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बेबाक बोलः आह ताज!

सत्रहवीं शताब्दी में निर्मित वास्तुशिल्प के इस हैरतअंगेज शाहकार को लेकर कवियों-शायरों की कलम ने खुल कर अपना इजहारे-खयाल किया।

योगी सरकार ताजमहल के सहारे निवेशकों को लुभाने की तैयारी में है। (फाइल फोटो)

ताज तेरे लिए इक मजहरे-उल्फत ही सही
तुझको इस वादी-ए-रंगीं से अकीदत ही सही,
मेरी महबूब कहीं और मिला कर मुझको।
सत्रहवीं शताब्दी में निर्मित वास्तुशिल्प के इस हैरतअंगेज शाहकार को लेकर कवियों-शायरों की कलम ने खुल कर अपना इजहारे-खयाल किया। लेकिन लगता है कि अपराध और मुनाफाखोरी के इस दौर में ताज को देखने के ख्वाहिशमंदों ने साहिर लुधियानवी के ताजमहल के प्रति जज्बात को कुछ ज्यादा ही संजीदगी से ले लिया। यह दीगर है कि ताजमहल से मुंह मोड़ने के कारण अलग हैं। साहिर ने बेपनाह मुहब्बत के इस नमूने को अपनी मुफलिसी का मजाक समझा और अपनी प्रेयसी से इसरार किया कि वह उसे शानो-शौकत और शाही दंभ की इस मिसाल से परे कहीं दूर मिले, लेकिन ताज पर पिछले वर्ष दाखिल पदचापों की कमी के कारण को अगर जानने की कोशिश की जाए तो जाहिर है कि उसका बायस साहिर की शायराना सोच से इतर है।
शहर में दाखिल होते ही इस बात का साफ इशारा मिला कि बाहुबल के लिए मशहूर उत्तर प्रदेश की सरकार को शायद ही अपनी अप्रतिम विरासत का कोई खास अहसास है। चमकते नीले रंग के होर्डिंग्स को अगर छोड़ दें तो आगरा की हद में दाखिल होते ही शहर अव्यवस्था व कमजोर आंतरिक ढांचे की लगभग दुहाई देता महसूस होता है। यह बदकिस्मती नहीं तो क्या है कि पंद्रहवीं शताब्दी से लेकर मुगल सल्तनत के एक अहमतरीन वक्फे तक देश की राजधानी रहे इस शहर पर अब प्रशासनिक नजरअंदाजी का काला साया है। जिन लोगों ने पिछले दो दशक तक अलग-अलग समय पर ताजमहल को देखा है, उनको यहां पर विदेशी पर्यटकों की कमी सहज ही खलती है। यहां अब विदेशी सैलानियों की वैसी हलचल नहीं, जैसी अतीत में रहती रही है।
यह बात अभी हाल ही में पर्यटन मंत्रालय की एक रिपोर्ट में भी सामने आई है। जिसके मुताबिक देश में विदेशी पर्यटकों की संख्या में इतनी बढ़ोतरी हुई कि उपेक्षित हो रहे पर्यटन की हौसलाआफजाई हुई है। लेकिन ताजमहल का दीदार करने आने वालों की संख्या में 8.4 फीसद की कमी दर्ज की गई है। क्या यह सोचने की बात नहीं कि मुहब्बत की इस नूरानी निशानी को देखने को तरसने वालों ने इससे मुंह क्यों मोड़ा? यहां आने वालों को यहां की बदइंतजामी का सहज ही अंदाजा हो जाता है। ताज की सुरक्षा में लगे जवानों से लेकर यहां खुद पैदा हुए गाइडों की बेरुखी भी ताज के दीदार में बाधक बनती है। हालांकि उस गाइड की बेरुखी तब गायब हो जाती है जब आप मुहब्बत की इस निशानी को देखने के लिए उसे अपना मार्गदर्शक बनाते हैं। बाकी आपको तिरस्कार से ही देखते हैं। ताज की सुरक्षा की जरूरत से किसी को इनकार नहीं, लेकिन उसके कारण अदब से नाता तोड़ना कोई समझदारी की बात नहीं। खासतौर पर तब जबकि ऐसे ही कारणों से पर्यटक अतीत की इस नूरानी निशानी से दूर हो रहे हैं।
ताज को नजरों के जरिए अपनी रूह में बसा लेने वाले विदेशी पर्यटकों में यह कमी कोई अचानक नहीं आई है। सर्वेक्षण की मानें तो यह कमी पिछले तीन-चार सालों में बढ़ती चली जा रही है। लिहाजा इस पर अफसोस से अलग और क्या हो सकता है कि केंद्र या राज्य सरकार किसी को भी इस बात की चिंता नहीं कि इस पर रोक लगाई जाए।
ताज के आसपास मुनाफाखोरों पर भी सरकार का कोई अंकुश नहीं और न ही इसे व्यवस्थित करने की कोई कोशिश। आगरा में अपराधी भी बेरोकटोक हैं। पिछले साल ताज के पर्यटन केंद्र पर विदेशियों की ओर से छह और कुल डेढ़ दर्जन एफआइआर दर्ज की गई। यहां होने वाली छोटी-मोटी चोरियों व ठगी का तो शायद ही कोई हिसाब हो। यही वजह है कि लोग अब यहां का रुख करने से कतराने लगे हैं। इतने सालों से सरकार यहां वाहनों की पार्किंग के लिए भी कोई व्यावहारिक ढांचा खड़ा नहीं कर पाई। यही वजह है कि यहां की सड़कों पर अराजकता का आलम है।
देश-विदेश में ऐसे आकर्षणों पर पर्यटन का विस्तार इश्तहारों से ज्यादा मुंहजबानी प्रचार पर चलता है। बदइंतजामी के कारण अब ताज का बार-बार दीदार करने की तमन्ना का लोग खुद ही गला घोंटने लगे हैं। इस पर शायद ही कोई दूसरा बयान हो कि देश को विदेश में मकबूलियत दिलाने में ताजमहल का अपना बड़ा योगदान है, लेकिन किसी ने भी इसके समुचित रख-रखाव पर जोर नहीं दिया। ‘हमारे यहां भी बाकी देश की तरह है। चुनाव के समय में यहां सुविधाओं का वादा किया जाता है, लेकिन खत्म होते ही उसे भुला दिया जाता है’ – यह कहना था स्थानीय नागरिक आरिफ का। लेकिन ताज को फिर से बेताज बनाने के लिए जितना सरकारी निजाम को सोचने की जरूरत है, इससे कहीं ज्यादा आगरा के बाशिंदों को भी है।
किसी को भी यह जानने के बाद कि वे आगरा के हैं, इनकी मेहमानवाजी की चाहत होने लगती है। इसलिए बेहतर मेहमाननवाजी का हक भी अदा करना होगा। शहर के बाशिंदों को अपना व्यवहार भी ताज जैसा बेमिसाल करना होगा, वरना ताज की देहरी पर पड़ती पदचापों के धीमा होने का सिलसिला कहीं जारी ही न रहे। ताज की ओर लोगों की खासकर विदेशी पर्यटकों की बेरुखी चिंता का विषय है। खास तौर पर तब जबकि देश में आने वाले विदेशी पर्यटकों की संख्या में 4.4 फीसद वृद्धि हुई है। 2014 में देश में जहां 77.03 लाख पर्यटक आए, वहीं 2015 में विदेशी पर्यटकों की संख्या बढ़ कर 80.16 लाख हो गई। ताजमहल, जिसने उत्तर प्रदेश को विश्व के नक्शे पर अजीमोतरीन जगह दी, को लेकर राज्य सरकार को सोचना चाहिए और इसकी शुरुआत उसके आसपास मजबूत आंतरिक ढांचा खड़ा करके की जा सकती है। शहर की सार्वजनिक परिवहन व्यवस्था को भी फौरी मदद की जरूरत है।
राज्य सरकार के लिए यह चिंता इसलिए भी होनी चाहिए कि ताज की तरफ लोगों का झुकाव पिछले दो-तीन साल से ही कम हुआ है। प्रदेश में समाजवादी सरकार की स्थापना के बाद उनकी अगुआई युवा मुख्यमंत्री अखिलेश यादव के हाथ में होने के बावजूद ताज से पर्यटकों का कटना जारी है। 2012 में ताज को देखने आने वाले विदेशी पर्यटकों की संख्या जहां 7.9 लाख थी, वहीं 2013 में यह 7.4 लाख, 2014 में 6.94 लाख और 2015 में घटकर 6.36 लाख ही रह गई। आंतरिक ढांचे, परिवहन और बुनियादी सुविधाओं को छोड़ भी दें तो यहां निजी पर्यटक स्थलों पर भी सुविधाओं की बेहद कमी है।
होटलों व रेस्तराओं में भी सैलानियों से मनमानी वसूली की जाती है। इस पर कहीं अंकुश लगाने की कोई खास कोशिश किसी भी तरफ से नहीं की जा रही। ताज के आसपास ‘अतिथि देवो भव:’ का वादा करने वाले भारत में ऐसी भावना का कोई बहुत प्रबल प्रदर्शन कहीं दिखाई नहीं देता। सबकी नजर पर्यटक की जेब पर ही टिकी रहती है।
प्रशासनिक नजरअंदाजी के अलावा ताजमहल पर कुदरती कहर भी अपनी मार करता रहता है। ऐसे सर्वेक्षण 2007 में ही आ गए थे कि सफेद संगमरमर की यह इमारत पानी और प्रदूषण की शिकार हो रही है। राज्यसभा सांसद सीताराम येचुरी की अगुआई में ताजमहल की तब की मौजूदा स्थिति का जायजा लेने गए एक संसदीय दल ने अपनी रिपोर्ट में इस पर गहन चिंता जताई थी कि प्रदूषण के कारण ताजमहल पीला पड़ता जा रहा है। तब यह सिफारिश भी की गई थी कि इस विश्व प्रसिद्ध इमारत की मौलिक खूबसूरती को बचाए रखने के लिए पुरातत्त्व सर्वेक्षण विभाग को आगे आना चाहिए। समय के साथ ताज पर प्रदूषण का यह प्रकोप बढ़ता ही जा रहा है। सरकार ने इससे पहले ताज के संरक्षण के लिए जो कदम उठाए थे वे कोई वांछित प्रभाव नहीं छोड़ पाए। ताज को बचाने के लिए देश के सर्वोच्च न्यायालय ने भी अपनी चिंता जताई थी।
आगरा दिल्ली से निचाई पर यमुना के किनारे स्थित है और यमुना का पानी यहां तक आते-आते अति प्रदूषित व विषैला हो जाता है, जिसके कारण ताज की बुनियाद ही कमजोर होती जा रही है। आगरा में समुचित प्रशासनिक मुस्तैदी न होने के कारण लोग-बाग यमुना में सीधे ही सीवरेज और खराब पानी को मिला देते हैं। यहां के कई लोग और पर्यटक तक हर रोज के फालतू सामान को सीधे यमुना में फेंकने से गुरेज नहीं करते। हालांकि हालिया समय में थोड़ी जागरूकता के कारण इनमें एक हद तक कमी आई है।
यह चिंता भी जताई जा रही है कि मुगल शहंशाह शाहजहां ने अपनी बेगम मुमताज महल को समर्पित जो इमारत साढ़े तीन सौ साल से भी ज्यादा पहले बनवाई थी, वह इसकी बुनियाद में दरारें पड़ जाने के कारण टेढ़ी हो रही है। ऐसे हालात में आने वाले कुछ वर्ष ताज के अस्तित्व को बचाए रखने के लिए बड़े अहम होने वाले हैं। इस इमारत को सहेजने की इस पीढ़ी की कोशिशें सफल हुर्इं तभी यह आने वाली पीढ़ियों को अपनी बेपनाह खूबसूरती का नूर दे पाएगा।
ताज की खूबसूरती को नजरअंदाज कर उसे एक नए पहलू से देखने वाले साहिर के इस पर न जाने के कारण अलग थे। उन्होंने ताज को अमीराना इश्क के अश्लील इश्तिहार की तरह देखा और खुद को अपनी मुफलिसी से आगाह कराया, कुछ इस तरह :
मेरी महबूब पस-ए-पर्दा-ए-तशहीरे वफा
तूने सतवत के निशानों को तो देखा होता
मुर्दा शाहों के मकाबिर से बहलने वाली
अपने तारीक मकानों को तो देखा होता।
अपनी मुफलिसी के अलावा साहिर ने बयां की इस मिसाल पर इन सब शिल्पकारों के लिए भी आंसू बहाए जिनके (ऐसा माना जाता है) कि शहंशाह ने हाथ कटवा दिए, ताकि फिर कभी ऐसा कोई और शाहकार खड़ा न कर पाएं।
इन सबसे मुख्तलिफ यह सच अपनी जगह पर कायम है कि ताजमहल आज दुनिया भर की निगाहों का मरकज है। खासतौर पर तब जबकि इसे दुनिया के अजूबों में एक अनूठा मुकाम हासिल है। साहिर की मान भी लें कि एक शहंशाह ने वफा की आड़ में अपनी मुहब्बत का इश्तिहार खड़ा किया तो भी यह सच है कि इस इश्तिहार की खूबसूरती आपको बरबस ही अपना बना लेती है। समूचे विश्व में हजारों-लाखों लोग इसी ताज की कदमबोसी करते हुए यहां वफादारी का दम भरते हैं। प्यार का यह नायाब नमूना चाहे मंदिर हो या मकबरा, जिसने भी बनवाया हो, सहेज कर रखने लायक है। वास्तुशिल्प की ऐसी उम्दा मिसाल किसी भी देश-प्रदेश के लिए फख्र का बायस है। यही वजह है कि इसे संभालने की जरूरत है, फिर चाहे इसके संगमरमर में कोई शहंशाह की बेगम दफन हो या न हो। यह विवाद इतिहासविदों पर छोड़कर हम अपने मुल्क की इस अनूठी विरासत को सहेजने में अपना भी योगदान दें। चाहे एक कदम चल कर ही।
वरना मौजूदा सिलसिला जारी रहा तो सरकारों की तो मालूम नहीं, लेकिन ताज को जुनून की हद तक चाहने वाले शब्द-शिल्पकारों को भी अपनी कलम का रुख बदलना होगा। वरना कोई और साहिर आएगा, जो ताज की खूबसूरती को देखने की हसरतों के दफन होते मकबरे के कारणों पर लफ्जों की इमारत खड़ी करेगा, न कि इसकी हैरतअंगेज खूबसूरती पर।

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