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कलाः गंभीर विषयों की सौंदर्यबोधक प्रस्तुति

बांग्लादेशी पहाड़ी महिला संघ की युवा नेता कल्पना चकमा का 12 जून 1996 के दिन फौजियों ने अपहरण कर लिया था। कल्पना आज तक लापता हैं।

Author नई दिल्ली | February 5, 2016 9:55 AM
कल्पना चकमा की कला

बांग्लादेशी पहाड़ी महिला संघ की युवा नेता कल्पना चकमा का 12 जून 1996 के दिन फौजियों ने अपहरण कर लिया था। कल्पना आज तक लापता हैं। उस संघ के अन्य कार्यकर्ता-योद्धाओं ने न्याय और आत्मसम्मान के लिए अपनी मुहिम जारी रखी है। कल्पना के जीवन-लक्ष्य की पूर्ति के लिए कार्यरत लोगों में एक हैं- शाहीदुल आलम जो अंतरराष्ट्रीय ख्यातिप्राप्त तस्वीरकार हैं, चित्रकार और पत्रकार भी हैं।

उन्होंने तिनकों से बुनी गई चटाई के ऊपर लेजर की ज्वाला से एचिंग करके कल्पना के योद्धाओं की तस्वीरें बनाई हैं जो इन दिनों लाडो सराय स्थित ‘आर्ट एंड एस्थेटिक’ कलादीर्घा में प्रदर्शित की गई हैं। प्रदर्शनी का शीर्षक है- ‘कल्पना के योद्धा’।

बांग्लादेश की चकमा जनजाति की कहानी भारत के उत्तर-पूर्व के कुछ राज्यों की जनजातियों की अवदशा से काफी मिलती है। कल्पना कहती थीं कि पिंजरे में बंद पक्षी को उसे बंदी बनाने वालों के प्रति गुस्सा आ जाए, यह स्वाभाविक है। लेकिन यदि उसे समझ में आ जाए कि यह पिंजरा उसकी सही जगह नहीं है तो आकाश में उड़ने की आजादी की इच्छा रखने का उसे पूरा अधिकार है।

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शाहीदुल आलम ने कल्पना के योद्धाओं की तस्वीरें खींचीं लेकिन उन्हें साधारण कागज पर प्रिंट नहीं किया। कल्पना के घर में व अन्य चकमाओं के घर में बैठने-सोने का आम साधन चटाई है। इन लोगों के घर जला दिए गए थे। उसी की प्रतीकात्मक प्रस्तुति आलम ने की है चटाई को लेजर बीम से जलाकर उन पर चेहरों को उभार कर। यह सारी प्रक्रिया विद्रोह के बिंबों को प्रदर्शित करती है। अनुपम महिला को अंजलि अनुपम कला के माध्यम से।

दीर्घा के मुख्य खंड में समान आकार की चटाइयां लटकाई गई हैं। उन पर अलग-अलग उम्र के व्यक्तियों के चेहरे हैं – हल्के-गहरे भूरे रंगों के। प्रत्येक कृति के सामने एक मोमबत्ती जल रही है- टिमटिमाती, लेकिन कभी न बुझने वाली लौ की तरह। साथ के बंद कमरे में सारी लाइटें जल रही हैं। वहां कल्पना का पुराना जंग लगा हुआ टाइपराइटर है। दीवार पर बड़ी-बड़ी तस्वीरें हैं उन योद्धाओं की बस्ती की। पास में रखे हुए टीवी स्क्रीन पर उन योद्धाओं से हो रही बातचीत लगातार दिखाई जा रही है। अंग्रेजी में सब-टाइटल दिए गए हैं। देश में सरकार कोई भी हो, इनका संघर्ष निरवकाश चल रहा है। इस संघर्ष की बात कविता चकमा ने कुछ पंक्तियों में बताई है। यह वास्तव में उन सभी योद्धाओं का संकल्प है :
मैं प्रतिरोध करती हूं/विरोध करती हूं/वही करो जो तुम चाहते हो…/मेरा घर तुमने रेगिस्तान में पलट दिया/जो कभी घना जंगल था।/सुबह को रात बना दिया/और फलवती को वन्ध्या।

मैं प्रतिरोध करती हूं/विरोध करती हूं। छीन ली तुमने मेरी जन्मभूमि/मेरे नारीत्व पर स्वामित्व जताया/अब और उसे नहीं देखूंगी न ऐसा होने दूंगी।
परित्याग, उपेक्षा, क्रोध/धमनी में तुमुल रक्त का स्रोत/मैं कुंचित, टुकड़ों में विक्षिप्त
चेतना के सागर में ढूंढ़ती हूं,/अपना पूरक तो मैं ही हूं।
और मैं प्रतिरोध करती हूं/विरोध करती हूं।
– (हिंदी अनुवाद : व.दा.)
इतना गंभीर और जटिल विषय अत्यंत संवेदनशीलता से और सौंदर्यबोध से प्रस्तुत किया गया है। प्रदर्शनी 5 मार्च तक चलेगी।

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