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संपादकीय: यस बैंक का संकट

यस बैंक का संकट भी दूसरे डूबते बैंकों से अलग नहीं है। बैंक जिस उदारता से कर्ज बांटता चला गया और वसूली नहीं हुई, इसी से उसके सामने मुश्किलों का पहाड़ खड़ा होता चला गया। यस बैंक के पास इस वक्त दो लाख नौ हजार करोड़ रुपए जमा के रूप में है, जबकि बैंक ने सवा दो लाख करोड़ रुपए कर्ज के रूप में दे रखे हैं।

Author Published on: March 7, 2020 12:28 AM
yes bank anil ambaniअनिल अंबानी समेत कई कारोबारी घरानों पर बकाया हैं हजारों करोड़

छह महीने भी नहीं गुजरे कि मुंबई के पीएमसी बैंक घोटाले के बाद अब निजी क्षेत्र के यस बैंक का जो हाल सामने आया है, उसने ग्राहकों की नींद उड़ी दी है। डूबने के कगार पर पहुंच चुके यस बैंक के ग्राहक भी अब उसी चिंता में डूबे हैं जो पिछले कई महीनों से देश के हर बैंक ग्राहक को खाए जा रही है। जैसे ही किसी बैंक को लेकर यह खबर आती है कि ग्राहकों के खातों से निकासी की सीमा तय कर दी गई है, तो होश उड़ जाना स्वाभाविक है। यस बैंक की हालत पर पिछले दो साल से रिजर्व बैंक की नजर थी। लेकिन बैंक के हालात जिस तरह से बिगड़ते चले गए, उसे देखते हुए रिजर्व बैंक का यह सख्त कदम उठाना जरूरी हो गया था, वरना ग्राहकों को कैसे दिन देखने पड़ जाते, कोई नहीं जानता।

रिजर्व बैंक ने गुरुवार को तत्काल प्रभाव से यस बैंक के बोर्ड को तीस दिन के लिए निलंबित करते हुए नए प्रशासक की नियुक्ति कर दी। यस बैंक के ग्राहक अब तीस दिन में अपने खाते से पचास हजार रुपए से ज्यादा नहीं निकाल पाएंगे। लेकिन इस बार रिजर्व बैंक ने पीएमसी के घटनाक्रम से सबक लेते हुए बीमारी, शादी, शिक्षा के लिए कर्ज जैसी जरूरतों को देखते हुए नियमों में ढील दी है और ग्राहक इन जरूरतों के लिए पांच लाख रुपए या जितना पैसा उनका जमा है, इनमें से जो भी कम हो, निकाल सकेंगे।

यस बैंक का संकट भी दूसरे डूबते बैंकों से अलग नहीं है। बैंक जिस उदारता से कर्ज बांटता चला गया और वसूली नहीं हुई, इसी से उसके सामने मुश्किलों का पहाड़ खड़ा होता चला गया। यस बैंक के पास इस वक्त दो लाख नौ हजार करोड़ रुपए जमा के रूप में है, जबकि बैंक ने सवा दो लाख करोड़ रुपए कर्ज के रूप में दे रखे हैं। बड़े कर्जदारों में आइएलएंडएफएस, अनिल अंबानी समूह, सीजी पॉवर, कॉक्स एंड किंग, कैफे कॉफी डे, एस्सार पावर जैसे बड़े उद्योग समूह और वित्तीय संस्थान भी शामिल हैं। इन सभी कर्जदारों की हालत किसी से छिपी नहीं है।

आइएलएंडएफएस का घोटाला यह बताने के लिए काफी था कि हमारा वित्तीय क्षेत्र किस तरह के कुप्रबंधन का शिकार हो चुका है। क्या इन कर्जदारों से वसूली हो पाएगी, यह बड़ा सवाल है?
कारोबार में जल्द ही ऊंचाइयां छू लेने वाले यस बैंक का संकट पहली बार 2017 में तब सामने आया था जब रिजर्व बैंक ने डूबते कर्ज को लेकर बैंक को चेताया था और केंद्रीय बैंक ने जांच के बाद बैंक के तत्कालीन प्रमुख राणा कपूर को सेवा विस्तार देने से इनकार कर दिया था। भारत में बैंकों के डूबने के कई मामले सामने आ चुके हैं। न्यू बैंक आॅफ इंडिया, बैंक आॅफ कराड, पंजाब कोआॅपरेटिव बैंक, ग्लोबल ट्रस्ट बैंक जैसे कई उदाहरण हैं।

ऐसे मामलों में समाधान का रास्ता यही निकाला जाता है कि डूबते बैंकों का बड़े बैंकों में विलय कर दिया जाए। यस बैंक को अब भारतीय स्टेट बैंक और भारतीय जीवन बीमा निगम मिल कर संभालेंगे। भारत में बैंकों के समक्ष कर्ज की वसूली एक गंभीर संकट बन गया है। बैंकों में होने वाले घोटाले उनके भीतर कुप्रबंधन की ही देन हैं। इसका बड़ा कारण बड़े उद्योगपतियों को नियम-कायदों को ताक पर रखते हुए उदारता से कर्ज बांटना और वसूली के पक्ष को नजरअंदाज करना रहा। इसलिए बैंक एनपीए बोझ में दबे हैं। सबसे गंभीर चिंता की बात यह है कि बैंकिंग व्यवस्था को लेकर आमजन के मन में गहरा अविश्वास पैदा हो गया है। अगर अपने जमा पैसे की निकासी पर पांबदी लगने लगेगी, तो फिर लोग बैंकों पर कैसे भरोसा करेंगे?

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