पश्चिम एशिया में ईरान के खिलाफ अमेरिका-इजराइल के युद्ध की आग की चपेट में अब वैसे देश और लोग भी आने शुरू हो चुके हैं, जो पूरी तरह तटस्थ हैं और वे सिर्फ जरूरी आपूर्ति सुनिश्चित करने की उम्मीद में उस क्षेत्र में मौजूद हैं।

कायदे से आम लोगों की जरूरतों के मद्देनजर अपनी ड्यूटी करने वाले अन्य देशों के लोगों को किसी भी पक्ष की ओर से निशाना नहीं बनाया जाना चाहिए, लेकिन हाल में अमेरिका ने इस मामले में जिस स्तर की लापरवाही और मनमानी दिखाई है, उससे यही लगता है कि उसे सामान्य स्थिति के बहाल होने की कोई फिक्र नहीं है।

वरना क्या वजह है कि पिछले तीन-चार दिनों के भीतर उसने उस क्षेत्र में मौजूद तीन भारतीय जहाजों को निशाना बनाया। उसे यह समझना क्यों जरूरी नहीं लगा कि वह जिन जहाजों पर हमला कर रहा है, वे वाणिज्यिक हैं और किसी भी रूप में इस युद्ध का हिस्सा नहीं हैं?

गौरतलब है कि ओमान तट के पास एक वाणिज्यिक जहाज ‘सेट्टेबेलो’ पर अमेरिका की ओर से किए गए एक हमले में तीन भारतीय नाविकों की जान चली गई। जहाज पर चौबीस लोग सवार थे, जिनमें से इक्कीस को किसी तरह बचा लिया गया। इससे पहले सोमवार को मारिवेक्स नाम के तेल टैंकर पर भी हमला किया गया था, जिसके बाद भारतीय नाविकों ने मदद के लिए आपात संदेश भेजा था।

अब गुरुवार को ओमान के शिनास बंदरगाह के पास एक वाणिज्यिक जहाज एमटी जलवीर पर भी हमला किया गया। हालांकि इन दोनों घटनाओं में सभी नाविकों को बचा लिया गया। सवाल है कि अमेरिका के लिए यह समझना मुश्किल क्यों हो रहा है कि ईरान के साथ जारी उसके युद्ध के क्रम में अगर तटस्थ देशों के वाणिज्यिक जहाजों को निशाना बनाया जाता है, तो अन्य मोर्चों पर कैसी जटिल स्थिति खड़ी हो सकती है।

दुनिया के कई देश पहले ही गंभीर ऊर्जा संकट का सामना कर रहे हैं। जिन वाणिज्यिक जहाजों पर हमला किया गया, वे किसी भी रूप में युद्ध का हिस्सा नहीं थे। मगर बिना किसी मजबूत आधार या उकसावे के अमेरिका ने हमला किया। शायद उसे अब यह सोचने की जरूरत है कि उसके रवैये और जिद का हासिल क्या सामने आ रहा है।

यह बेवजह नहीं है कि भारत ने हमले और उसमें नाविकों के मारे जाने पर अमेरिकी दूतावास के प्रभारी अधिकारी को तलब कर अपनी तीखी आपत्ति दर्ज की। विदेश मंत्रालय ने मध्य-पूर्व में संवेदनशील सुरक्षा हालात पर गहरी चिंता जाहिर करते हुए समुद्र में वाणिज्यिक जहाजों पर हमले को भू-राजनीतिक शत्रुता का नतीजा बताया।

एक ओर ईरान ने होर्मुज जलमार्ग को बाधित किया हुआ है, तो दूसरी ओर अमेरिका ने उस समूचे इलाके में नाकेबंदी कर रखी है। आखिर क्या वजह है कि भारत या किसी देश के वाणिज्यिक जहाजों और नागरिक बुनियादी ढांचों को निशाना बनाने में भी उसे कोई हिचक नहीं हो रही है?

होर्मुज या अन्य समुद्री मार्गों पर निर्बाध आवाजाही बहाल किया जाना इसलिए भी जरूरी है कि सिर्फ उसकी वजह से दुनिया के कई देशों में ऊर्जा और तेल की आपूर्ति बुरी तरह बाधित है और इसका विपरीत असर बड़े दायरे में जनजीवन पर पड़ रहा है।

विडंबना यह है कि जहां युद्ध के बावजूद वाणिज्यिक जहाजों के लिए सुरक्षित रास्ता तैयार किया जाना चाहिए था, वहीं बिना किसी आधार के इन जहाजों पर हमले किए जा रहे हैं। सवाल है कि वर्चस्व की जंग के बीच अमेरिका की नजर में क्या अंतरराष्ट्रीय कानूनों की कोई अहमियत रह गई है?