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जब 1971 में पाकिस्तान पर जीत दिलाने वाले सेना प्रमुख सैम मानेकशॉ को 32 साल तक नहीं मिला उनका हक

भारत को 1971 के युद्ध में जीत दिलाने वाले सैन्य नायक फील्ड मार्शल सैम मानेकशॉ का अंतिम संस्कार भी भारत सरकार की उपेक्षा का शिकार बना था।

सैम मानेकशॉ पहले भारतीय सैन्य अधिकारी थे जिसे फील्ड मार्शल बनाया गया। (तस्वीर- इंडियन एक्सप्रेस)

सेना और सैनिकों पर गर्व करना एक बात है और उनकी सुविधाओं और सहूलियतों का ध्यान रखना बिल्कुल दूसरी बात है। क्या आप इस बात की कल्पना कर सकते हैं कि भारत को सबसे बड़े युद्धों में से एक में जीत दिलाने वाले सैन्य प्रमुख को भी अपना हक पाने के लिए 32 साल से ज्यादा समय तक इंतजार करना पड़ा था? ये सैन्य प्रमुख कोई और नहीं बल्कि  1971 के युद्ध में पाकिस्तान पर भारत की जीत के नायक रहे तत्कालीन सैन्य प्रमुख और पहले भारतीय फील्ड मार्शल सैम मानेकशॉ थे।

फील्ड मार्शल सैम होरमुसजी फ्रामजी जमशेदजी मानेकशॉ का जन्म तीन अप्रैल 1914 को हुआ था। वो ब्रिटिश इंडियन आर्मी में अफसर बने। भारत के विभाजन के बाद मानेकशॉ ने भारत में रहने का फैसला किया। मानेकशॉ ने ब्रिटिश इंडियन आर्मी के अफसर के तौर पर दूसरे विश्व युद्ध में हिस्सा लिया था। उन्हें आठ जून 1969 में भारतीय सेना का प्रमुख बनाया गया। मानेकशॉ को उनकी बहादुरी के कारण “सैम बहादुर” कहा जाता था। अपने चार दशक लम्बे सैन्य जीवन में मानेकशॉ ने पांच युद्धों में हिस्सा लिया था।

मीडिया रिपोर्ट के अनुसार इंदिरा गांधी पाकिस्तान पर अप्रैल-मई 1971 में हमला करना चाहती थीं लेकिन मानेकशॉ ने उनसे साफ कह दिया कि ये उचित नहीं होगा। मानेकशॉ की सलाह पर ही भारतीय सेना ने पाकिस्तान पर हमले के लिए दिसंबर का वक्त चुना। भारत और पाकिस्तान के बीच तीन दिसंबर से 16 दिसंबर तक युद्ध हुआ। 93 हजार पाकिस्तानी सैनिकों के समर्पण के साथ ही भारत युद्ध में विजयी रहा और बांग्लादेश के रूप में नए देश के जन्म हुआ। मानेकशॉ को जून 1972 में रिटायर होना था लेकिन इंदिरा गांधी सरकार ने उनका कार्यकाल छह महीने के लिए बढ़ा दिया।

मानेकशॉ की अप्रतिम सेवा के लिए इंदिरा गांधी सरकार ने उन्हें फील्ड मार्शल बनाने का फैसला किया। तीन जनवरी 1973 को भारत के राष्ट्रपति भवन में फील्ड मार्शल नियुक्त किया गया था।  वो 15 जनवरी 1973 को सेवा से रिटायर हुए। रिटायर्ड लेफ्टिनेंट जनरल श्रीनिवास कुमार सिन्हा ने इंडियन डिफेंस रिव्यू में साल 2012 में लिखे एक लेख में मानेकशॉ को फील्ड मार्शल बनाए जाने और उनके संग हुई नाइंसाफी पर विस्तार से लिखा। फील्ड मार्शल सेना से कभी रिटायर्ड नहीं होते। फील्ड मार्शल को पूरे जीवन पूरी तनख्वाह मिलती है। फील्ड मार्शल ताउम्र एक छोटा निजी सचिवालय और निजी स्टाफ भी रख सकता है।

मानेकशॉ को फील्ड मार्शल के तौर पर मिलने वाला पूरा भत्ता 30 साल से अधिक समय बाद तब मिला जब डॉक्टर एपीजे अब्दुल कलाम देश के राष्ट्रपति थे। स्टाफ कॉलेज वेलिंगटन के दौरे के समय कलाम सैम मानेकशॉ से मिले थे। उस समय मानेकशॉ गंभीर रूप से बीमार थे।  कलाम ने साल 2006-07 में निजी तौर पर रुचि लेकर मानेकशॉ का बकाया पैसा उनके परिवार को दिलाया था। तत्कालीन रक्षा सचिव ने खुद जाकर सैम की पत्नी को बकाया राशि का चेक दिया था। उनकी पत्नी को मानेकशॉ का बकाया 1.30 करोड़ रुपये दिया गया। कलाम साल 2002 से 2007 तक भारत के राष्ट्रपति रहे थे।

भारत को 1971 के युद्ध में जीत दिलाने वाले इस सैन्य नायक का अंतिम संस्कार भी भारत सरकार की उपेक्षा का शिकार बना। उनका देहांत 27 जून 2008 को हुआ था। मानेकशॉ के अंतिम संस्कार में तत्कालीन रक्षा मंत्री एकके एंटनी नहीं शामिल हुए थे। एंटनी उस समय रूस दौरे पर थे। सिन्हा के अनुसार वायु सेना और नौसेना ने अपनी प्रतिनिधि के तौर पर दो स्टार वाले अफसरों को भेजा था। वहीं तत्कालीन मनमोहन सरकार का कोई भी मंत्री मानेकशॉ के अंतिम संस्कार में शामिल नहीं हुआ था।

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