Political Violence: पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनाव और उसके नतीजे आने के बाद से ही आए दिन किसी बात पर हिंसा और अराजकता की जैसी स्थिति बनी हुई है, उसमें ऐसा लगता है कि सरकार और पुलिस मूकदर्शक की भूमिका में हैं और जो हो रहा है, उसे होने दिया जा रहा है।

अन्यथा क्या कारण है कि किसी भी राजनीतिक पक्ष के कार्यकर्ता या फिर उनका समर्थन करने वाले लोग बिना किसी बड़ी वजह के अचानक ही आक्रामक या अराजक हो जाते हैं और पुलिस कानून व्यवस्था बनाए रखने का इंतजाम करने के बजाय उदासीन दिखती है।

राज्य में 24 परगना जिले के हलिशहर में रविवार को पूर्व मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के साथ जो हुआ, वह न केवल कानून व्यवस्था पर एक गहरा सवाल है, बल्कि इससे यह भी पता चलता है कि बदले की भावना जब राजनीति में जगह पाती है, तो किस तरह एक अफसोसनाक हिंसा की संस्कृति का विस्तार होता है।

गौरतलब है कि तृणमूल कांग्रेस के एक कार्यकर्ता की पुलिस हिरासत में मौत के बाद ममता बनर्जी उसके परिजनों से मिलने जा रही थीं। इस बीच उनकी गाड़ी पर हमला किया गया, कीचड़ और पत्थर फेंके गए, आक्रामक और अवांछित नारे लगाए गए। अफसोसनाक यह था कि वहां मौजूद पुलिस ने यह सब रोकने के लिए जरूरी सक्रियता नहीं दिखाई।

हैरानी की बात यह है कि वहां की स्थिति एक तरह से बेलगाम हो जाने की आशंका के बावजूद पुलिस ने उपद्रवियों की भीड़ को जमा होने से नहीं रोका। यह बेवजह नहीं है कि इस घटना के बाद ममता बनर्जी ने आरोप लगाया कि पुलिस के सामने ही उनकी गाड़ी पर बड़े-बड़े पत्थर फेंके गए… गाड़ी पर किया गया हमला इतना गंभीर था कि अगर खिड़कियां खुली होतीं, तो उनका सिर फट जाता।

सवाल है कि राज्य में तीन बार मुख्यमंत्री रह चुकी एक महिला नेता को जब इस स्तर की अराजकता का सामना कर पड़ रहा है, तो राज्य में कानून व्यवस्था की वास्तविक तस्वीर क्या होगी! हालांकि यह पहली बार नहीं है जब राज्य में असंतोष और नाराजगी के नाम पर चुनावों के बाद इस तरह की बेलगाम प्रतिक्रिया देखी गई हो।

ज्यादा दिन नहीं बीते हैं, जब विधानसभा चुनाव के नतीजों में तृणमूल कांग्रेस की हार हुई थी और भाजपा की सरकार बनी। उसके बाद राज्य के अलग-अलग इलाकों में अनेक जगहों पर तृणमूल कांग्रेस के कार्यकर्ताओं या समर्थकों पर हमले की घटना सामने आई।
अंदाजा इससे लगाया जा सकता है कि अभिषेक बनर्जी और कल्याण बनर्जी जैसे कद्दावर नेताओं पर घातक हमले किए गए।

इसी तरह एक घटना में तृणमूल कांग्रेस की नेता महुआ मोइत्रा पर भी अंडे फेंके गए। विचित्र यह है कि सत्ता में होने के नाते जहां भाजपा सरकार को ऐसी घटनाओं पर शर्मिंदा होना चाहिए, वहां इस पर अफसोसनाक प्रतिक्रियाएं सामने आर्इं। क्या ऐसी घटनाओं को सिर्फ जनता की नाराजगी बता कर इनकी गंभीरता को खारिज किया जा सकता है?

क्या इस तरह का रवैया कानून व्यवस्था को संभाल पाने में राज्य सरकार की नाकामी को नहीं दर्शाता है? पश्चिम बंगाल की राजनीति में हिंसा कोई नई बात नहीं है। मगर सवाल है कि जिन राजनीतिक दलों को इससे शिकायत रही, जिन्होंने इससे पहले की सरकारों और सत्ताधारी पार्टियों पर सवाल उठाए, वे जब खुद सत्ता में आए तब उन्हें राजनीतिक हिंसा की प्रवृत्ति को रोकना जरूरी क्यों नहीं लग रहा!

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केंद्रीय मंत्री किरेन रिजीजू राहुल गांधी से मिलकर कहते हैं कि मान जाओ और संसद चलने दो… महत्त्वपूर्ण विधेयकों पर चर्चा करो, लेकिन राहुल हैं कि मानते ही नहीं। वे अड़े हैं कि जब तक केंद्रीय गृहमंत्री ‘विद्यार्थियों पर पैलेट गन चलाने’ की घटना पर वक्तव्य नहीं दे देते, तब तक संसद नहीं चलने देंगे। फर्क इतना ही है कि पहले वे गृहमंत्री के इस्तीफे की मांग पर अड़े थे, अब बयान पर अड़े हैं। एक तरफ सत्तापक्ष की ‘जिद’, तो दूसरी ओर विपक्ष की ‘जिद’ संसद के कामकाज को ‘स्थगित’ कराती रहती है। पढ़िए पूरा लेख