ताज़ा खबर
 

संपादकीयः आतंकी का ब्योरा

भारत पाकिस्तान से अब जैश-ए-मोहम्मद के उस आतंकवादी का ब्योरा मांगेगा, जिसने इस साल फरवरी में जम्मू-कश्मीर में सुंजवां स्थित सैन्य शिविर पर हमले को अंजाम दिया था।

Author August 7, 2018 2:59 AM
भारत ने वकास का ब्योरा हासिल करने के लिए राष्ट्रमंडल देशों के बीच हुए समझौते को आधार बनाया है।

भारत पाकिस्तान से अब जैश-ए-मोहम्मद के उस आतंकवादी का ब्योरा मांगेगा, जिसने इस साल फरवरी में जम्मू-कश्मीर में सुंजवां स्थित सैन्य शिविर पर हमले को अंजाम दिया था। मुफ्ती वकास नाम का यह आतंकवादी पिछले साल सरहद पार से भारत में घुसा था। जैश के ऑपरेशन कमांडर के रूप में उसने कई बड़े हमले किए। इस साल मार्च में सुरक्षा बलों ने एक मुठभेड़ में उसे मार गिराया था। भारत के इस कदम से स्पष्ट है कि वह अब पाकिस्तान पर तेजी से दबाव बनाने की दिशा में बढ़ रहा है। वकास का ब्योरा हासिल करना इसलिए जरूरी और महत्त्वपूर्ण हो गया है क्योंकि भारत अब सुरक्षा परिषद के प्रस्ताव संख्या 1267 के तहत जैश-ए-मोहम्मद और इसके सरगना मौलाना मसूद अजहर पर पाबंदी के लिए संयुक्त राष्ट्र में फिर से अपील करना चाहता है। मौलाना अजहर और उसके संगठन के खिलाफ भारत ने संयुक्त राष्ट्र में पहले भी मामला उठाया था, लेकिन तब चीन ने पाकिस्तान का साथ देते हुए इसका विरोध कर दिया था। ऐसे में यह संशय तो पैदा होता ही है कि क्या पाकिस्तान वकास से जुड़ी सारी जानकारियां भारत को सौंपेगा! जो देश दशकों से भारत में आतंकवाद फैला रहा है, उससे यह उम्मीद करना शायद व्यर्थ है।

भारत ने वकास का ब्योरा हासिल करने के लिए राष्ट्रमंडल देशों के बीच हुए समझौते को आधार बनाया है। इसके तहत राष्ट्रमंडल देश ऐसे मुद्दों पर कानूनी सहायता और जानकारी के आदान-प्रदान के लिए बाध्य हैं। यह करार तीन दशक से पहले राष्ट्रमंडल देशों के कानून मंत्रियों की बैठक में हुआ था। बाद में 2011 में सिडनी में हुई राष्ट्रमंडल देशों के कानून मंत्रियों की बैठक में इसमें संशोधन करते हुए कई बातें ऐसी जोड़ी गर्इं, जिनसे आतंकियों पर शिकंजा कसने के लिए समझौता पारदर्शी व ठोस बन सके और संबंधित देश मांगी गई जानकारियां देने को बाध्य हों। भारत को वकास के बारे में जो ब्योरा चाहिए उसमें वे फोन नंबर भी हैं, जिन पर दस फरवरी को सुंजवां सैन्य शिविर पर हमले के पहले और बाद में वकास ने फोन किए थे। लेकिन वकास के बारे में सूचनाएं हासिल करने की कवायद आसान नहीं है। पाकिस्तान लंबी कानूनी कार्यवाही और प्रक्रियागत कारणों की आड़ लेते हुए हीलाहवाली कर सकता है।

यह बात किसी से छिपी नहीं है कि जैश और लश्कर जैसे कई आतंकी संगठन हैं जो पाकिस्तान से अपनी गतिविधियां चला रहे हैं। खुद अमेरिका भी पाकिस्तान से आतंकी संगठनों और उनके सरगनाओं पर लगाम कसने को कह चुका है। लेकिन नतीजा सबके सामने है। आतंकी संगठन चलाने वाले पाकिस्तान में खुलेआम घूम रहे हैं और हाफिज सईद ने तो अपनी पार्टी का पंजीकरण खारिज होने के बाद दूसरे दल के जरिए चुनाव में शिरकत की। हालांकि यह अच्छा संकेत देखने को मिला कि पाकिस्तान की अवाम ने राजनीति में आतंकियों की घुसपैठ को नाकाम कर दिया। लेकिन चिंताजनक बात यह है कि आतंकी संगठनों का कारोबार पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी आइएसआइ और सेना की सरपरस्ती में चल रहा है। अब इमरान खान के नेतृत्व वाली पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ पार्टी (पीटीआइ) की सरकार सत्ता संभालने की तैयारी में है। पाकिस्तान खुद भी आतंकवाद की मार झेल ही रहा है। नई सरकार के लिए भी आतंकवाद बड़ी चुनौती तो है ही। ऐसे में पाकिस्तान भारत को आतंकवादियों और उनके संगठनों के बारे में सूचनाएं देने में कितनी मदद करेगा, यह देखने वाली बात है। लेकिन फिर भी उम्मीद रखनी चाहिए कि नई सरकार सकारात्मक रुख अपनाएगी और आतंकी संगठनों पर शिकंजा कसने की मुहिम में भारत का साथ देगी।

Hindi News से जुड़े अपडेट और व्‍यूज लगातार हासिल करने के लिए हमारे साथ फेसबुक पेज और ट्विटर हैंडल के साथ गूगल प्लस पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News App