पश्चिम बंगाल में चुनावों के दौरान और उसके बाद हिंसक घटनाओं का एक लंबा इतिहास रहा है। विडंबना यह है कि इस तरह की घटनाओं की निंदा तो सभी दल करते हैं, लेकिन उसे रोकने के लिए कुछ भी ऐसा नहीं किया जाता, ताकि हिंसा के हालात बनें ही नहीं।

गौरतलब है कि राज्य में इस बार विधानसभा के लिए हुए चुनावों के दौरान कोई बड़ी हिंसक घटना सामने नहीं आई, लेकिन नतीजे आने के बाद जैसी खबरें आ रही हैं, उससे साफ है कि हिंसा का सहारा लेने वाले असामाजिक तत्त्वों को रोकने के मद्देनजर एहतियातन कुछ भी नहीं किया गया। नतीजतन, बुधवार को राज्य में भाजपा के कद्दावर नेता शुभेंदु अधिकारी के सहायक सहित पांच लोगों की हत्या की खबर आई। इसके अलावा, कई लोग घायल भी हुए।

पहले से ही वहां इस बात की आशंका लगातार बनी हुई थी कि चुनाव प्रचार के दौरान आक्रामक खींचतान का असर नतीजों के बाद टकराव के तौर पर सामने आ सकता है। मगर ऐसी स्थितियों से निपटने में प्रशासनिक विफलता का ही यह नतीजा है कि राज्य में कई जगहों पर हिंसा और अराजकता के हालात पैदा हुए।

सवाल है कि आखिर किन वजहों से राज्य प्रशासन इस बात का आकलन करने में नाकाम रहा कि चुनावी नतीजों के बाद मुख्य राजनीतिक पक्षों के बीच का तनाव हिंसा में भी फूट सकता है। चुनाव के दौरान बहुस्तरीय सुरक्षा व्यवस्था की वजह से शांतिपूर्ण तरीके से मतदान संभव हो सका, तो क्या ऐसा बाद में भी नहीं हो सकता था?

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राज्य के चुनावों में एक समय ऐसे तनाव और टकराव के पक्ष अलग थे, लेकिन वहां की सियासी तस्वीर में समय के साथ हुए बदलाव के बाद अब वहां के दो प्रतिद्वंद्वी दल मुख्य रूप से तृणमूल कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी हैं। करीब पंद्रह वर्ष बाद वहां तृणमूल कांग्रेस के सत्ता से बाहर होने के बाद राज्य में कई जगहों पर सुरक्षा बलों की उपस्थिति के बावजूद हिंसक झड़प और तोड़फोड़ की घटनाएं सामने आईं।

प्रतिद्वंद्वी राजनीतिक दलों के कार्यालयों में तोड़फोड़, आगजनी और उनके समर्थकों तथा कार्यकर्ताओं के घरों तक पर हमले की खबरें यह बताती हैं कि राजनीतिक दलों के बीच अपने विरोधियों के प्रति लोकतांत्रिक उदारता दिखाने की औपचारिकता भी खत्म होती जा रही है। अंदाजा इससे लगाया जा सकता है कि हिंसक घटनाओं के दो सौ से ज्यादा प्राथमिकी दर्ज की गईं और करीब साढ़े चार सौ लोगों को गिरफ्तार किया गया। मगर जो काम पुलिस और प्रशासन ने स्थिति बेलगाम हो जाने के बाद किया, अगर पहले ऐसे कदम उठाए जाते, तो शायद कई जगहों पर हिंसा को रोका जा सकता था।

यह समझना मुश्किल है कि जो लोग नाहक या फिर प्रतिक्रिया के तौर पर हिंसक गतिविधियों का सहारा लेते हैं, वे आखिर क्या हासिल करना चाहते हैं। फिर आक्रामकता और अराजकता का सहारा लेकर ऐसे लोग क्या साबित करना चाहते हैं?

यह ध्यान रखने की जरूरत है कि लोकतांत्रिक परंपराओं में विश्वास रखने वाला कोई भी व्यक्ति चुनावी नतीजों का विश्लेषण करता है और परिपक्व तरीके से उस पर सभ्य प्रतिक्रिया देता है। अफसोस की बात यह है कि राजनीतिक दलों और उनके शीर्ष नेतृत्व की ओर से अपने समर्थकों को नियंत्रित रखने और लोकतांत्रिक तरीके से विरोध या समर्थन जाहिर करने को लेकर शायद ही कभी कोई संदेश जारी किया जाता है। वहीं स्थानीय प्रशासन भी पूर्वसावधानी के तौर पर ऐसे ठोस कदम नहीं उठाता, जिससे अराजकता को शुरू होने से पहले रोका जा सके।