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संपादकीयः हवा की फिक्र

देर से सही, प्रदूषण के मसले पर दिल्ली और हरियाणा के मुख्यमंत्रियों के बीच हुई बैठक एक महत्त्वपूर्ण पहलकदमी है।

Author Published on: November 17, 2017 2:54 AM
प्रदूषण को लेकर हुई केजरीवाल और खट्टर की मुलाकात

देर से सही, प्रदूषण के मसले पर दिल्ली और हरियाणा के मुख्यमंत्रियों के बीच हुई बैठक एक महत्त्वपूर्ण पहलकदमी है। दरअसल, पिछले करीब एक हफ्ते से दिल्ली की आबोहवा में जिस पैमाने पर प्रदूषण घुला हुआ है, उससे निपटना एक आपात जरूरत है। यह कोई ऐसी आपदा नहीं है, जिससे पूरी तरह बचने की गुंजाइश निकल सके। घर के भीतर हों या बाहर, समान रूप से जब सांस तक लेने में तकलीफ होेने लगे तो संकट के स्तर का अंदाजा लगाया जा सकता है। इसके मद््देनजर दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल और हरियाणा के मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर की बैठक के बाद समस्या से निपटने के लिए कई उपायों की घोषणा की गई है। इसमें सबसे ज्यादा जोर औद्योगिक इकाइयों और वाहनों से होने वाले प्रदूषण को कम करने पर दिया गया है। बड़ी तादाद में सीएनजी बसें चलाने के साथ-साथ यातायात से होने वाले प्रदूषण को रोकने की कोशिशों पर भी सहमति बनी है। हालांकि दिल्ली सरकार ने पराली जलाए जाने से वायु प्रदूषण के स्तर में बढ़ोतरी का सवाल उठाया, लेकिन हरियाणा की ओर से इसे ज्यादा अहमियत नहीं दी गई।

यह सही है कि पराली जलाना दिल्ली में प्रदूषण की अकेली वजह नहीं है। लेकिन इसकी भूमिका से पूरी तरह इनकार भी नहीं किया जा सकता। खुद हरियाणा में पराली जलाने के खिलाफ सरकार ने सख्त कदम उठाए और चौदह सौ से ज्यादा लोगों पर कानूनी कार्रवाई की गई। पंजाब में इस दिशा में कुछ खास नहीं हुआ, जबकि हरियाणा के मुकाबले वहां पराली जलाने के ज्यादा मामले पाए गए हैं। इसके बावजूद यह ध्यान रखने की जरूरत है कि दिल्ली में मौजूदा समस्या के गंभीर होते जाने में पराली की भूमिका तात्कालिक है, साल के बाकी महीने भी इस महानगर में लोग प्रदूषित हवा में ही सांस ले रहे होते हैं। यह दलील दी जा सकती है कि कोहरे और धुएं के संयोग से पैदा होने वाली ‘स्मॉग’ की मार अस्थायी है और इसकी जड़ में औद्योगिक इकाइयों से लेकर वाहनों आदि से होने वाला प्रदूषण ज्यादा जिम्मेवार और स्थायी समस्या है। लेकिन इस साल स्मॉग ने दिल्ली के जनजीवन के सामने जिस तरह की चिंता पैदा की, वह अचानक खड़ी हुई कोई नई मुश्किल नहीं है। पिछले साल भी कई दिनों तक दिल्ली और आसपास के इलाकों में कोहरे और धुएं की वजह से जैसे हालात बने थे, इस साल फिर से वैसा संकट पेश आने को लेकर सचेत होना चाहिए था।

साल भर अलग-अलग मौके पर प्रदूषण के मसले पर तमाम अध्ययन रिपोर्ट या फिर खबरें आती रहती हैं, लेकिन प्रदूषण से निजात दिलाने के लिए ठोस उपाय करना सरकार को जरूरी नहीं लगता। सड़कों पर वाहनों की तादाद में जिस गति से इजाफा हो रहा है, उसे नियंत्रित करने की दिशा में शायद ही कभी विचार किया जाता है। रोजाना के सफर को सहज बनाने के लिए सार्वजनिक परिवहन को बेहतर करने के बजाय इस हालत में छोड़ दिया गया है कि लोग निजी वाहनों से आवाजाही को तरजीह देते हैं। दिल्ली में सार्वजनिक यातायात की रीढ़ बन चुकी मेट्रो के किराए में हाल में जिस कदर बेलगाम बढ़ोतरी की गई, उसकी वजह से हर रोज डेढ़ लाख यात्री कम होने की खबरें आर्इं। सवाल है कि सार्वजनिक परिवहन को बढ़ावा दिए बगैर निजी वाहनों के इस्तेमाल से लोगों को दूर कैसे किया जाएगा! दिल्ली में प्रदूषण की वजहें अनजानी नहीं हैं। असल चुनौती निदान की नहीं, समाधान की है, जिसके लिए मजबूत राजनीतिक इच्छाशक्ति की दरकार है।

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