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हादसे की यात्रा

सरकारों की नींद तभी खुलती है जब कोई बड़ा हादसा सामने आ जाता है या कोई मामला तूल पकड़ लेता है।

तमिलनाडु के तंजावुर में एक धार्मिक यात्रा के दौरान जिस तरह का हादसा हुआ, उसने एक बार फिर यही दर्शाया है कि किसी समारोह या उत्सव का आयोजन तो कर लिया जाता है, मगर न तो उसके आयोजकों को सावधानी बरतने की जरूरत लगती है और न ही प्रशासन इसके लिए सजग रहता है। तंजावुर में बुधवार को एक मंदिर की ओर से पारंपरिक रथयात्रा तो निकाली गई, लेकिन अपने स्तर पर इसमें शामिल होने वाले लोगों या फिर विशेष रूप से स्वयंसेवकों को इस बात के लिए सावधान नहीं किया गया था कि रास्ते में किन स्थितियों में क्या करना है।

नतीजतन, एक जगह पर जुलूस के रथ को मोड़ने और पीछे करने के क्रम में उच्च विद्युत प्रवाही तार रथ के संपर्क में आ गया। इसके बाद उसके करंट की चपेट में कई श्रद्धालु आ गए। हादसे में ग्यारह लोगों की जान चली गई, जिनमें दो बच्चे भी थे। कई अन्य बुरी तरह घायल हुए। निश्चित तौर पर यह हादसा ही है, लेकिन अगर ऐसी घटना की जड़ में आयोजकों या फिर प्रशासन की लापरवाही शामिल हो, तब इससे ज्यादा अफसोस की बात क्या होगी!

मुश्किल यह है कि सरकारों की नींद तभी खुलती है जब कोई बड़ा हादसा सामने आ जाता है या कोई मामला तूल पकड़ लेता है। घटना के बाद तमिलनाडु के मुख्यमंत्री स्टालिन ने मृतकों के परिजनों को पांच-पांच लाख रुपए मुआवजे के तौर पर देने की घोषणा की है। लेकिन सवाल है कि मंदिर की ओर से पिछले तिरानबे साल से निकाली जाने वाली इस पारंपरिक यात्रा के बारे में पूर्व सूचना होने के बावजूद प्रशासन ने अपनी ओर से सुरक्षा व्यवस्था के लिए क्या इंतजाम किए थे!

क्या निर्धारित मार्ग में आने वाली बाधाओं के बारे में यात्रा के आयोजकों को सूचित किया गया था? वहीं, लंबे समय से इस यात्रा का उत्सव मनाने वाले आयोजकों को क्या रथ के रास्ते में आने वाले उच्च विद्युत प्रवाही तार में बिजली के जोखिम के बारे में अंदाजा नहीं था? उन्होंने अपने स्तर पर उससे बचाव के लिए क्या उपाय किए थे? दरअसल, ज्यादा लोगों के शामिल होने वाले आयोजनों में कुछ मामूली-सी दिखने वाली अड़चनों का ही ध्यान रख लिया जाए, तो किसी बड़े हादसे से बचने की गुंजाइश बन सकती है।

विडंबना यह है कि धार्मिक जमावड़े में होने वाले बेहद दुखद हादसों के उदाहरण अक्सर सामने आते रहने के बावजूद ऐसे उत्सवों के आयोजकों को सावधानी बरतने और जोखिम पर ध्यान रखने की जरूरत नहीं लगती। प्रशासन भी धार्मिक आयोजन के नाम पर ऐसी लापरवाहियों की कई बार अनदेखी कर देता है। नतीजतन, आए दिन ऐसी घटनाएं सुर्खियों में आती रहती हैं, जिनमें किसी धार्मिक स्थल पर होने वाले उत्सव में भगदड़ हो जाती है और उसमें नाहक ही काफी संख्या में लोगों की जान चली जाती है।

धार्मिक स्थलों पर होने वाले उत्सवों के दौरान हुए हादसों का शिकार आमतौर पर ज्यादा महिलाएं होती हैं। घटना के बाद सरकारों की ओर से अपनी सीमा में यह जरूर होता है वह मृतकों के परिजनों और घायलों की मदद के लिए आर्थिक सहायता जारी कर देती है, लेकिन भविष्य में ऐसे हादसे न हों, उसके लिए कोई ठोस कदम नहीं उठाया जाता है। यह बेवजह नहीं है कि कुछ समय के अंतराल पर देश के किसी हिस्से से धार्मिक आयोजन के दौरान भगदड़ या अन्य प्रकार के हादसे आते रहते हैं। सवाल है कि किसी आंदोलन या जुलूस को तुरंत नियंत्रित कर सकने की क्षमता रखने वाले सरकारी तंत्र के लिए धार्मिक आयोजनों और उसकी यात्राओं को सुरक्षित बनाना क्यों संभव नहीं हो पाता!

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