ताज़ा खबर
 

संपादकीयः नशे में बचपन

देश में बच्चों के विकास से संबंधित अनेक पक्षों पर समय-समय पर नीतियां घोषित की जाती हैं। इसके बावजूद समाज और सरकारों की ओर से समय के साथ बच्चों की बदलती आदतों पर गौर करते हुए उनका उचित हल तलाशने की कोशिशों में कमी दिखती है।

Author July 10, 2018 04:31 am
अदालत ने उस फैसले में बच्चों के बीच नशे की पैठ का पता लगाने के लिए एक राष्ट्रीय सर्वेक्षण का भी निर्देश दिया था।

देश में बच्चों के विकास से संबंधित अनेक पक्षों पर समय-समय पर नीतियां घोषित की जाती हैं। इसके बावजूद समाज और सरकारों की ओर से समय के साथ बच्चों की बदलती आदतों पर गौर करते हुए उनका उचित हल तलाशने की कोशिशों में कमी दिखती है। इन आदतों में बच्चों के बीच तेजी से फैलती मादक पदार्थों की लत एक बड़ी समस्या के रूप में सामने है। कायदे से इसकी गंभीरता के मद्देनजर सरकार को खुद ही कोई ठोस कदम उठाना चाहिए था, लेकिन विडंबना है कि इससे चिंतित पक्षों को अदालतों का सहारा लेना पड़ रहा है। इस मसले पर एक गैरसरकारी संगठन की याचिका पर सुनवाई के बाद अपने ताजा आदेश में सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से पूछा है कि बच्चों में नशे की बढ़ती लत पर काबू पाने के लिए उसने क्या कदम उठाए हैं। गौरतलब है कि दिसंबर, 2016 में उच्चतम न्यायालय ने इस संबंध में कई दिशा-निर्देश जारी किए थे और केंद्र सरकार से कहा था कि स्कूली बच्चों के बीच नशे की लत को रोकने के लिए वह छह महीने के भीतर राष्ट्रीय कार्ययोजना बनाए। मगर हालत यह है कि अब डेढ़ साल के बाद भी अदालत को अपने उस फैसले पर अमल की हालत के संदर्भ में सरकार को याद दिलाना पड़ रहा है।

अदालत ने उस फैसले में बच्चों के बीच नशे की पैठ का पता लगाने के लिए एक राष्ट्रीय सर्वेक्षण का भी निर्देश दिया था। यों राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण, 2005-06 की एक रिपोर्ट के मुताबिक देश भर में पंद्रह से अठारह साल की उम्र के लगभग साढ़े बारह करोड़ में से चार करोड़ से ज्यादा बच्चे तंबाकू, शराब या किसी अन्य मादक पदार्थ की आदत के शिकार हैं। इनमें लड़कों की तादाद 28.6 फीसद है, जबकि पांच फीसद लड़कियां भी किसी न किसी नशे की शिकार हैं। इस सर्वेक्षण के एक दशक बाद भी चूंकि इस पर काबू पाने के लिए कोई ठोस पहलकदमी नहीं हुई है, इसलिए सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के मुताबिक नया सर्वेक्षण कराना भी समस्या से निपटने में मददगार साबित हो सकता है। इसके अलावा, 2009 में संयुक्त राष्ट्र के नारकोटिक्स नियंत्रण बोर्ड की एक रिपोर्ट के मुताबिक दस-ग्यारह साल के करीब सैंतीस फीसद स्कूली बच्चे नशाखोरी की आदत के शिकार हो जाते हैं। इनमें से अधिकतर बच्चे निचले और गरीब तबके से होते हैं। सवाल यह है कि इस समस्या से निपटना सरकार की प्राथमिकता में क्या इसलिए नहीं शामिल है कि इसकी मार गरीब वर्गों के बच्चों को झेलनी पड़ती है?

कोई भी जागरूक समाज अपनी भावी पीढ़ियों को स्वस्थ बनाने और उनकी जीवन शैली में घुली बुरी आदतों को दूर करने के लिए समय रहते पहलकदमी करता है। लेकिन हमारे यहां आमतौर पर बच्चों की सेहत और दिनचर्या से जुड़े सवालों को पर्याप्त गंभीरता से नहीं लिया जाता है। इस मसले पर टालमटोल या उदासीनता भरे रवैए का ही नतीजा यह है कि आज बड़ी तादाद में बच्चे अलग-अलग तरह के नशे की गिरफ्त में हैं। यह ध्यान रखने की जरूरत है कि किसी भी तरह के मादक पदार्थों की लत हमारे बच्चों और युवाओं की सेहत के साथ-साथ समूचे व्यक्तित्व को काफी नुकसान पहुंचा रही है। इससे उनका भविष्य भी बुरी तरह प्रभावित होता है और इसका सीधा असर उनके परिवार और समाज पर पड़ता है। यह अलग से बताने की जरूरत शायद नहीं है कि इससे समाज और देश की कैसी तस्वीर बनेगी। जरूरत इस बात है कि समय रहते इस समस्या की गंभीरता की स्वीकार किया जाए और जमीनी स्तर पर ठोस पहल की जाए।

Hindi News से जुड़े अपडेट और व्‍यूज लगातार हासिल करने के लिए हमारे साथ फेसबुक पेज और ट्विटर हैंडल के साथ गूगल प्लस पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News App