लोकतंत्र में चुनाव की शुचिता का मूल आधार पारदर्शिता और निष्पक्षता पर टिका होता है। पात्र मतदाता ही चुनावी प्रक्रिया का हिस्सा बनें, यह सुनिश्चित करने के लिए मतदाता सूची में समय-समय पर संशोधन जरूरी होता है।

इसी उद्देश्य से निर्वाचन आयोग ने देश के विभिन्न राज्यों में विशेष गहन पुनरीक्षण की प्रक्रिया शुरू की है, मगर इसमें कई तरह की आशंकाएं और चुनौतियां भी सामने आ रही हैं। खासकर पश्चिम बंगाल में पुनरीक्षण को लेकर कई मौकों पर निर्वाचन आयोग और राज्य सरकार को आमने-सामने देखा गया है। सवाल और आरोप वही हैं कि राज्य में इस प्रक्रिया का राजनीतिकरण किया जा रहा है।

पहले नागरिकता प्रमाण पत्रों को लेकर विवाद उठा, फिर बूथ स्तरीय अधिकारियों पर काम के बोझ का मुद्दा सुर्खियों में आया और अब तार्किक विसंगतियों से संबंधित दावों और आपत्तियों के पारदर्शी तरीके से समय पर निपटारे का मसला सामने आया है।

सर्वोच्च न्यायालय ने पिछले सप्ताह इस कार्य में सहायता के लिए सेवारत और पूर्व जिला न्यायाधीशों को तैनात करने का निर्देश दिया था और अब राज्य के दीवानी न्यायाधीशों की तैनाती तथा पड़ोसी राज्यों झारखंड और ओड़ीशा से न्यायिक अधिकारियों को बुलाने की अनुमति भी दे दी है।

गौरतलब है कि मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण की शुरुआत बिहार से हुई थी और तब से लेकर यह प्रक्रिया विवादों में है। शुरू में चुनाव आयोग की ओर से आधार कार्ड को पहचान पत्र के दस्तावेज में शामिल नहीं करने का मुद्दा प्रमुखता से उठा था, मगर बाद में सर्वोच्च न्यायालय के निर्देश पर इसे पहचान के दस्तावेज में शामिल कर लिया गया।

मगर पश्चिम बंगाल में आधार कार्ड को लेकर चुनाव आयोग की आशंकाएं अभी भी बरकरार हैं। शीर्ष अदालत में मंगलवार को आयोग की तरफ से दलील दी गई कि देश भर में फर्जी आधार कार्ड का इस्तेमाल बड़े पैमाने पर हो रहा है और बंगाल में ऐसे मामलों की संख्या सर्वाधिक है। इस पर अदालत ने कहा कि ऐसे मामलों में गहन जांच की आवश्यकता हो सकती है, लेकिन यह समय इसके लिए उपयुक्त नहीं है। साथ ही कहा कि चूंकि जनप्रतिनिधित्व अधिनियम में संशोधन से आधार को पहचान प्रमाण के रूप में शामिल किया गया था, इसलिए इसे स्वीकार करना होगा।

दरअसल, पश्चिम बंगाल सरकार का दावा था कि पुनरीक्षण प्रक्रिया के तहत राज्य में तार्किक विसंगतियों को लेकर बड़ी संख्या में लोगों को नोटिस भेजे गए हैं और अब करीब अस्सी लाख दावों और आपत्तियों का निपटारा किया जाना है, जिसमें निष्पक्षता बेहद जरूरी है।

इसी के मद्देनजर सर्वोच्च अदालत ने इस कार्य में मदद के लिए सेवारत और पूर्व जिला न्यायाधीशों को तैनात करने का निर्देश दिया है। सवाल है कि पुनरीक्षण की प्रक्रिया में शीर्ष अदालत को बार-बार दखल क्यों देना पड़ रहा है?

इस कार्य को पारदर्शी और निष्पक्ष तरीके से संपन्न कराने की जिम्मेदारी निर्वाचन आयोग की है और इसमें संबंधित राज्य सरकार को भी हरसंभव सहयोग करना होता है। ऐसे में अपेक्षा यही की जाती है कि इस कार्य को सियासत से दूर रखकर बेहतर समन्वय और सामंजस्य के साथ काम किया जाए।

बहरहाल, सबसे जरूरी पहलू यह है कि नई मतदाता सूची तैयार करने में पूरी ईमानदारी बरती जाए, ताकि सभी पात्र नागरिकों का मताधिकार सुरक्षित रहे।