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संचार साधनों ने दिए हैं प्रदर्शन के मौके : अनिल

अनिल ने अनेक नाटकों का सृजन किया, उनका मंचन किया, विदेशी नाटकों का हिंदी अनुवाद कर नाट्य प्रेमियों का स्वस्थ मनोरंजन व ज्ञानवर्धन किया। उल्लेखनीय बात यह है कि मुंबई में पृथ्वी थियेटर के एक कार्यक्रम में अनिल के लिखे नाटक का मंचन किया गया जिसमें ओमपुरी ने अभिनय किया था।

Author May 18, 2018 4:24 AM
सच मायने में अनिल मथुरा के सांस्कृतिक जगत की निधि हैं।

अशोक बंसल

छोटे-बड़े परदे की फिल्मों, धारावाहिकों तथा रंगमंच की कहानियों, फिल्मी संवादों आदि के लेखक व निर्देशक अनिल चौधरी ने मथुरा से मुंबई जाकर अपनी कलम और विचारों के बल पर देश-विदेश में खूब शोहरत बटोरी है लेकिन उनका मन आज भी मथुरा के डेम्पियर नगर में गोकुल की कैंटीन और केआर कॉलेज में रमता है जहां उन्होंने अपनी पढ़ाई पूरी कर दिल्ली की तरफ रुख किया। दिल्ली में ‘नेशनल स्कूल आफ ड्रामा’ में निर्देशन की शिक्षा ली और फिर जा पहुंचे मुंबई। सन 1950 में जन्मे अनिल की परवरिश उनके नाना तथा मथुरा के प्रसिद्ध राजनीतिज्ञ चौधरी दिगंबर सिंह (चार बार सांसद रहे) ने की। कवि अशोक चक्रधर के साथी रहे अनिल साम्यवादी विचारों की अलख जगाने वाले विलक्षण शिक्षक सव्यसाची के शागिर्द बने। दिल्ली में अनिल ने अपनी प्रतिभा से नेशनल स्कूल आफ ड्रामा के शिक्षकों का ध्यान आकर्षित किया। मुक्तिबोध की कविता ‘अंधेरे’ का नाट्य रूपांतर कर मंचन किया तो तालियों की गड़गड़ाहट परदेस में ‘टाइम्स’ पत्रिका तक पहुंची।

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अनिल ने अनेक नाटकों का सृजन किया, उनका मंचन किया, विदेशी नाटकों का हिंदी अनुवाद कर नाट्य प्रेमियों का स्वस्थ मनोरंजन व ज्ञानवर्धन किया। उल्लेखनीय बात यह है कि मुंबई में पृथ्वी थियेटर के एक कार्यक्रम में अनिल के लिखे नाटक का मंचन किया गया जिसमें ओमपुरी ने अभिनय किया था। इस नाटक से बॉलीवुड में अनिल की एक ऐसे नाटककार की छवि बनी जो समाज को बदलने में कला को एक हथियार के रूप में इस्तेमाल करना चाहते हैं। अनिल के नाटकों में सामाजिक संदेश के साथ भरपूर मनोरंजन का अद्भुत मिश्रण साफ झलकता है। इसी विशेषता ने अनिल को लोकप्रियता दिलाई। प्रारंभ में टेलीविजन के लिए अनिल ने अनेक सीरियल लिखे। इनमें ‘करमचंद’, ‘कबीर’, ‘ये जो है जिंदगी’, ‘रजनी’ आदि बेहद लोकप्रिय हुए। सीरियल ‘महायज्ञ’ तो सोनी टीवी पर लगातार दो साल तक दिखाया गया।

मथुरा की संस्था ‘जन सांस्कृतिक मंच’ ने अनिल को मथुरा आने का न्योता दिया तो तत्काल पूरी तैयारी के साथ मथुरा आए और स्थानीय चम्पा अग्रवाल इंटर कॉलेज के हाल में सर्वेश्वर दयाल सक्सेना के ‘बकरी’ नाटक का मंचन किया। इस नाटक को मथुरा के बुजुर्ग लोग आज भी याद करते हैं। पिछले दिनों अनिल जब मथुरा आए तो अपने साथियों को मथुरा में साहित्यिक, सांस्कृतिक गतिविधियों को गति देने के लिए उकसाया। वे आजकल मदन मोहन मालवीय के जीवन पर बनाई जा रही फिल्म के निर्देशन में जुटे हैं। सच मायने में अनिल मथुरा के सांस्कृतिक जगत की निधि हैं।

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