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बंगाल सरकार ने किन्नर को बनाया प्रधानाचार्य: मानवी की मिसाल

पश्चिम बंगाल के एक महिला महाविद्यालय के प्रधानाचार्य पद पर मानवी वंद्योपाध्याय की नियुक्ति शिक्षा जगत की भी एक अहम घटना है और हमारे सामाजिक विकास की भी। वे किन्नर समुदाय की पहली सदस्य हैं जिन्हें एक शैक्षणिक संस्थान का नेतृत्व करने का गौरव हासिल हुआ है।

पश्चिम बंगाल के एक महिला महाविद्यालय के प्रधानाचार्य पद पर मानवी वंद्योपाध्याय की नियुक्ति शिक्षा जगत की भी एक अहम घटना है और हमारे सामाजिक विकास की भी। वे किन्नर समुदाय की पहली सदस्य हैं जिन्हें एक शैक्षणिक संस्थान का नेतृत्व करने का गौरव हासिल हुआ है। इससे समुदाय के पिछड़ेपन और वंचित स्थिति का अंदाजा लगाया जा सकता है। यों हमारे समाज में न जाति-समुदाय के आधार पर किसी तरह के भेदभाव की इजाजत है न लिंग के आधार पर। इसके बावजूद हमारे समाज में तरह-तरह के भेदभाव और वर्गीय प्रताड़ना के व्यवहार रोजाना दिखते हैं।

उन्हें इससे बचाने के लिए कुछ विशेष संवैधानिक उपाय किए गए और इसका लाभ भी मिला है। मसलन, अनुसूचित जाति और जनजाति के लोग आरक्षण का सहारा पाकर विधायिका से लेकर शैक्षिक संस्थानों और प्रशासनिक पदों पर पहुंचते रहे हैं। लेकिन किन्नर एक ऐसा समुदाय है जिसे सशक्तीकरण के किसी भी उपाय का आश्रय नहीं मिल सका है। फिर, उनकी हालत इसलिए और शोचनीय बनी रही है कि समाज में उनके प्रति उपेक्षा और उपहास का भाव व्याप्त रहा है। पढ़ाई-लिखाई के अवसर उनके लिए लगभग अलभ्य रहे हैं।

लिहाजा, नौकरियों में वे कहीं नहीं दिखते। कोई स्व-रोजगार करना भी उनके लिए बहुत मुश्किल रहा है, क्योंकि इसमें औरों का सहयोग जरूरी होता है। उनके प्रति हिकारत और भय के मनोभाव के चलते उनके लिए घरेलू सहायक या चौकीदार का काम पाना भी संभव नहीं होता। लिहाजा, वे बच्चे के जन्म या शादी-ब्याह जैसे अवसरों पर नाच-गाकर या भीख मांग कर अपना गुजारा करते दिखाई देते हैं। उनके लिए अपनी पहचान ही सबसे बड़ी समस्या होती है। लिहाजा, मानवी वंद्योपाध्याय जिस मुकाम पर पहुंची हैं वह हमारे समाज की एक ऐतिहासिक घटना दिखती है।

किन्नरों के बारे में जो रूढ़ सामाजिक मानसिकता है वह सोच भी नहीं सकती कि एक किन्नर में ऐसी प्रतिभा हो सकती है। पर प्रतिभा के अलावा यह मानवी का जज्बा ही था कि उन्होंने तमाम सामाजिक बाधाएं झेलते हुए बांग्ला भाषा और साहित्य में पीएचडी की उपाधि प्राप्त की और इसी विषय की प्राध्यापिका बनीं। अनेक वृत्तचित्रों में काम करने के अलावा उन्होंने ‘एंडलेस बांडेज’ नाम से एक उपन्यास भी लिखा है, जो खूब बिका और पढ़ा गया। प्रधानाचार्य पद पर उनकी नियुक्ति के लिए राज्य के कॉलेज सेवा आयोग की सराहना की जानी चाहिए।

मानवी इस नियुक्ति को अपनी निजी उपलब्धि के तौर पर नहीं देखतीं, कहती हैं कि इसका जश्न वे क्यों मनाएं जब तमाम किन्नर हर तरह की वंचना के शिकार हैं। पर उनकी कामयाबी उनके समुदाय के लिए एक प्रेरक मिसाल जरूर है। साथ ही हमारे समाज के लिए एक संदेश भी, कि अगर सहयोग, सुविधाएं और अवसर मिलें, तो उनके समुदाय के सदस्य दूसरों से कमतर नहीं ठहरेंगे।

कुछ महीने पहले सर्वोच्च न्यायालय ने किन्नरों को तीसरे लिंग के रूप में मान्यता देकर उनके साथ होते रहे भेदभाव को समाप्त करने और उनके सशक्तीकरण के कदम उठाने के निर्देश दिए थे। इस दिशा में कुछ खास नहीं हो पाया है। इसलिए पश्चिम बंगाल का वाकया खुश होने के साथ-साथ यह विचार करने का भी मौका है कि जो समुदाय सामाजिक अलगाव का सबसे ज्यादा दंश झेलता आया है, उसके लिए सामान्य जीवन जीने और प्रगति के रास्ते कैसे खुलें।

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