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मनमानी मुठभेड़

देश में अपराधियों से निपटने के लिए पुलिस की मनमानियों और फर्जी मुठभेड़ों को लेकर लंबे समय से आवाज उठती रही है।

पुलिस को अपराध रोकने और अपराधियों में कानून का भय पैदा का सबसे आसान रास्ता शायद मुठभेड़ में अपराधियों को मार गिराना नजर आता है। पुलिस की यह प्रवृत्ति बहुत पुरानी है और हर मुठभेड़ के पीछे उसकी लगभग एक-सी दलील होती है। प्राय: पुलिस की गिरफ्त से भागने का प्रयास और पुलिसकर्मी का हथियार छीन कर हमला करने की कोशिश जैसे तर्क आम हैं। हैदराबाद मुठभेड़ मामले में भी यही दलील दी गई थी कि आरोपियों ने पुलिस का हथियार छीन कर हमला करने और निकल भागने का प्रयास किया था, जिसमें मुठभेड़ हुई और तथाकथित बदमाश मारे गए। मगर मामले की जांच कर रहे आयोग ने उस मुठभेड़ को फर्जी करार देते हुए संबंधित पुलिसकर्मियों के खिलाफ आपराधिक मामले दर्ज करने को कहा है।

गौरतलब है कि करीब ढाई साल पहले हैदराबाद के एक टोल नाके से एक लड़की का अपहरण कर लिया गया था। फिर बलात्कार के बाद उसे मार कर फेंक दिया गया। उस घटना को लेकर देश भर में खासा रोष पैदा हो गया था। कुछ दिन बाद ही हैदराबाद पुलिस ने चार लोगों को गिरफ्तार कर लिया था। उन्हें लेकर वह मौका-ए-वारदात पर गई और वहीं मुठभेड़ बता कर चारों को मार गिराया था।

हैदराबाद पुलिस की उस कार्रवाई की बहुत सारे लोगों ने तारीफ भी की थी, मगर चूंकि लड़की के बलात्कार में शक की सुई कुछ दूसरे लोगों पर अटकी हुई थी, इसलिए कुछ लोगों को हैदराबाद पुलिस की मुठभेड़ वाली कार्रवाई गले नहीं उतरी थी। वह गिरफ्तारी और मुठभेड़ इस कदर नाटकीय थी कि प्रथम दृष्टया ही उस पर संदेह होता था। इसलिए उसकी जांच का आदेश दिया गया। जांच में शक सही साबित हो गया है।

अब अगर संबंधित पुलिस कर्मियों के खिलाफ कार्रवाई होती है, तो उन चारों कथित बदमाशों की हकीकत सामने आएगी, बलात्कार मामले से जुड़े लोगों की पहचान का सिरा भी मिल सकेगा। दरअसल, मुठभेड़ में तथाकथित आरोपियों को मार गिराने के बाद पुलिस का काम आसान हो गया, क्योंकि ऐसा करके उसने अपनी तरफ से मामले का निपटारा कर दिया था। उसमें जांच वगैरह का काम बंद हो गया था। यह पहला मामला नहीं है, जब पुलिस ने जांच और लंबी कानूनी प्रक्रिया से बचने के लिए इस तरह मामले को खत्म करने का प्रयास किया।

देश में अपराधियों से निपटने के लिए पुलिस की मनमानियों और फर्जी मुठभेड़ों को लेकर लंबे समय से आवाज उठती रही है। तमाम मानवाधिकार संगठन ऐेसे मामलों में अदालतों का दरवाजा खटखटाते रहे हैं। कई मामलों में पुलिस को फटकार भी लगाई जा चुकी है। मगर यह प्रवृत्ति खत्म नहीं हुई है। कमोबेश हर राज्य की पुलिस यह तरीका अपनाती है। जबकि मुठभेड़ का मतलब है कि बदमाश पुलिस पर हमला करें और पुलिस अपने बचाव में गोलीबारी करे। इसके अलावा किसी को गोली मारने का पुलिस को अधिकार नहीं है।

मुठभेड़ के वक्त भी उससे यही अपेक्षा की जाती है कि वह कमर के नीचे के हिस्से में गोली मारे और बदमाशों को पकड़ कर अदालत के समक्ष पेश करे, ताकि उनके जरिए मामलों की तह तक पहुंचा जा सके। मगर पिछले कुछ समय से सख्त कानून-व्यवस्था का अर्थ खुद कुछ सरकारों ने बदमाशों को मार गिराना समझ लिया है। उत्तर प्रदेश सरकार तो सार्वजनिक रूप से इसकी घोषणा करती रही है। ऐसे में पुलिस से अपराध रोकने के कानूनी तरीके अपनाने की अपेक्षा बेमानी साबित होती है।

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