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संपादकीयः आफत की आंधी

दस दिन के अंतराल में दूसरा मौका है जब रविवार को देश को भयंकर आंधी-तूफान का सामना करना पड़ा। पूरे उत्तर भारत और दक्षिण के इलाके तेज हवाओं, धूल भरी आंधी, बिजली गिरने, बारिश, ओलावृष्टि और इनसे हुए हादसों का शिकार हुए।

Author May 15, 2018 03:52 am
मौसम विभाग जो पूर्वानुमान व्यक्त करता है, वह आंकड़ों के विश्लेषण पर केंद्रित होता है। पिछली बार भी मौसम विभाग के अनुमान सही साबित नहीं हुए थे।

दस दिन के अंतराल में दूसरा मौका है जब रविवार को देश को भयंकर आंधी-तूफान का सामना करना पड़ा। पूरे उत्तर भारत और दक्षिण के इलाके तेज हवाओं, धूल भरी आंधी, बिजली गिरने, बारिश, ओलावृष्टि और इनसे हुए हादसों का शिकार हुए। इस बार सत्तर से ज्यादा लोग मारे गए, सबसे ज्यादा पचास लोग उत्तर प्रदेश में। घायलों की संख्या और माली नुकसान का तो फिलहाल कोई अनुमान नहीं लग पाया है। पर यह साफ है कि मौसम की इस मार का शिकार गरीब तबका ज्यादा हुआ है। ज्यादातर नुकसान कच्चे घरों के ढहने, छतें उड़ जाने और निर्माणाधीन घरों की दीवारें गिर जाने, पेड़ और खंभे और होर्डिंग उखड़ जाने जैसे हादसों से हुआ।

बिजली गिरने से आंध्र प्रदेश के दो जिलों में नौ किसानों की मौत हो गई। आंधी के दौरान आग लगने की घटनाएं भी बड़ी चुनौती बनती जा रही हैं। इस बार उत्तर प्रदेश के संभल जिले के एक गांव को आग ने लील लिया। दरअसल, कूड़े का ढेर जल रहा था, तभी आंधी चली और आग ने गांव के सारे घरों को लपेटे में ले लिया। दो मई को जब तूफान का कहर बरपा था, तब राजस्थान के धौलपुर जिले के एक गांव में भी ऐसा ही हादसा हुआ था और गांव के सारे घर आग की लपटों में खाक हो गए थे।

इस तरह की आपदाओं से कैसे बचा और निपटा जाए, इस पर सरकार, स्थानीय प्रशासन और खुद लोगों को भी सोचना होगा। देखने में आया है कि आंधी-बारिश में जो हादसे होते हैं, वे लापरवाही और असुरक्षा से ज्यादा होते हैं। मसलन, सड़कों, गलियों रिहायशी बस्तियों में खंभों पर बिजली के तार गुच्छों के रूप में लटके रहते हैं और कई बार तेज हवा या आंधी में ये गिर जाते हैं। ऐसे में करंट से कई लोग मर जाते हैं। इसलिए स्थानीय प्रशासन को सबसे ज्यादा जोर इस तरह के हादसों से बचाव पर देना चाहिए। लेकिन ऐसे मामलों में प्रशासन और जनता दोनों की ओर से लापरवाही देखने को मिलती है।

मौसम विभाग जो पूर्वानुमान व्यक्त करता है, वह आंकड़ों के विश्लेषण पर केंद्रित होता है। पिछली बार भी मौसम विभाग के अनुमान सही साबित नहीं हुए थे। इस बार भी ऐसा हुआ। मौसम विभाग ने पहले कहा था कि घबराने की जरूरत नहीं है, हवाएं पचास किलोमीटर प्रतिघंटा की रफ्तार से चलेंगी। लेकिन हवाओं का वेग सौ किलोमीटर प्रतिघंटा से भी ज्यादा रहा। ऐसे में सवाल उठता है कि आज जब हमारे पास इतने आधुनिक संसाधन हैं, मौसम उपग्रह हैं तो फिर मौसम के बारे में सही अनुमान क्यों नहीं लग पाता है!

हालांकि वैज्ञानिकों का कहना है कि अभी ऐसे साधन विकसित नहीं हुए हैं जो तीन घंटे पहले तक हवा की गति के बारे में जानकारी दे सकें। लेकिन चौंकाने वाली बात यह है कि मौसम में अचानक बदलाव की जानकारी देने वाले जितने डॉप्लर राडार होने चाहिए, उतने हैं नहीं। अगले दो से तीन साल के भीतर देश में तीस राडार लगाए जाने हैं। एक राडार ढाई सौ किलोमीटर के दायरे में मौसम का हाल बताता है। अगर हम मौसम विज्ञान की तकनीकी और संसाधनों से पर्याप्त रूप से लैस हों तो ऐसी आपदाओं से बेहतर ढंग से निपटा जा सकता है।

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