देश में महिला सशक्तिकरण को लेकर अक्सर बड़े-बड़े दावे किए जाते हैं। सरकार की ओर से इस दिशा में कई महत्वपूर्ण योजनाएं और अभियान शुरू किए गए हैं। सामाजिक, आर्थिक और विकासात्मक कार्यों में महिलाओं की भागीदारी बढ़ाने पर विशेष जोर दिया जा रहा है। महिलाओं को विधायिका में तैंतीस प्रतिशत आरक्षण देने की बात कही जा रही है।

यही नहीं, महिलाओं की सुरक्षा के लिए विशेष कानून भी बनाए गए हैं। मगर, जमीनी हकीकत यह है कि महिलाएं खुद को कहीं भी सुरक्षित महसूस नहीं कर पा रही हैं। घर हो या बाहर, हर जगह उन्हें हिंसा का भय सताता रहता है। राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण-6 की रिपोर्ट के आंकड़े इसकी तस्दीक करते हैं। इसके मुताबिक, ग्रामीण इलाकों में हर चौथी और शहरी क्षेत्र में हर छठी महिला किसी न किसी रूप में हिंसा का शिकार हो रही है।

यानी शहरों की तुलना में शांतिप्रिय माने जाने वाले गांवों में महिलाओं को घरेलू एवं यौन हिंसा का ज्यादा सामना करना पड़ रहा है। यह स्थिति तब है, जब ग्रामीण स्तर पर महिलाओं को सशक्त करने के लिए कागजों में विशेष प्रयास किए जा रहे हैं।

देश में महिलाओं और लड़कियों के खिलाफ हिंसा कई रूपों में सामने आती है। इनमें घरेलू हिंसा, यौन उत्पीड़न, दहेज प्रताड़ना और जादू-टोने जैसे अंधविश्वास के कारण मानसिक एवं शारीरिक उत्पीड़न प्रमुख हैं। नए सर्वेक्षण में 18 से 49 वर्ष आयु वर्ग की विवाहित महिलाओं में से 22 प्रतिशत से अधिक ने माना कि उन्होंने अपने जीवन में कभी न कभी घरेलू हिंसा का सामना किया है। हालांकि यह आंकड़ा पिछले सर्वेक्षण की तुलना में कुछ कम है, लेकिन यह अब भी एक बड़ी सामाजिक चुनौती की ओर इशारा करता है।

सवाल है कि जब महिलाओं के खिलाफ हिंसा पर अंकुश लगाने के लिए अलग से कानून बनाए गए हैं, तो फिर इस तरह की घटनाओं का सिलसिला थम क्यों नहीं रहा है? जाहिर है कि इन कानूनों का प्रभावी तरीके से क्रियान्वयन नहीं हो पा रहा है। कानून प्रवर्तन एजेंसियों की लापरवाही और ढुलमुल रवैये का ही नतीजा है कि महिलाएं न तो अपने घर पर और न ही बाहर खुद को सुरक्षित महसूस कर पाती हैं।

सर्वेक्षण में 18 से 29 वर्ष आयु वर्ग की 0.7 प्रतिशत महिलाओं का कहना है कि 18 वर्ष की आयु पूरी होने से पहले वे यौन हिंसा का शिकार हुई थीं। शहरी क्षेत्रों में यह आंकड़ा 0.4 प्रतिशत और ग्रामीण क्षेत्रों में 0.8 प्रतिशत दर्ज किया गया है। इससे साफ है कि गांवों में यौन हिंसा की स्थिति शहरों के मुकाबले ज्यादा भयावह है। इसकी एक बड़ी वजह ग्रामीण क्षेत्रों में महिलाओं और लड़कियों में अपने अधिकारों के प्रति जागरूकता की कमी और कानूनी जानकारी का अभाव है। हालांकि सरकारी स्तर पर महिलाओं को उनके अधिकारों के प्रति सचेत करने के लिए जागरूकता अभियान चलाए जाते हैं, लेकिन इनका दायरा शहरी क्षेत्रों पर ज्यादा केंद्रित रहता है।

बिना किसी आधार के यह मान लिया जाता है कि गांवों में अपराध की दर कम है, इसलिए वहां जागरूकता की ज्यादा जरूरत नहीं है, जबकि आधिकारिक आंकड़ों की स्थिति इसके विपरीत है। ऐसे में जरूरत इस बात को समझने की है कि किसी भी तरह की हिंसा महिलाओं के आर्थिक, सामाजिक और मानसिक विकास को बाधित करती है। इसलिए जरूरी है कि महिला सशक्तिकरण के अभियानों को प्रभावी तरीके से जमीन पर उतारा जाए और कानून प्रवर्तन एजेंसियों को ऐसे मामलों में संवेदनशील एवं जवाबदेह बनाया जाए।

यह भी पढ़ें: पीएम नरेंद्र मोदी का लेख: महिला आरक्षण विधेयक भारतवर्ष की करोड़ों महिलाओं की आकांक्षाओं का प्रतिबिंब है

इक्कीसवीं सदी की विकास यात्रा में भारत एक महत्त्वपूर्ण और ऐतिहासिक क्षण की ओर आगे बढ़ रहा है। आने वाले दिनों में हम अपने लोकतंत्र को और मजबूत करने वाली एक बड़ी पहल के साक्षी बनने वाले हैं। यह ऐसा अवसर है, जब समानता, समावेशन और जनभागीदारी के प्रति हमारी राष्ट्रीय प्रतिबद्धता एक नए रूप में सामने आएगी और देश की संसद को एक महत्त्वपूर्ण दायित्व निभाना है। उसे ऐसा कदम आगे बढ़ाना है, जो हमारे लोकतंत्र को और ज्यादा व्यापक एवं अधिक प्रतिनिधिक बनाए। संसद का यह निर्णय महिलाओं की राजनीतिक भागीदारी को नई शक्ति देगा और लोकसभा तथा विधानसभाओं में उनका उचित स्थान सुनिश्चित करेगा। पूरी खबर पढ़ने के लिए यहां पर करें क्लिक