पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनाव के नतीजों के बाद वहां विपक्ष की राजनीति में शुरू हुई उथल-पुथल से फिर यही जाहिर हुआ है कि आज सिद्धांत और विचारधारा की राजनीति के तकाजे पीछे छूट चुके हैं। राज्य में सत्ता से बाहर होने के बाद तृणमूल कांग्रेस बहुस्तरीय मुश्किलों से जूझ रही है।
भाजपा की सरकार बनने के बाद राज्य में कई जगहों पर तृणमूल कांग्रेस के कार्यकर्ताओं से लेकर बड़े नेताओं तक पर प्रत्यक्ष हमले हुए। मगर इस सबके बीच विधानसभा के लिए चुने गए कई विधायकों के अलग होने का फैसला पार्टी के लिए एक बड़ा झटका है।
दरअसल, तृणमूल कांग्रेस के अस्सी में से अट्ठावन विधायकों ने अपना अलग गुट बना लिया और उसे विधानसभा में तुरंत मान्यता भी दे दी गई। यों इस बगावत का सिरा तृणमूल के दो विधायकों, ऋतव्रत बनर्जी और संदीपन साहा को पार्टी विरोधी गतिविधियों के आरोप में निष्कासित किए जाने से जुड़ा माना जा रहा है। इसके बाद ऋतव्रत बनर्जी ने अन्य विधायकों का समर्थन जुटाकर अपना अलग गुट बना लिया और खुद को विधानसभा में असली तृणमूल कांग्रेस घोषित कर दिया।
तीन दशक की राजनीति में ममता बनर्जी के नेतृत्व वाली टीएमसी मुश्किल में
जाहिर है, बीते करीब तीन दशक की राजनीति में ममता बनर्जी के नेतृत्व वाली तृणमूल कांग्रेस के लिए यह एक मुश्किल वक्त है। इससे हुए नुकसान को कम करने की कोशिश में पार्टी ने राज्य में अपनी सभी समितियों और आनुषंगिक संगठनों को भंग कर दिया, मगर एक साथ इतनी बड़ी संख्या में चुने हुए प्रतिनिधियों का पार्टी छोड़ना तृणमूल कांग्रेस के लिए संभवतः एक बड़ी चुनौती साबित हो सकता है।
हालांकि पार्टी से अलग होने की घोषणा करने वाले विधायकों की संख्या चूंकि दो-तिहाई से ज्यादा है, इसलिए दल-बदल कानून के प्रावधानों का कोई असर नहीं पड़ेगा, लेकिन इससे फिर यही सवाल उठा है कि देश की राजनीति में अवसरों का लाभ उठाने की यह कैसी प्रवृत्ति है, जिसमें जनता के भरोसे का खयाल रखना अब एक गैर-महत्त्वपूर्ण विषय माना जाने लगा है। यह भी विचित्र है कि ऐसी बगावत आमतौर पर अपनी पार्टी के सत्ता से बाहर होने या सरकार बनाने के गणित में कमजोर होने के बाद ही देखी जाती है।
टीएमसी में बगावत को शिवसेना में टूट की तरह देखा जा रहा है
पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस में बगावत को करीब चार साल पहले महाराष्ट्र में शिवसेना की टूट की तरह देखा जा रहा है, जब एकनाथ शिंदे के नेतृत्व में कई विधायकों ने उद्धव ठाकरे से खुद को अलग कर लिया था। उसके बाद आखिरकार पार्टी का नियंत्रण उद्धव ठाकरे से एकनाथ शिंदे के हाथ में चला गया था।
इसमें लोकतांत्रिक अधिकारों की दलील दी जा सकती है, मगर सवाल है कि किसी खास पार्टी के सिद्धांत और उसकी विचारधारा के आधार पर जनता का समर्थन और जीत हासिल करने के बाद अचानक उसे छोड़ देना किस तरह लोकतंत्र को मजबूत करेगा। राजनीति में शुचिता और सिद्धांतों की बुनियाद की अहमियत को कायम रखने के लिए दल-बदल कानून लाया गया था। मगर ऐसा लगता है कि उसके प्रावधानों को भी सिर्फ तकनीकी कसौटी पूरी होने के दायरे में समेट दिया गया है।
हाल के वर्षों में यह प्रवृत्ति तेजी से जोर पकड़ रही है, जिसमें किसी भी कीमत पर सत्ता का सिरा थामने के लिए चुनाव में जीते हुए प्रतिनिधियों को इस बात का खयाल रखना बिल्कुल जरूरी नहीं लग रहा है कि उन्हें जनता ने किन सिद्धांतों, वादों या राजनीति की वजह से चुना था।
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पश्चिम बंगाल विधानसभा में बीजेपी के पास दो तिहाई बहुमत है और उसका पूरा दबदबा है। बीजेपी 80 सदस्यों वाली तृणमूल कांग्रेस (TMC) में फूट पर करीब से नजर रख रही है। बीजेपी नेताओं का कहना है कि इसका कारण संसद में पार्टी के संख्या बल को बढ़ाना है। बता दें कि NDA के पास ज़रूरी संवैधानिक संशोधनों को आसानी से पास कराने के लिए जरूरी संख्या बल नहीं है। पूरी खबर पढ़ने के लिए यहां पर करें क्लिक
