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‘जजों की नियुक्ति के लिए पूर्णकालिक संस्था बनाई जाए’

सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता और ‘कैंपेन फॉर जूडीशियल एकाउंटेबिलिटी एंड रिफार्म्स’ के संयोजक प्रशांत भूषण का मानना है कि उच्च अदालतों में नियुक्तियों के सवाल पर खींचतान को खत्म करने की ईमानदार कोशिश नहीं हो रही।
Author November 26, 2016 02:12 am

दीपक रस्तोगी

सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता और ‘कैंपेन फॉर जूडीशियल एकाउंटेबिलिटी एंड रिफार्म्स’ के संयोजक प्रशांत भूषण का मानना है कि उच्च अदालतों में नियुक्तियों के सवाल पर खींचतान को खत्म करने की ईमानदार कोशिश नहीं हो रही। न ही इस बात का प्रयास किया जा रहा है कि भाई-भतीजावाद को परे रखकर अदालतों के लिए मजबूत और ईमानदार जजों को बहाल किया जाए। खींचतान के पीछे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) का एजंडा है। केंद्र में सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी का पितृसंगठन आरएसएस दरअसल, न्यायपालिका में अपने अनुकूल और एकदम कमजोर लोगों को बिठाना चाहता है। इसी कारण सरकार ने जजों की नियुक्ति की कॉलिजियम की सिफारिशें लटका रखी हैं। प्रस्तुत है, प्रशांत भूषण से हुई बातचीत के प्रमुख अंश :

सवाल : जजों की नियुक्ति के लिए ‘कॉलिजियम’ के भेजे नाम सरकार ने नहीं माने। नामों को दोबारा सरकार के पास भेजा गया है। न्यायपालिका और कार्यपालिका के बीच खींचतान क्यों?
जवाब : न्यायपालिका में जजों की बेहद कमी है। 40 फीसद से ज्यादा सीटें रिक्त हैं। ऐसा क्यों है, यह अलग सवाल है। कॉलिजियम किसी नाम की संस्तुति करे तो बगैर किसी ठोस कारण के सरकार मना नहीं कर सकती। सरकार लौटाती है और कॉलिजियम दोबारा सिफारिश करती है तो उसे मानने की बाध्यता है। अभी तो सरकार कॉलिजियम के भेजे नामों पर बैठी रही। सुप्रीम कोर्ट से डांट पड़ी तो 43 नाम सरकार ने वापस कर दिए, जिन्हें दोबारा भेजा गया है। दरअसल, केंद्र की सत्ता में काबिज भाजपा खुलकर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के एजंडे पर काम कर रही है और आरएसएस सभी स्वायत्त संस्थाओं पर पूरा नियंत्रण चाहता है। इस लिहाज से न्यायपालिका में वे मनोनुकूल लोग चाहते हैं। वे स्वतंत्र रूप से काम करने वाले ‘टफ’ लोगों को नहीं आने देना चाहते।
सवाल : ‘कॉलिजियम’ बनाम ‘नेशनल जूडीशियल अप्वाइंटमेंट कमीशन’ (एनजेएसी) का माहौल क्यों बन रहा है?
जवाब : न्यायपालिका का तर्क है कि एनजेएसी से राजनीतिक दखल बढ़ेगा। 1973 में इंदिरा गांधी ने न्यायपालिका की स्वायत्तता को खंडित किया और सरकार ने भारत के मुख्य न्यायाधीश से सलाह लेकर जजों की नियुक्ति शुरू कर दी। फिर सरकार ने कह दिया कि वह चीफ जस्टिस की सलाह से नहीं बंधी है। 1993 में सुप्रीम कोर्ट ने दखल दिया। कॉलिजियम प्रणाली बनाई गई। न्यायपालिका में राजनीतिक हस्तक्षेप तो खत्म हुआ, लेकिन पारदर्शिता को लेकर सवाल उठने लगे। भाई-भतीजावाद बढ़ा। जस्टिस सौमित्र सेन और जस्टिस पीडी दिनाकरन इसकी देन रहे, जिन पर महाभियोग चला और उन्हें हटना पड़ा। इस कारण अलग संस्था की बात उठने लगी। एनजेएसी एक्ट के जरिए न्यायपालिका पर सरकार नियंत्रण चाहती है।
सवाल : ‘कैंपेन फॉर जूडीशियल एकाउंटेबिलिटी एंड रिफार्म्स’ (सीजेएआर) के सुझाव और एनजेएसी के प्रस्ताव में क्या फर्क है?
जवाब : सीजेएआर पहले से ही मांग करता रहा है कि उच्च अदालतों में जजों की नियुक्ति के लिए एक पूर्णकालिक संस्था बनाई जाए, जो सरकार और न्यायपालिका-दोनों से स्वतंत्र हो। बड़ी अदालतों में हर साल सैकड़ों जजों की नियुक्ति करनी होती है। इसके लिए हजारों उम्मीदवारों को परखना चाहिए। अगर चयन प्रक्रिया पुख्ता रखनी है तो एनजेएसी जैसी संस्था से काम नहीं चलने वाला। क्योंकि, इसमें शामिल जज और विधि मंत्री पहले से ही व्यस्त होंगे। पारदर्शिता आएगी कहां से?

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