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चंदा और शिकंजा

राजनीति में कालेधन का इस्तेमाल हमेशा से ही चिंता का विषय रहा है। चुनाव के वक्त कालेधन का प्रवाह और तेजी से बढ़ जाता है, यह कोई छिपी बात भी नहीं है। किसी को भी पता नहीं चल पाता कि कौन किस पार्टी को कितना पैसा चंदे के रूप में दे रहा है।

Author Published on: April 15, 2019 1:21 AM
सर्वोच्च अदालत का यह आदेश उन राजनीतिक दलों के लिए बड़ी परेशानी खड़ी करने वाला है जो पार्टी को मिले चंदे की जानकारी गोपनीय रखना चाहते हैं।

चुनावी बांड पर सुप्रीम कोर्ट ने भले रोक न लगाई हो, लेकिन जो अंतरिम आदेश दिया है वह चुनावी चंदे में पारदर्शिता लाने की दिशा में बड़ा कदम है। सर्वोच्च अदालत के इस आदेश के बाद अब राजनीतिक दलों को चुनाव आयोग में इस बात का ब्योरा जमा कराना ही होगा कि उन्हें कब-कब और किस-किससे कितना पैसा चंदे के रूप में मिला। इतना ही नहीं, 30 मई 2019 तक मिलने वाले चंदे के बारे में भी सारी जानकारी देनी होगी। सर्वोच्च अदालत का यह आदेश उन राजनीतिक दलों के लिए बड़ी परेशानी खड़ी करने वाला है जो पार्टी को मिले चंदे की जानकारी गोपनीय रखना चाहते हैं। जाहिर है, इन दलों को इस बात का भय है कि अगर चंदे से संबंधित जानकारियां सार्वजनिक हो गईं तो उनकी मुश्किलें बढ़ सकती हैं। दलों को लग रहा है कि अगर कोई ऐसा कानूनी आदेश आ गया जिसमें चंदे का ब्योरा सार्वजनिक करने को बाध्य किया गया तो इससे उनकी पोल खुलने लगेगी। पता चल जाएगा कि कौन व्यक्ति, संगठन या उद्योग घराना किस पार्टी को कितना पैसा दे रहा है। इसलिए राजनीतिक दल नहीं चाहते कि ऐसी कोई व्यवस्था बने जिससे उन्हें चंदे की पाई-पाई का हिसाब जनता के समक्ष रखना पड़ जाए।

राजनीति में कालेधन का इस्तेमाल हमेशा से ही चिंता का विषय रहा है। चुनाव के वक्त कालेधन का प्रवाह और तेजी से बढ़ जाता है, यह कोई छिपी बात भी नहीं है। किसी को भी पता नहीं चल पाता कि कौन किस पार्टी को कितना पैसा चंदे के रूप में दे रहा है। सारे उद्योगपति किस तरह से और क्यों राजनीतिक दलों को दान देते हैं, यह कोई छिपी बात नहीं है। वरना चुनावों में पार्टियां कैसे पानी की तरह पैसा बहा सकती हैं! पिछले साल चुनावी बांड योजना लाने का मकसद यही था कि इससे चुनावी राजनीति में कालेधन के इस्तेमाल पर लगाम लगेगी। लेकिन चुनावी बांड योजना जिस तरह से लाई गई, तभी से यह संदेह के घेरे में है और इस पर सवाल उठ रहे हैं। संदेह तब पैदा हुए जब इस योजना को लाने के लिए आयकर कानून, जनप्रतिनिधित्व कानून, वित्त कानून, कंपनी कानून सहित कई कानूनों में संशोधन किए गए। इससे यह संदेश गया कि खास दलों के हितों के लिए यह सब किया जा रहा है। इसीलिए गैरसरकारी संगठन एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म ने अदालत का दरवाजा खटखटाया और चुनावी बांड पर रोक लगाने की मांग की।

सवाल है कि राजनीतिक दल क्यों नहीं चाहते कि उन्हें मिलने वाले चंदे की सही जानकारी सार्वजनिक हो। यह विडंबना ही है कि एक तरफ राजनीतिक दल भ्रष्टाचार को चुनावी मुद्दा बनाते हैं और उसे खत्म करने का संकल्प लेकर वोट मांगते हैं और दूसरी ओर जब अपने मामले में पारदर्शिता की बात आती है तो संकट नजर आने लगता है। अगर चुनावी बांड योजना पुख्ता होती तो क्यों चुनाव आयोग इस पर सवाल उठाता? चुनाव आयोग शुरू से ही इस बात का प्रबल पक्षधर रहा है कि चुनावी बांड के जरिए दान देने वालों का नाम सार्वजनिक होना चाहिए, ताकि चुनावी चंदे में पारदर्शिता बनी रहे। सर्वोच्च अदालत का कहना भी यही है कि अगर चुनावी बांड खरीदने वालों की पहचान उजागर नहीं होती है तो चुनाव में कालेधन के इस्तेमाल को रोकने की कोशिशें व्यर्थ साबित होंगी। देश में जो भी पैसा खर्च होता है वह जनता का पैसा है, चाहे चुनाव में खर्च हो या किसी अन्य मद में। ऐसे में आमजन को यह जानने का हक क्यों नहीं होना चाहिए कि कौनसा दल किससे कितना पैसा ले रहा है!

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