संपादकीय: सर्दी के सितम

मौसम की अपनी गति होती है और वह अपने चक्र के मुताबिक ही अपना सफर तय करता है। इस लिहाज से इन दिनों अगर ठंड की ठिठुरन हाड़ कंपाने लगी है तो यह अप्रत्याशित नहीं है।

Delhiठंड का कहर। फाइल फोटो।

मगर इसके असर से सामान्य जन-जीवन के प्रभावित होने के हालात पैदा होते हैं तो इसके लिए मुख्य रूप से व्यवस्था में कमियां जिम्मेदार होती हैं। यानी तापमान में गिरावट और ठंड में इजाफे का यह सामान्य दौर है, लेकिन यह जरूर है कि इसके साथ-साथ सर्दी से बचाव वक्त की जरूरत है।

दरअसल, फिलहाल समूची दुनिया के साथ हमारा देश भी महामारी का सामना कर रहा है और इस मौसम में होने वाले सर्दी-जुकाम को कई बार लोग आम दिनों की तरह देख सकते हैं। जबकि संभव है कि इन दिनों होने वाले सर्दी-जुकाम का सिरा गंभीर वजहों से जुड़ा हो।

इसलिए महामारी से बचाव के घोषित उपायों के साथ-साथ फिलहाल सर्दी से बचने की भी सख्त जरूरत है। अगले कुछ दिनों तक ज्यादा सावधानी इसलिए भी बरतनी पड़ सकती है कि पहाड़ी इलाकों में बर्फबारी की वजह से तापमान में तेज गिरावट हो रही है और उसके असर से न केवल हिमाचल या कश्मीर जैसे राज्यों में ठंड बेहद बढ़ गई है, बल्कि उधर से चली बर्फीली हवा अब मैदानी इलाकों को भी कंपाने लगी है।

समूचे उत्तर भारत में तेज होती शीतलहर के बीच दिल्ली में मंगलवार को न्यूनतम तापमान गिर कर 3.6 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच गया और अधिकतम तापमान 18.1 डिग्री सेल्सियस रहा। यह सामान्य से दो डिग्री कम है। इसका मतलब कि शीतलहर का दौर शुरू हो चुका है। गौरतलब है कि मैदानी इलाकों में न्यूनतम तापमान अगर चार डिग्री सेल्सियस से नीचे चला जाता है, तब मौसम विभाग की ओर से शीतलहर की घोषणा कर दी जाती है।

ज्यादा गंभीर शीतलहर की घोषणा तापमान के दो डिग्री सेल्सियस से नीचे जाने पर होती है। अभी मौसम के मिजाज के मद्देनजर कहा जा सकता है कि यह स्थिति कभी भी आ सकती है। मौसम विभाग ने भी यह चेतावनी दी है कि नए साल की पूर्व संध्या पर तापमान और गिर सकता है।

दरअसल, पश्चिमी विक्षोभ की वजह से जम्मू-कश्मीर, हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड में कई इलाकों में बर्फबारी हुई है और पश्चिमी हिमालय से ठंडी हवा मैदानी इलाकों की ओर बह रही है। इसके चलते उत्तर भारत में न्यूनतम तापमान में तेजी से गिरावट दर्ज की गई है।

यानी मौसम के अपने स्वाभाविक रंग में होने के बावजूद यह सावधान रहने और खुद को बचाने का वक्त है। हालांकि एक ओर ऐसे समय में कुछ पहाड़ी राज्यों में बर्फबारी की वजह से पर्यटन का जोर बढ़ता है और इसलिए वहां के लोगों के लिए मुश्किलों के बावजूद यह कुछ आमदनी के लिहाज से उम्मीद का मामला होता है, वहीं मैदानी इलाकों में हाड़ कंपा देने वाली ठंड से बचाव का साधन रखने वाली आबादी के बरक्स एक बड़ी तादाद उनकी होती है, जो कई बार खुले आसमान के नीचे रात गुजारते हैं।

ऐसे लोग बेहद कम संसाधनों के बीच किसी तरह कड़ाके की ठंड के मौसम का सामना करते हैं और वक्त के निकल जाने का इंतजार करते हैं। सरकारों की ओर से जो रैन-बसेरे बनाए जाते हैं, वे और वहां के इंतजाम आमतौर पर नाकाफी होते हैं।

अंदाजा लगाया जा सकता है कि सर्दी का यह मौसम अपने कितने रंग में समाज के किन लोगों के लिए कैसा साबित होता है। ऐसे में सरकारों की यह जिम्मेदारी है कि वे खासतौर पर अभाव के बीच जीने वाले तबकों की राहत के लिए पर्याप्त इंतजाम करें और जाड़े के दिनों को किसी के लिए जानलेवा न बनने दें।

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