ईरान और अमेरिका-इजराइल के बीच युद्ध के नतीजे दिखने लगे हैं। ऊर्जा संकट गहराने के साथ पूरी दुनिया अब इसके व्यापक परिणामों से निपटने की तैयारी कर रही है। होर्मुज जलमार्ग से ईंधन आपूर्ति की जो शृंखला टूटी है, वह कब नियमित होगी, कुछ कहा नहीं जा सकता। मगर इससे कई देशों के सामने चौतरफा संकट जरूर पैदा हो गया है। वैश्विक स्तर पर ईंधन और परिवहन की लागत बढ़ने लगी है। मुश्किल भरे इस दौर में विश्व बैंक, मुद्रा कोष और विश्व खाद्य कार्यक्रम (डब्लूएफपी) ने सचेत किया है कि पश्चिम एशिया के वैश्विक ऊर्जा बाजारों में युद्ध ने जो व्यवधान पैदा किया है, उससे खाद्य कीमतों और खाद्य सुरक्षा पर व्यापक असर पड़ेगा।

अंतरराष्ट्रीय संस्थानों के बयान गंभीर

इन तीनों संस्थाओं के इस बयान को गंभीरता से लेने की जरूरत है कि बढ़ती खाद्य कीमतों का सबसे अधिक बोझ दुनिया की कमजोर आबादी पर पड़ेगा। हालांकि इन संगठनों का कहना है कि वे संभावित स्थितियों पर निगाह रखेंगे और संकट से प्रभावित लोगों की मदद के लिए उपलब्ध संसाधनों का समन्वय करेंगे। मगर सवाल है कि इस विकट दौर में करोड़ों लोगों तक कैसे और किस हद तक मदद पहुंचेगी?

युद्ध के असर के मद्देनजर अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं ने जिस तरह आगाह किया है, इससे समझा जा सकता है कि पूरी दुनिया पर खाद्य संकट मंडरा रहा है। युद्ध के दौरान होर्मुज जलमार्ग बंद होने से उर्वरकों की आपूर्ति में जो बाधा आई है, इसका प्रभाव स्वाभाविक रूप से भारत सहित दुनिया के कई देशों पर पड़ेगा।

नतीजा यह होगा कि कम और महंगा यूरिया मिलने से खेती की लागत बढ़ेगी। दूसरी ओर, आने वाले समय में पेट्रोल-डीजल के दाम तेजी से बढ़ेंगे, तो माल की ढुलाई भी महंगी होगी। ऐसे में महंगाई को संभालना बेहद चुनौतीपूर्ण होगा। चिंता की बात यह है कि युद्ध से वैश्विक अर्थव्यवस्था का जो नुकसान हुआ है, अभी उसी का पूरी तरह आकलन नहीं हो पाया है।

इस स्थिति में खाद्य कीमतों में संभावित वृद्धि की चेतावनी डराने वाली है। अमेरिका और ईरान में दो सप्ताह के युद्ध विराम के बीच आयात निर्भर देशों के लिए यह सोचने का समय है कि ईंधन और खाद्य की कीमतों को वे कैसे नियंत्रित करेंगे।

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इक्कीसवीं सदी के तीसरे दशक में वैश्विक राजनीति एक ऐसे मोड़ पर खड़ी है, जहां ‘शक्ति ही सत्य है’ की अवधारणा पुनर्जीवित हो गई है। दुनिया का सबसे धनी देश और अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं का सबसे बड़ा वित्तपोषक होने के नाते अमेरिका ने स्वयं को एक ऐसे ‘वैश्विक दारोगा’ के रूप में स्थापित कर लिया है, जिसे रोकने का साहस वर्तमान में किसी भी अंतरराष्ट्रीय इकाई के पास नहीं दिखता। पूरी खबर पढ़ने के लिए यहां पर करें क्लिक