पश्चिम बंगाल में चुनाव के नतीजे सामने आने के बाद हिंसक घटनाएं सामान्य हो चुकी हैं। मगर हाल ही में जब विधानसभा चुनावों के बाद व्यापक फेरबदल हुआ और भारतीय जनता पार्टी ने अपनी सरकार बनाई, तो इसे राज्य में एक बड़े बदलाव का उदाहरण बताया गया। वहां की जनता के बीच एक उम्मीद पैदा हुई कि अगर सत्ता में बदलाव आया है, तो संभवत: इसका असर सरकार के कामकाज से लेकर जमीनी स्तर पर आम लोगों के जीवन पर भी पड़े।
मगर पहली बार भाजपा की सरकार बनने के बाद जो हालात दिख रहे हैं, उससे ऐसा लगता है कि वहां अराजक तत्त्वों को खुली छूट मिली हुई है, विपक्ष के नेताओं पर सीधे हमले हो रहे हैं और शासन उदासीन है। ऐसी अनेक घटनाएं सामने आई हैं, जिनमें एक तरह से बदले की भावना से विपक्षी दलों के नेताओं या उनके समर्थकों पर हमले हुए हैं और कानून-व्यवस्था लाचार है। इससे यह सवाल उठा है कि क्या राज्य के लोगों ने इसी तरह के हालात के लिए बदलाव के पक्ष में वोट दिया था।
गौरतलब है कि पिछले दो दिनों के भीतर पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस के दो नेताओं, अभिषेक बनर्जी और कल्याण बनर्जी पर लोगों की भीड़ ने पुलिस या सुरक्षा बलों की मौजूदगी में घातक हमला किया। दरअसल, तृणमूल कांग्रेस के नेता और सांसद अभिषेक बनर्जी चुनाव के बाद हुई हिंसा के पीड़ित अपनी पार्टी के कार्यकर्ताओं से मिलने सोनारपुर दक्षिण पहुंचे थे। मगर आरोप के मुताबिक वहां भाजपा के कार्यकर्ताओं ने उन्हें घेर लिया और नारेबाजी करते हुए उनके साथ मारपीट की।
एक अन्य घटना में तृणमूल कांग्रेस के एक और सांसद कल्याण बनर्जी पर भी हमला किया गया। गनीमत रही कि दोनों को किसी तरह भीड़ से निकाल लिया गया। मगर उन पर जिस तरह हमला किया गया, वह सभी पार्टियों के लिए चिंता का विषय होना चाहिए। हैरानी की बात यह है कि लोकतंत्र की बहाली के जिस नारे के साथ चुनावों में जनता का समर्थन मांगा गया, सरकार बदलने के बाद अब वही लोकतंत्र बाधित होता दिख रहा है और राज्य सरकार अराजक तत्त्वों पर काबू पाने के बजाय सब कुछ अपने आप ठीक होने की उम्मीद कर रही है।
सवाल है कि चुनावी नतीजों के बाद राज्य में विपक्षी दलों के समर्थकों या कार्यकर्ताओं के सामने जैसे हालात पैदा हो रहे हैं, उनके नेताओं की गतिविधियों को जिस तरीके से बाधित किया जा रहा है, उसे किस कसौटी पर लोकतंत्र कहा जाएगा। अव्वल तो समूचे राज्य में कहीं भी प्रतिद्वंद्विता की वजह से हिंसक या एक दूसरे पर हमले की घटनाओं को पूरी तरह रोकने और किसी भी पार्टी का समर्थन करने वाले अराजक तत्त्वों के खिलाफ सख्ती बरतने के लिए पुलिस को स्पष्ट निर्देश देने की जरूरत है। फिर विपक्षी दलों के नेता अगर लोकतांत्रिक गतिविधियों के लिए जनता के बीच जाते हैं, तो उन्हें सुरक्षा मुहैया कराना सरकार का दायित्व है।
पश्चिम बंगाल में चुनावों के नतीजे सामने आने के बाद प्रधानमंत्री ने कहा था कि अब राज्य में ‘बदला नहीं, बदलाव’ और ‘भय नहीं, भविष्य’ की बात होनी चाहिए। यों भी, अगर नई सरकार ने बदलाव का सपना दिखाया है, तो उसकी सबसे पहली जिम्मेदारी राज्य में हर स्तर पर लोकतांत्रिक माहौल को बहाल करना होना चाहिए। राज्य में कानून-व्यवस्था के मोर्चे पर अगर ऐसे हालात रहे कि विपक्ष को दबाने वाले तत्त्वों को खुली छूट दी गई, तो यह एक तरह से राज्य सरकार की सबसे बड़ी नाकामी होगी।
