पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनाव के पहले चरण में गुरुवार को जिस तरह करीब बानबे फीसद मतदान की खबर आई है, उससे साफ है कि इस बार वहां की जनता ने अपने मताधिकार को लेकर अपेक्षया ज्यादा सजगता दिखाई है। इसका एक कारण एसआइआर की प्रक्रिया के बाद मतदाता सूची में मौजूद लोगों का अपने मताधिकार को लेकर पहले से ज्यादा सतर्क होना भी हो सकता है।
हालांकि अभी दूसरे चरण का मतदान बाकी है और आखिरी तस्वीर नतीजों के बाद साफ होगी, लेकिन राज्य में बड़ी संख्या में लोगों के वोट डालने से वंचित रह जाने को लेकर जैसे सवाल उठ रहे हैं, उनका जवाब सामने आना देश की लोकतांत्रिक परंपराओं को बचाए रखने के लिए जरूरी है। आखिर मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआइआर की प्रक्रिया के बाद जितने लोगों को मतदान के लिए अपात्र मान लिया गया और जो अपीलीय प्राधिकरण के सामने गुहार लगाने के बावजूद वोट देने से वंचित रह गए, उनके नागरिक और संवैधानिक अधिकारों को अब किस कसौटी पर रखा जाएगा!
गौरतलब है कि पश्चिम बंगाल में एसआइआर की प्रक्रिया के बाद अब तक करीब सत्ताईस लाख लोगों के नाम मतदाता सूची से हटाए गए हैं। हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने संविधान के अनुच्छेद 142 का इस्तेमाल करते हुए चुनाव आयोग को निर्देश दिया था कि जिन लोगों की अपील अपीलीय प्राधिकरणों में स्वीकार कर ली जाती है, उनके लिए पूरक संशोधित मतदाता सूची जारी की जाए, ताकि अनुमति मिलने पर वे मतदान कर सकें।
शीर्ष अदालत के निर्देश के बाद यह उम्मीद जगी थी कि जो लोग मतदाता सूची से बाहर हो गए थे, उनके सामने भी अब वोट डाल सकने का एक विकल्प होगा और इस तरह सूची से बाहर होने के बाद की जटिलताओं से उनके बच सकने की गुंजाइश तैयार होगी। मगर बुधवार को आई खबर के मुताबिक मतदाता सूची से बाहर किए गए सत्ताईस लाख लोगों के आवेदनों में से सिर्फ 650 पर विचार किया गया और महज 139 को वोट देने की इजाजत मिली।
अंदाजा लगाया जा सकता है कि सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के मद्देनजर प्राधिकरण में जिस तरह अपीलों की सुनवाई की व्यवस्था हुई, उसका उद्देश्य शायद सिर्फ औपचारिकता पूरा करना था। इस कवायद के बावजूद एसआइआर की वजह से बड़ी संख्या में जो लोग मतदान करने से वंचित रह गए, उनके बारे में अब कानूनी स्थिति क्या होगी? फिर जिन लोगों को अभी मतदाता सूची में जगह मिलने के लिए अपात्र माना गया, बाद में किन्हीं कसौटी पर उन्हें सही बताया जाएगा, उनके मौजूदा चुनाव में मतदान न कर पाने के लिए क्या किसी की जवाबदेही तय की जाएगी?
इसमें कोई दोराय नहीं कि वास्तव में अपात्र लोगों को मतदाता सूची में जगह नहीं मिलनी चाहिए। मगर एसआइआर के बाद भारी संख्या में लोगों के मताधिकार छिन जाने से यह सवाल उठा है कि क्या अब तक ये सभी लोग अवैध तरीके से वोट डालते और प्रतिनिधि चुनते रहे! यह बेवजह नहीं है कि विपक्षी दलों की ओर से निर्वाचन आयोग पर एसआइआर की प्रक्रिया को लेकर गैरजरूरी हड़बड़ी दिखाने और नाहक ही लाखों को लोगों को मताधिकार से वंचित करने के आरोप लगाए जा रहे हैं।
यह समझना मुश्किल है कि चुनाव आयोग को ठीक उस वक्त एसआइआर कराने की जरूरत क्यों महसूस हुई, जब सिर पर चुनाव थे और मतदान के लिए अपात्र ठहराए गए लोगों को अपनी पात्रता साबित करने के लिए पर्याप्त वक्त नहीं मिला।
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पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में अब तक का सबसे ज्यादा मतदान दर्ज किया गया। गुरुवार को पहले चरण के मतदान में 92.14% वोटिंग हुई। यह चुनाव चुनाव आयोग की एसआईआर प्रक्रिया के बाद हो रहे थे। इस प्रक्रिया में वोटर लिस्ट से करीब 11% नाम हटा दिए गए थे। इसके चलते 27.10 लाख और वोटरों का भविष्य अधर में लटका हुआ था। उनकी अपीलें अभी भी ट्रिब्यूनलों में लंबित हैं। पूरी खबर पढ़ने के लिए यहां पर करें क्लिक
