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संपादकीय: बेलगाम अपराध

दिल्ली में निर्भया मामले के बाद जैसी सामाजिक-राजनीतिक जागरूकता देखने में आई थी, उससे यह उम्मीद बंधी थी कि अब शायद देश में महिलाओं को वैसे त्रासद अपराध से नहीं गुजरना पड़ेगा। लेकिन ऐसा हुआ नहीं। उत्तर प्रदेश में खासतौर पर महिलाओं के खिलाफ अपराधों का जैसा सिलसिला चल पड़ा है, उसने इस राज्य को महिलाओं के लिए सबसे ज्यादा असुरक्षित प्रदेश में शुमार कर दिया है।

Author Updated: September 30, 2020 12:28 AM
Crime in UP, Criminalयूपी में बेलगाम होते अपराधियों पर प्रशासन की सख्ती का कोई असर नहीं दिख रहा है। इससे साफ है कि प्रदेश में अपराध खत्म करने में नाकामी के पीछे राजनीतिक इच्छाशक्ति का अभाव है।

उत्तर प्रदेश के हाथरस जिले में एक बीस वर्षीय युवती से सामूहिक बलात्कार और बर्बरता के बाद उसकी मौत की जो खबर आई है, वह राज्य सरकार के अपराधों पर काबू पा लेने के तमाम दावों की हकीकत बताने के काफी है। मंगलवार को दिल्ली के सफदरजंग अस्पताल में इलाज के दौरान वह युवती जिंदगी की लड़ाई हार गई। खबर के मुताबिक घटना चौदह सितंबर को हुई थी जब युवती अपनी मां के साथ खेतों की ओर जानवर के लिए चारा इकट्ठा करने गई थी। मां से थोड़ा अलग होते ही आरोपियों ने उसे खींच लिया और इस बर्बर घटना को अंजाम दिया। उसकी गर्दन मरोड़ दी गई और जीभ काट डाली गई!

यह ऐसी कोई अकेली घटना नहीं है, लेकिन इस वाकये में अपराध की जो प्रकृति है, वह किसी भी संवेदनशील इंसान को झकझोर देने के लिए काफी है। युवती सामाजिक रूप से दलित पृष्ठभूमि से थी और आरोपी उच्च कही जाने वाली जाति से आते हैं। यह समझना मुश्किल है कि क्या ग्रामीण इलाकों में कमजोर सामाजिक पृष्ठभूमि से होना ही अपराध का शिकार होने की स्थितियां बना देता है? आखिर क्या कारण है कि अपराध को अंजाम देने वाले आरोपियों को यह सब करने से पहले एक बार भी यह हिचक नहीं हुई कि वे क्या करने जा रहे हैं?

विडंबना यह है कि जिस पुलिस महकमे को घटना की प्राथमिक सूचना मिलते ही सक्रिय होकर कार्रवाई करनी चाहिए थी, उसने शुरुआत में सिर्फ हत्या की कोशिश का मुकदमा दर्ज किया था और आरोप यह भी है कि उसने मामले को दबाने की कोशिश की। पीड़िता के भाई ने बताया कि दस दिन बाद तक कोई कार्रवाई नहीं की गई। इस बीच आरोपी पीड़ित परिवार को धमकी देते रहे।

जब बर्बर अपराध की शिकार युवती ने सर्किल अफसर को किसी तरह अपने साथ हुई दरिंदगी के बारे में इशारों से बताया तब जाकर सामूहिक बलात्कार की धारा जोड़ी गई। बाद में चारों आरोपियों को गिरफ्तार किया गया। पुलिस का यह रवैया कोई हैरानी नहीं पैदा करता है, क्योंकि बलात्कार और हत्या जैसे मामलों में आमतौर पर कमजोर तबकों के पीड़ितों को यही झेलना पड़ता है। तथ्य यह है कि किसी भी अपराध के बाद आमतौर पर पुलिस का शुरुआती रुख ही मामले के अनुसंधान और कार्रवाई की दिशा तय करता है और आखिरकार इंसाफ मिलने और नहीं मिलने के लिए जिम्मेदार होता है।

दिल्ली में निर्भया मामले के बाद जैसी सामाजिक-राजनीतिक जागरूकता देखने में आई थी, उससे यह उम्मीद बंधी थी कि अब शायद देश में महिलाओं को वैसे त्रासद अपराध से नहीं गुजरना पड़ेगा। लेकिन अफसोस यह है कि उसके बाद जमीनी स्तर पर महिलाओं के लिए हर स्तर पर असुरक्षा और अपराध के हालात में कोई फर्क नहीं आया है। उत्तर प्रदेश में खासतौर पर महिलाओं के खिलाफ अपराधों का जैसा सिलसिला चल पड़ा है, उसने इस राज्य को महिलाओं के लिए सबसे ज्यादा असुरक्षित प्रदेश में शुमार कर दिया है।

इसी साल के शुरू में राष्ट्रीय अपराध रेकार्ड ब्यूरो की रिपोर्ट में यह बताया गया था कि महिलाओं के खिलाफ अपराधों के मामले में उत्तर प्रदेश सबसे खतरनाक हालत में पहुंच चुका है। समाज के कमजोर तबकों की महिलाओं से बलात्कार और उनकी हत्या की घटनाएं जिस तरह लगातार आने लगी हैं, उससे यह सवाल उठा है कि आखिर राज्य सरकार इन अपराधों की रोकथाम के लिए क्या कर रही है!

जबकि सत्ता में आने के बाद सरकार का सबसे बड़ा दावा यही था कि एंटी-रोमियो दस्ते का गठन और विशेष हेल्पलाइन महिलाओं के खिलाफ अपराधों को खत्म कर देगा। लेकिन हकीकत दुनिया के सामने है। आज हालत यह है कि राज्य के किसी हिस्से से अक्सर बलात्कार और हत्या की ऐसी घटना सामने आ रही है, जो राज्य सरकार के ‘न्यूनतम अपराध’ के दावों को आईना दिखाती है।

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