष

जमानत पर जश्न!
उन्हें जमानत मिली है न कि कोई पुरस्कार मिला है जिसका वे जश्न मनाएं। यह कानूनी प्रक्रिया है और इससे सरकार को कोई लेना-देना नहीं है। उन पर हजारों करोड़ रुपए की संपत्ति हासिल करने के आरोप हैं और अदालत ने इसका संज्ञान लेकर उन्हें समन जारी किया है। उन्हें जमानत मिल गई है न कि जश्न मनाने के लिए पुरस्कार मिला है।… प्रकाश जावड़ेकर, केंद्रीय पर्यावरण मंत्री

जमानत और ‘जंग’
वर्तमान सरकार जानबूझकर विपक्ष को निशाना बना रही है और ऐसा करने के लिए सरकारी एजंसियों का पूरा इस्तेमाल कर रही है। कोई भी इससे डरने वाला नहीं है। हम अपनी लड़ाई जारी रखेंगे।… सोनिया गांधी, कांग्रेस अध्यक्ष

झुकने वाले नहीं
मोदीजी झूठे आरोप लगाते हैं और सोचते हैं कि विपक्ष झुक जाएगा, मैं और कांग्रेस पार्टी झुकने वाले नहीं हैं। कांग्रेस गरीबों और शोषितों के लिए लड़ेगी और एक भी इंच पीछे हटे बिना विपक्ष में काम करेगी।.. राहुल गांधी, कांग्रेस उपाध्यक्ष

शिद्दत से लड़ेंगे
कांग्रेस पार्टी एकजुट है और शिद्दत से लड़ेगी क्योंकि हम कुछ खास मूल्यों, खास विचारों के लिए खड़े हैं और कोई भी कांग्रेस पार्टी को उस मार्ग से अलग नहीं कर सकता।… मनमोहन सिंह, पूर्व प्रधानंत्री

नेशनल हेरल्ड घटनाक्रम
जनवरी 2013: भाजपा नेता सुब्रमण्यम स्वामी ने सोनिया, राहुल, उनकी कंपनियों तथा इससे जुड़े लोगों के खिलाफ दिल्ली की एक अदालत में नेशनल हेराल्ड मामला दायर किया।

26 जून 2014: दिल्ली की एक अदालत ने अब बंद हो चुके ‘नेशनल हेराल्ड’ का मालिकाना हक हासिल करने के लिए कथित रूप से धोखाधड़ी और कोष के गबन की आपराधिक शिकायत पर सोनिया और राहुल को आरोपी के रूप में तलब किया।

एक अगस्त : दिल्ली उच्च न्यायालय ने सात अगस्त को तलब होने के लिए जारी सम्मन पर रोक की मांग को लेकर इस मामले में सोनिया, राहुल तथा अन्य द्वारा दायर याचिकाओं पर स्वामी को नोटिस जारी किया।

छह अगस्त: उच्च न्यायालय ने सोनिया, राहुल और अन्य के खिलाफ कार्यवाही पर रोक लगाई।

15 दिसंबर : उच्च न्यायालय ने रोक अपील के निपटारे तक बढ़ाई।

12 जनवरी 2015: न्यायाधीश ने सोनिया और राहुल की याचिका पर सुनवाई से खुद को अलग किया।

27 जनवरी : उच्चतम न्यायालय ने स्वामी से उच्च न्यायालय में शीघ्र सुनवाई के लिए एक मामला बनाने के लिए कहा क्योंकि याचिका पर सीधे तौर पर सुनवाई नहीं की जा सकती।

चार दिसंबर: उच्च न्यायालय ने याचिकाओं पर आदेश सुरक्षित रखा।

सात दिसंबर: उच्च न्यायालय ने इस मामले में सोनिया और राहुल को निचली अदालत के सम्मन को खारिज करने से इंकार किया।

आठ दिसंबर: दिल्ली की अदालत ने सोनिया, राहुल और अन्य को 19 दिसंबर को उसके सामने व्यक्तिगत रूप से पेश होने का निर्देश दिया।

19 दिसंबर: सोनिया, राहुल, मोतीलाल वोरा, आस्कर फर्नांडीज और सुमन दुबे यहां पटियाला हाउस अदालत परिसर में मेट्रोपोलिटन मजिस्ट्रेट के सामने पेश हुए और जमानत ली। सह आरोपी सैम पित्रोदा को स्वास्थ्य आधार पर व्यक्तिगत रूप से हाजिर होने से छूट दी गई।

Next Stories
1 पी चिदंबरम का कॉलम दूसरी नजर : सुनियोजित सनक की भनक
2 तवलीन सिंह का कॉलम वक़्त की नब्ज़ : पहले विकास का पहिया चलाइए
3 ब्‍लॉग: लालू हों या नीतीश, सरकारी तंत्र पर कब्‍जा है बिहार की चुनावी राजनीति का मुख्‍य लक्ष्‍य
ये पढ़ा क्या?
X