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संपादकीयः स्त्री के हक में

एक साथ तीन तलाक यानी तलाक-ए-बिद्दत अब दंडनीय अपराध होगा। इसके लिए सरकार ने अध्यादेश को मंजूरी दे दी है। सरकार को यह कड़ा कदम इसलिए उठाना पड़ा कि पिछले साल सुप्रीम कोर्ट के रोक लगाने के बाद भी तीन तलाक की घटनाएं थम नहीं रही हैं, बल्कि आए दिन ऐसी घटनाएं सामने आ रही […]

Author September 20, 2018 3:04 AM
सर्वोच्च अदालत के आदेश के बावजूद तीन तलाक की घटनाओं से एक बात तो साफ है कि ऐसा करने वालों को शायद कानून का कोई भय नहीं है।

एक साथ तीन तलाक यानी तलाक-ए-बिद्दत अब दंडनीय अपराध होगा। इसके लिए सरकार ने अध्यादेश को मंजूरी दे दी है। सरकार को यह कड़ा कदम इसलिए उठाना पड़ा कि पिछले साल सुप्रीम कोर्ट के रोक लगाने के बाद भी तीन तलाक की घटनाएं थम नहीं रही हैं, बल्कि आए दिन ऐसी घटनाएं सामने आ रही हैं जिनमें मामूली-सी बात पर तीन बार तलाक कह कर पत्नी से छुटकारा पा लिया गया। इसलिए इस कुप्रथा पर अंकुश लगाने के लिए सख्त कदम उठाना जरूरी हो गया। अध्यादेश में साफ कहा गया है कि अगर फौरी तीन तलाक की कोई घटना होती है तो पीड़िता या उसका कोई भी रिश्तेदार इसकी सूचना पुलिस थाने को दे सकता है, ताकि मामला दर्ज किया जा सके। अभी हालत यह है कि तीन तलाक के ज्यादातर मामले थाने तक इसलिए नहीं पहुंच पाते कि उन्हें दबा दिया जाता है और पीड़िता हिम्मत नहीं जुटा पाती है। हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने जब से इस कुप्रथा पर पाबंदी लगाई है तब से इतना तो जरूर हुआ है कि भले ही कम संख्या में, लेकिन पीड़ित महिलाओं ने हिम्मत दिखानी शुरू की है। यह इसी का परिणाम है कि जो मामले अब सामने आ रहे हैं, उसकी बड़ी वजह सुप्रीम कोर्ट के फैसले से मुसलिम महिलाओं में जागरूकता का आना है।

सर्वोच्च अदालत के आदेश के बावजूद तीन तलाक की घटनाओं से एक बात तो साफ है कि ऐसा करने वालों को शायद कानून का कोई भय नहीं है। इसलिए ऐसा कदम उठाते वक्त तलाक बोलने वाला यह नहीं सोचता है कि वह सामाजिक रूप से तो गलत कर ही रहा है, कानून का भी उल्लंघन कर रहा है। लेकिन अब अध्यादेश लागू होते ही तीन बार तलाक बोल कर पत्नी को छोड़ देने वालों पर कड़ी कार्रवाई होगी। जो पति फौरी तीन तलाक कह कर पत्नी को तलाक देगा, उसे तीन साल की सजा होगी, साथ ही यह तलाक अवैध माना जाएगा। ऐसे मामले में आरोपी को थाने से जमानत नहीं मिल पाएगी, बल्कि आरोपी की पत्नी का पक्ष सुनने के बाद ही मजिस्ट्रेट को जमानत देने का अधिकार होगा। मजिस्ट्रेट को सुनिश्चित करना होगा कि जमानत तभी दी जाए जब पति पत्नी को मुआवजा देने पर सहमत हो जाए। मुआवजे की राशि मजिस्ट्रेट तय करेंगे। हालांकि एक संशोधन के मुताबिक मजिस्ट्रेट के सामने पति-पत्नी में समझौते का विकल्प भी खुला रहेगा। इस तरह के प्रावधानों से यह उम्मीद बंधती है कि अब फौरी तौर पर तीन तलाक के सहारे पत्नी को छोड़ देने के मामलों पर विराम लग सकेगा।

दरअसल, शिक्षा, जागरूकता और सुविधाओं के अभाव में किसी कुप्रथा को बिना सोचे मानते जाना किसी भी समाज की मजबूरी भी हो सकती है। परंपराओं के प्रति सख्त आग्रह कई बार उसके मानवीय पहलू पर विचार करने और उसमें बदलाव के लिए प्रोत्साहित नहीं कर पाते हैं। ऐसे में अगर कोई पुरुष महज रोटी जल जाने पर पत्नी को एक साथ तीन तलाक बोल देता है, तो यह हैरानी की बात नहीं है। ऐसी घटनाएं सामने आती रहती हैं, जिनमें सिर्फ पत्नी से छुटकारा पाने के लिए छोटी-छोटी बातों को कारण बना दिया जाता है। ऐसे में दुर्गति सिर्फ उस महिला की होती है जो इस पीड़ा को झेलती है। सरकार और सर्वोच्च अदालत ने मुसलिम महिलाओं को इस कुप्रथा से मुक्ति दिलाने के लिए जो कदम बढ़ाए हैं, उन्हें महिला सशक्तीकरण की दिशा में भी एक पहल माना जा सकता है। लेकिन सच यह है कि मुसलिम समाज को जागरूक और शिक्षित बनाने की दिशा में सरकार को ठोस और जमीनी जरूरतों के मुताबिक कदम उठाने होंगे, तभी ऐसी कुप्रथाओं पर वास्तव में रोक लगाई जा सकेगी।

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