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संपादकीय: भरोसे का टूटना

पूर्णबंदी की वजह से रोजी-रोटी या हर तरह के रोजगार सहित शहरों में रहने के ठिकाने तक से लाचार कर दिए गए मजदूरों के सामने लगभग सारे विकल्प खत्म हो गए हैं। ऐसे में उनके दुखों का अंदाजा लगाया जा सकता है।

Coronavirus lockdownकोरोना वायरस लॉकडाउन के दौरान मजदूरों का पलायन जारी है। (प्रतीकात्मक तस्वीर) (PTI Photo)

किसी भी लोकतांत्रिक देश में आम जनता जब किसी तरह के संकट में पड़ जाती है, तब उसकी उम्मीद यही होती है कि सत्ता और विपक्ष में बैठे उनके नेता परिस्थितियों को समझेंगे और मदद करेंगे। लेकिन कोरोना महामारी की वजह से बने मौजूदा हालात में देश भर में खासतौर पर गरीब मजदूरों के सामने जिस तरह का व्यापक संकट खड़ा हो गया है, उसमें लगभग सभी पार्टियों और नेताओं के रुख ने उनका भरोसा बहुत कमजोर कर दिया है।

पूर्णबंदी की वजह से रोजी-रोटी या हर तरह के रोजगार सहित शहरों में रहने के ठिकाने तक से लाचार कर दिए गए मजदूरों के सामने लगभग सारे विकल्प खत्म हो गए हैं। ऐसे में उनके दुखों का अंदाजा लगाया जा सकता है। सरकार की ओर से बहुत देर से जो थोड़ी-बहुत व्यवस्था की भी गई, वह नाकाफी है। दूसरे राजनीतिक दलों या नेताओं ने भी बहुत गंभीरता या संवेदनशीलता नहीं दिखाई। दूसरी ओर, सड़क पर पैदल ही हजारों किलोमीटर का रास्ता तय करते मजदूरों के साथ पुलिस का जो बर्ताव दिखा, उसने लोगों को भीतर से तोड़ दिया।

यह बेवजह नहीं है कि अब बहुत सारे मजदूर इस भाषा में अपना दुख जाहिर करने लगे हैं कि हमने जिन नेताओं और पार्टियों पर भरोसा किया था, उन्हें हमारी कोई परवाह नहीं है। एक प्रवासी मजदूर का यह दुख सच से कितना अलग है कि चुनाव के वक्त नेता वादा करके, गरीबों के साथ सहानुभूति दिखा कर हमारे साथ खेलते हैं और फिर हमें भूल जाते हैं।

ऐसे में अगर अभी मतदान की आयु में ही पहुंचा कोई युवक अगर भविष्य में किसी भी नेता या पार्टी को वोट नहीं देने की बात कहता है तो क्या उसकी तकलीफ को समझना मुश्किल है? जिस तरह गरीब प्रवासी मजदूर सड़कों पर पैदल चलते हुए हादसों में, ट्रेन की पटरियों पर या भूख से दो-चार होकर अपनी जान गंवा रहे हैं, उसकी मूल वजह क्या है? इसके लिए कौन जिम्मेदार है और आज भी अगर किसी को इनकी परवाह नहीं है और नेताओं में एक तरह की बेरुखी कायम है तो इसे कैसे देखा जाएगा? स्वाभाविक ही परेशानहाल गरीबों और मजदूरों के भीतर मौजूदा हालत के खिलाफ दुख अब गुस्से के रूप में सामने आ रहा है।

भरोसे का यह टूटना किसी तात्कालिक परिस्थिति का नतीजा नहीं है, बल्कि यह यह वह दुख है जो बहुत लंबे समय तक मजदूरों और गरीबों की तकलीफों की उपेक्षा के बाद जाहिर हो रहा है। महामारी से बचाव के लिए उठाए गए कदम निहायत जरूरी हैं। लेकिन क्या यह नहीं हो सकता था कि देश भर में सब कुछ बंदी लागू करने के पहले लोगों को कुछ संभलने का मौका दिया जाता? इस बात का खयाल रखे बिना जो हुआ, उसका नतीजा दुनिया के सामने है।

लाखों लोग जब मरते-जीते अपने गांवों की ओर लौटने लगे तो कुछ राज्य सरकारों का रुख भी आमतौर पर बेहद संवेदनहीन रहा। गांवों में सामाजिक वंचना और आर्थिक लाचारी के दुखों से पीछा छुड़ाने के लिए मजदूरों ने इज्जत की दो रोटी के लिए शहरों का रुख किया था। अब वे वहीं वापसी के त्रासद हालात में झोंक दिए गए हैं। जनता के दुखों को दूर करने का वादा करके अपनी राजनीति करने वाले नेताओं और पार्टियों को लेकर अब उनके भीतर रोष है, तो क्या यह स्वाभाविक नहीं है? अगर मजदूर सिर्फ इतनी-सी मांग कर रहे हैं कि ‘हमें सहानुभूति नहीं, इज्जत चाहिए’, तो क्या यह उनका अधिकार नहीं है?

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