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अब सारकोमा कैंसर के मरीजों को नहीं गंवाने होगा हाथ-पैर

कैंसर की एक घातक किस्म यानी सारकोमा से पीड़ित मरीजों के हाथ-पैर कटने से बचाने के लिए एम्स के डाक्टरों ने नाड़ी संबंधी पुनर्निर्माण की प्रक्रिया अपनाते हुए लिंब सैल्वेज सर्जरी शुरू की है।

Author नई दिल्ली | Updated: January 11, 2016 1:25 AM
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कैंसर की एक घातक किस्म यानी सारकोमा से पीड़ित मरीजों के हाथ-पैर कटने से बचाने के लिए एम्स के डाक्टरों ने नाड़ी संबंधी पुनर्निर्माण की प्रक्रिया अपनाते हुए लिंब सैल्वेज सर्जरी शुरू की है। एम्स के निदेशक एमसी मिश्रा ने बताया कि सारकोमा एक-दूसरे से जुड़े टिश्यूज (ऊतकों) में हो जाने वाले घातक ट्यूमरों को कहते हैं और इसका इलाज सिर्फ और सिर्फ सर्जरी ही है। ये ट्यूमर अक्सर 10 सेमी से ज्यादा आकार के होते हैं और वे बड़ी नाड़ियां इनकी चपेट में आ जाती हैं, जो कि हाथ-पैरों तक रक्त पहुंचाती हैं।

यही वजह है कि सर्जन को इससे प्रभावित हुए अंग को सर्जरी के जरिए हटाना ही पड़ता है। सारकोमा अधिकतर हाथ-पैरों और गले वाले क्षेत्र को प्रभावित करता है। मिश्रा ने कहा, ‘शरीर के किसी भी अंग को, विशेष कर हाथ-पैरों को हटाए जाने पर व्यक्ति अपंग हो जाता है। इससे जीवन की गुणवत्ता पर बहुत खराब असर पड़ता है। भारत में यह असर विशेष तौर पर ऐसा होता है क्योंकि यहां पुनर्वास की प्रक्रियाएं उतनी अधिक विकसित नहीं हैं। इसके अलावा कृत्रिम हाथ-पैरों से जुड़ी तकनीक का अभाव है और इसमें खर्च भी बहुत ज्यादा आता है’।

उन्होंने कहा, ‘इसीलिए सबसे अच्छा तरीका यही है कि इन मरीजों के अंग हटाने की जरूरत ही न पड़े। लिंब सैल्वेज सर्जरी के जरिए अंग काटे बिना ही इन घातक ट्यूमरों का सुरक्षित ढंग से इलाज किया जा सकता है’। सर्जिकल ओन्कोलॉजी के सहायक प्रोफेसर डॉक्टर सुनील कुमार के मुताबिक, इलाज के तहत प्रभावित रक्त नलिकाओं का पुनर्निर्माण किया जाता है और मरीज के अपने शरीर से ली गई नाड़ियां और इनसे जुड़े ग्राफ्ट (टुकड़े) लगा दिए जाते हैं।

उन्होंने कहा, ‘यह प्रक्रिया मरीज की शारीरिक दिखावट और उसका आत्मविश्वास बनाए रखती है। जब ट्यूमर में हड्डियां भी प्रभावित होती हैं तो हम कृत्रिम धात्विक रॉड भी लगाते हैं। इन ग्राफ्ट के जरिए हाथ-पैर में रक्त का संचार बनाए रखा जाता है और इस तरह हाथ-पैर की सक्रियता बनाई रखी जा सकती है। तब व्यक्ति कम से कम पुनर्वास सहयोग के साथ भी अपने सामान्य जीवन में लौट सकता है’।

हाल ही में कुमार और उनकी टीम ने बिहार से आए 21 साल के एक युवक की ऐसी सर्जरी की है। इस युवक की जांघ पर 12 सेमी का सारकोमा था, जिसके कारण पैर तक रक्त संचार करने वाली नलिकाएं प्रभावित हो गई थीं। कुमार ने कहा कि सामान्य स्थितियों में यह व्यक्ति अपनी टांग खो बैठता। लेकिन हमने इसकी दोनों रक्त नलिकाओं का निर्माण किया। इसके लिए कृत्रिम नलिका और गर्दन से ली गई नलिका के ग्राफ्ट की मदद ली गई। इस सर्जरी में कम से कम पांच से छह घंटे लगते हैं। पहले ट्यूमर हटाया जाता है और फिर पुनर्निर्माण शुरू किया जाता है।

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