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हमारी याद आएगी: …और खड़ा हुआ पहचान का ‘महल’

नींव के पत्थर नजर नहीं आते, मगर उनका अस्तित्व बना रहता है। भारतीय सिनेमा के इतिहास में खेमचंद प्रकाश नींव के ऐसे ही पत्थर थे। बीकानेर और नेपाल राजघरानों में संगीत और नृत्य-प्रतिभा दिखाने के बाद खेमचंद प्रकाश न्यू थियेटर्स और बांबे टॉकीज जैसी मशहूर फिल्म-निर्माण कंपनियों से जुड़े। यह संयोग ही है कि उनकी फिल्म ‘महल’ से पार्श्वगायकों को सम्मान और हक मिला और उनकी गुमनामी दूर हुई। इससे पहले रेडियो पर फिल्मों के गाने गूंजते थे, मगर रेकॉर्ड पर गायक-गायिकाओं के बजाय फिल्म के हीरो या हीरोइन के निभाए किरदार का नाम छपता था। ‘महल’ के रेकॉर्ड पर भी ‘आएगा आने वाला...’ की गायिका लता की जगह मधुबाला द्वारा निभाए गए किरदार कामिनी का नाम छपा था।

Author Published on: August 10, 2018 3:08 AM
बीकानेर और नेपाल राजघरानों में संगीत और नृत्य-प्रतिभा दिखाने के बाद खेमचंद प्रकाश न्यू थियेटर्स और बांबे टॉकीज जैसी मशहूर फिल्म-निर्माण कंपनियों से जुड़े।

लता मंगेशकर 1942 से फिल्मों में गा रही थीं और मधुबाला भी 1942 से ही फिल्मों में अभिनय कर रही थीं। मगर उनके करियर में जो करंट चाहिए था, वह मिला 1949 की फिल्म ‘महल’ से। ‘महल’ ने न सिर्फ लता मंगेशकर के करियर को रोशन कर दिया, बल्कि मधुबाला को भी रातोंरात सफल हीरोइन बना दिया। बांबे टॉकीज के लिए ‘महल’ बनाई थी अशोक कुमार ने और संगीत दिया था खेमचंद प्रकाश ने। खेमचंद प्रकाश की रागदारियों के बारे में संगीतकार नौशाद का कहना था कि उन्होंने वैसा संगीत बनाने की खूब कोशिशें कीं, मगर कभी भी खेमंचद प्रकाश तक नहीं पहुंच सके। और यह भी उनकी फिल्म ‘तानसेन’ से पहले संगीतकार अक्सर तानसेन से खयाल गंवाते रहे थे। जबकि खयाल गायिकी को लोकप्रियता मोहम्मद शाह रंगीले (1719-1748) के दौर में मिली थी। तानसेन (1493-1586) के बहुत बाद में खयाल गायिकी की परंपरा मानी जाती रही है।

खेमचंद प्रकाश इस पहलू को जानते थे इसीलिए उन्होंने फिल्म ‘तानसेन’ (1943) में तानसेन (केएल सहगल) से खयाल के बजाय ध्रुपद गवाया था, जिसकी जडंÞे 2000 सालों से भी ज्यादा पुरानी हैं और जो भारतीय शास्त्रीय संगीत की महत्त्वपूर्ण गायन-शैली मानी गई। बहरहाल, ‘महल’ ने बॉक्स आॅफिस पर सफलता के झंडे गाड़ दिए थे। यह किस्सा भी मशहूर है कि पहले ‘आएगा आनेवाला…’ गाना अभिनेत्री टुन टुन गाने वाली थीं। मगर उन्होंने कारदार प्रोडक्शंस से अनुबंध कर रखा था, जिसके कारण वह किसी दूसरी कंपनी की फिल्मों के लिए गाने नहीं गा सकती थीं। तब यह गाना लता मंगेशकर के हिस्से में आया और इसने इतिहास रच दिया। ‘महल’ पुनर्जन्म पर बनी पहली फिल्म थी। ‘महल’ के संपादक बिमल राय ने बाद में ऐसे ही विषय पर ‘मधुमति’ (1958) बनाई।

‘महल’ का जिक्र एक मशहूर घटना को लेकर हमेशा होता रहा है। 1950 के आसपास की बात थी। आॅल इंडिया रेडियो ने जब ‘महल’ के गाने बजाने शुरू किए, तो अचानक रेडियो केंद्र में फोन करने वाले बढ़ गए। ज्यादातर फोन करने वाले यह जानना चाहते थे कि ‘महल’ का जो गाना ‘आएगा आने वाला..’ बजाया जा रहा है, उसकी गायिका कौन है। फिल्म के रेकॉर्ड पर कामिनी का नाम लिखा हुआ था, जो ‘महल’ में हीरोइन मधुबाला के किरदार का नाम था। जब फोन करने वालों की संख्या ज्यादा ही बढ़ने लगी तो आॅल इंडिया रेडियो ने फिल्म के रेकॉर्ड बनाने वाली कंपनी से इस बारे में बातचीत की। उनकी स्वीकृति ली और इसके बाद रेडियो से गूंजा लता मंगेशकर का नाम। तब से शायद ही कोई ऐसा दिन रहा होगा, जिस दिन रेडियो पर लता मंगेशकर के नाम का उद्घोष नहीं हुआ हो।

लता मंगेशकर को भी अपना मकाम बनाने के लिए संघर्ष करना पड़ा। कहा जाता है कि रंजीत के सेठ चंदूलाल शाह ने उनकी आवाज नापसंद कर दी थी, तब सेठजी से खेमचंद प्रकाश ने कहा था कि देखना एक दिन यही आवाज देश भर में गूंजेगी। खेमचंद प्रकाश का कहना सही हुआ। ‘महल’ से लता मंगेशकर की आवाज देश भर में गूंजी। मगर ‘महल’ रिलीज से दो महीने पहले ही खेमचंद प्रकाश का निधन हो गया।

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