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संपादकीय: काबुल में आतंक

काबुल विश्वविद्यालय में हुए आतंकियों के हमले में पैंतीस लोगों की मौत और लगभग पचास लोगों के घायल होने की घटना को इसी क्रम में देखा जा सकता है। सोमवार को विश्वविद्यालय परिसर में घुस आए तीन आतंकियों में से एक ने खुद को बम से उड़ा लिया और बाकी दो ने काफी देर तक छिपते-भागते विद्यार्थियों पर गोलियां बरसार्इं।

Author November 5, 2020 4:30 AM
काबुल विवि में बम बलास्‍ट के बाद घटना स्‍थल पर पहुंची पुलिस। फोटो।

अफगानिस्तान में शांति और स्थिरता के लिए राजनीतिक या कूटनीतिक स्तर पर जब भी कोई पहल होती है, तब वहां सक्रिय आतंकवादी संगठनों की ओर से ऐसी हरकत सामने आ जाती है, जिससे सकारात्मक दिशा में होने वाली कवायदों को धक्का पहुंचता है। फिलहाल कतर की राजधानी दोहा में अफगानिस्तान में शांति के लिए वार्ता चल रही है, लेकिन इसके समांतर अफगानिस्तान में अक्सर आतंकी हमले सामने आ रहे हैं और नाहक ही लोगों की जान जा रही है।

काबुल विश्वविद्यालय में हुए आतंकियों के हमले में पैंतीस लोगों की मौत और लगभग पचास लोगों के घायल होने की घटना को इसी क्रम में देखा जा सकता है। सोमवार को विश्वविद्यालय परिसर में घुस आए तीन आतंकियों में से एक ने खुद को बम से उड़ा लिया और बाकी दो ने काफी देर तक छिपते-भागते विद्यार्थियों पर गोलियां बरसार्इं।

किसी तरह खुद को बचा सके विद्यार्थियों ने जिस तरह अपने डरावने अनुभवों को बयान किया, उससे यही लगता है कि आतंकवादियों का मकसद बेकसूर लोगों की जान लेकर अपने खौफ का राज कायम करने का संदेश देना था। लेकिन इससे ज्यादा इसके पीछे एक गहरी साजिश दिखती है कि अफगानिस्तान शांति और स्थिरता के जिस रास्ते पर आगे बढ़ने की कोशिश कर रहा है, उसे बाधित किया जाए।

काबुल में बीते दो हफ्ते में यह दूसरी बार है, जब किसी शिक्षण संस्थान को निशाने पर रख कर हमला किया गया। दस दिन पहले काबुल के एक अन्य शिक्षण संस्थान पर आतंकी हमला हुआ था, जिसमें कम के कम दो दर्जन विद्यार्थी मारे गए थे। उस हमले की जिम्मेदारी आतंकी संगठन इस्लामी स्टेट ने ली थी। पिछले साल भी काबुल विश्वविद्यालय के मुख्य दरवाजे पर बम विस्फोट हुआ था, जिसमें आठ लोगों की जान चली गई थी।

विश्वविद्यालय में हुए ताजा हमले की जिम्मेदारी किसी आतंकी संगठन ने नहीं ली है, लेकिन इसमें तालिबान की भूमिका मानी जा रही है। हालांकि तालिबान ने इस घटना में अपना हाथ होने से इनकार किया है। लेकिन यह किसी से छिपा नहीं है कि अफगानिस्तान में फिलहाल आइएस और तालिबान ही ऐसे दो मुख्य समूह हैं, जो हिंसा के रास्ते अपना वर्चस्व कायम करने की कोशिश में लगे हैं।

इनका यह रुख तब भी कायम है, जब दोहा में अफगानिस्तान सरकार के साथ चल रही शांति वार्ता में खुद तालिबान का शीर्ष राजनीतिक नेतृत्व भी शामिल है। अब काबुल विश्वविद्यालय पर हुए आतंकी हमले के बाद अफगानिस्तान सरकार की ओर से जैसी प्रतिक्रिया आई है, उससे इस बात की आशंका खड़ी हो गई है कि मौजूदा शांति वार्ता का क्या हश्र होने वाला है।

दरअसल, शिक्षण संस्थानों पर आतंकी हमला करने वाले संगठनों और उनके एजेंडे को समझना मुश्किल नहीं है। कोई भी शिक्षित और जागरूक व्यक्ति या समूह आतंक और धर्मांधता की बुनियाद पर खड़ी वैसी राजनीति का समर्थन नहीं कर सकता, जो अपने वर्चस्व के लिए एक समाज को अर्धगुलामी की हालत में बनाए रखना चाहता है।

यही वजह है कि मुख्य रूप से शिक्षण संस्थान आतंकी संगठनों के हमले के निशाने पर रहते हैं। लेकिन अच्छा यह है कि अफगानिस्तान की मौजूदा सरकार शायद इससे समझौता के लिए तैयार नहीं दिख रही है।

राष्ट्रपति अशरफ गनी ने साफ शब्दों में कहा कि ज्ञान और प्रगति के दुश्मन हमारे लोगों को आतंकित करते रहे और विश्वविद्यालय पर शातिर आतंकवादी हमले को अंजाम दिया; हम निर्दोष विद्यार्थियों के एक-एक बूंद खून का हिसाब लेंगे। उन्होंने तालिबान सहित सभी आतंकवादी समूहों को चेतावनी दी। जाहिर है, लंबे समय से हिंसा और आतंक की आग में झुलस रहे अफगानिस्तान में शांति की उम्मीद पर फिर आशंका के बादल मंडराने लगे हैं।

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