मध्य प्रदेश में मुरैना रेलवे स्टेशन के निकट हुए हादसे में चार यात्रियों की मौत से रेलवे की सुरक्षा व्यवस्था पर फिर से गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। बार-बार होने वाले इस तरह के हादसे रेलवे बोर्ड के उन दावों की सच्चाई को सामने लाते हैं, जिनमें रेलगाड़ी के सफर को पूरी तरह सुरक्षित बनाए जाने की बात कही जाती है।

सवाल है कि अगर चलती ट्रेन में किसी तरह की अफवाह से बचने के लिए सुरक्षात्मक उपायों पर ध्यान न दिया जाए, तो इसके लिए कौन जिम्मेदार है?

गौरतलब है कि रविवार को खजुराहो-उदयपुर इंटरसिटी एक्सप्रेस के इंजन के पास के एक डिब्बे में आग लगने की अफवाह के बाद कुछ यात्री ट्रेन से उतर कर बगल की पटरियों पर खड़े हो गए। इसी बीच, दूसरी ओर से आ रही एक अन्य ट्रेन की चपेट में आने से चार यात्रियों की मौत हो गई। इससे प्रतीत होता है कि पहले हुए इस तरह के हादसों से कोई सबक नहीं लिया गया।

एक ट्रेन के यात्रियों का दूसरी ट्रेन की चपेट में आने की यह कोई पहली घटना नहीं है। इससे पहले भी देश भर में ऐसे कई हादसे हो चुके हैं। सवाल है कि इस तरह की अफवाह के दौरान स्थिति को कैसे संभालना है, क्या रेलवे कर्मियों को इसका प्रशिक्षण नहीं दिया जाता है? ट्रेन के चालक और अन्य कर्मियों को वहां से गुजरने वाली अन्य रेलगाड़ियों के समय की जानकारी होती है, इसके बावजूद दूसरी पटरी पर खड़े यात्रियों को समय रहते आगाह क्यों नहीं किया गया।

उत्तर मध्य रेलवे की ओर से जारी बयान में कहा गया कि घटनास्थल पर तीखा मोड़ है, इसलिए पटरी पर खड़े यात्रियों और दूसरी ओर से आ रही ट्रेन के चालक को एक-दूसरे का पता नहीं चल सका।

मगर सवाल यह भी है कि ऐसी स्थिति से निपटने के लिए रेलवे में बचाव का कोई पुख्ता तंत्र विकसित क्यों नहीं किया जाता? रेलवे बोर्ड को इस पर गंभीरता से विचार करना चाहिए और इस हादसे की गहराई से जांच कर दोषियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जानी चाहिए, ताकि इस तरह के हादसे की पुनरावृत्ति न हो।