पश्चिम बंगाल में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआइआर की प्रक्रिया की वजह से जिस तरह की जटिलता खड़ी हुई है, उसमें लाखों मतदाताओं के मताधिकार से वंचित रह जाने की आशंका है। इस मसले पर राज्य के आम लोगों के बीच आक्रोश भी देखा गया। मगर यह सवाल अब भी कायम है कि अगर किन्हीं वजहों से बाद में पात्र साबित हुए मतदाता वोट देने से वंचित रह गए, तो इसके लिए किसे जिम्मेदार ठहराया जाएगा।
समस्या यह है कि पश्चिम बंगाल में 23 और 29 अप्रैल को वोट डाले जाने हैं और अब तक भारी संख्या में वैसे लोग मतदाता सूची से बाहर हैं, जिन्हें ‘विचाराधीन’ की श्रेणी में रखा गया है या जो किसी मामूली गड़बड़ी की वजह से नियमों की कसौटी पर पात्र नहीं माने गए। यह बेवजह नहीं है कि राज्य में इस मसले पर तीखे मतविरोध उभरे हैं और मांग की जा रही है कि चुनाव आयोग ऐसी कोई व्यवस्था करे, ताकि किसी पात्र मतदाता को मतदान के अधिकार से वंचित नहीं होना पड़े।
इसी के मद्देजनर सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को अनुच्छेद 142 का हवाला देते हुए एक अहम आदेश दिया कि पश्चिम बंगाल में 23 अप्रैल को होने वाले पहले चरण के मतदान के लिए अपीलीय प्राधिकरण जिन लोगों की अपील पर 21 अप्रैल तक फैसला दे देंगे, वे अपने मतदान के अधिकार का इस्तेमाल कर सकेंगे। वहीं, प्राधिकरण की ओर से जिन लोगों की अपील पर 27 अप्रैल तक फैसला कर दिया जाएगा, वे 29 अप्रैल को दूसरे चरण में अपने मताधिकार का उपयोग कर सकेंगे।
यानी सुप्रीम कोर्ट के इस आदेश के बाद राज्य के लाखों वैसे लोगों को राहत मिली है, जिन्हें किन्हीं वजहों से एसआइआर की प्रक्रिया के दौरान वोट देने के अधिकार से वंचित मान लिया गया था। उसके बाद मतदाता सूची से हटाए गए बहुत सारे लोगों ने अपीलीय प्राधिकरणों में अपील दायर की हुई है कि उन्हें पात्र मतदाता माना जाए। दरअसल, सुप्रीम कोर्ट ने निर्वाचन आयोग को निर्देश दिया है कि पश्चिम बंगाल में मतदाता सूची से नाम हटाए जाने के खिलाफ जिन मतदाताओं की अपील प्राधिकरणों की ओर से स्वीकार कर ली गई है, उनके नाम को शामिल करते हुए पूरक संशोधित मतदाता सूची जारी की जाए।
करीब सत्ताईस लाख मतदाताओं के नाम हटाए गए थे
अब यह उम्मीद की जा सकती है कि राज्य में एसआइआर की प्रक्रिया के बाद जिन करीब सत्ताईस लाख मतदाताओं के नाम हटा दिए गए थे, उन्हें अपने मताधिकार का प्रयोग करने का अवसर मिल सकेगा। मगर तथ्य यह भी है कि निर्वाचन आयोग की ओर से जल्दबाजी और पुनरीक्षण की प्रक्रिया में तमाम खामियों की वजह से अपनी पात्रता साबित करने का बोझ खुद मतदाताओं पर ही आ खड़ा हुआ है।
एक सवाल यह है कि मतदाता सूची से बाहर किए गए लोगों में अगर कई लोग अपील की प्रक्रिया के बारे में जानकारी और जागरूकता की कमी की वजह से प्राधिकरणों के पास नहीं जा सके, तो क्या सिर्फ इस आधार पर उन्हें अंतिम तौर पर अपात्र मान लिया जाएगा! यह अपने आप में एक बड़ी विडंबना है कि लोगों के वोट देने के हक को सुनिश्चित करने की प्रक्रिया पर जिस तरह के सवाल उठे हैं, वे लोकतंत्र और संवैधानिक अधिकारों के लिहाज से दुखद हैं।
इससे शायद ही किसी को असहमति होगी कि किसी भी अपात्र व्यक्ति को वोट देने का हक नहीं मिलना चाहिए, लेकिन साथ ही वास्तव में किसी भी पात्र मतदाता को सिर्फ तकनीकी बारीकियों और जटिलताओं के आधार पर मतदान के अधिकार से वंचित नहीं किया जाना चाहिए।
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इसमें कोई दोराय नहीं कि संसद में सीटों की संख्या में बढ़ोतरी समय की जरूरत हो सकती है और निर्धारित प्रक्रिया के तहत इसमें बदलाव हो सकते हैं। मगर इस वर्ष परिसीमन की कवायद को लेकर कई सवाल उभरते दिख रहे हैं। खासतौर पर दक्षिण भारत के राज्यों की ओर से यह आशंका जताई जा रही है कि परिसीमन के ताजा प्रस्ताव के तहत जो प्रारूप सामने आया है, अगर वह अमल में आया तो यह व्यापक स्तर पर भेदभाव का कारण बनेगा। हालांकि इस तरह के कदम उठाने से पहले देशभर में सर्वसम्मति कायम करने की अपेक्षा की जाती है, ताकि राज्यों के बीच मतभेद न उपजे, लेकिन परिसीमन को लेकर केंद्र सरकार की पहल के बाद तमिलनाडु में जिस तरह का विरोध उभर रहा है, उससे कई सवाल उठे हैं। इस खबर को पूरी तरह पढ़ने के लिए यहां पर करें क्लिक
