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संपादकीयः इंसाफ के रास्ते

मध्यप्रदेश के मंदसौर में एक बच्ची से बलात्कार के मामले में त्वरित अदालत यानी फास्ट ट्रैक कोर्ट ने जिस शिद्दत के साथ मुकदमे की सुनवाई की और सिर्फ दो महीने के भीतर फैसला सुना दिया, वह एक मिसाल है।

Author August 22, 2018 4:56 AM
प्रतीकात्मक तस्वीर (Photo credit- Indian express)

देश में महिलाओं के खिलाफ बढ़ते अपराधों का एक बड़ा कारण यह भी है कि ऐसी घटनाओं से संबंधित मुकदमों का फैसला आने में कई-कई साल लग जाते हैं। लेकिन मध्यप्रदेश के मंदसौर में एक बच्ची से बलात्कार के मामले में त्वरित अदालत यानी फास्ट ट्रैक कोर्ट ने जिस शिद्दत के साथ मुकदमे की सुनवाई की और सिर्फ दो महीने के भीतर फैसला सुना दिया, वह एक मिसाल है। गौरतलब है कि पिछले कुछ सालों में बलात्कार के लगातार बढ़ते मामलों के मद्देनजर इस अपराध के लिए निर्धारित सजा में और ज्यादा सख्त प्रावधान किए गए। मध्यप्रदेश सहित कई राज्यों में बारह साल से कम उम्र की बच्ची से बलात्कार के दोषी को मृत्युदंड की व्यवस्था की गई है। मंदसौर कांड में दोषी साबित दोनों अपराधियों को अदालत ने मौत की सजा सुनाई। दरअसल, करीब दो महीने पहले मंदसौर में एक स्कूल के बाहर से बच्ची का अपहरण करके दो युवकों ने बलात्कार किया और उसकी हत्या की कोशिश की थी। मुश्किल यह थी कि बच्ची के गायब होने की सूचना थाने में दर्ज कराई गई, लेकिन उसके बारे में किसी को कुछ पता नहीं चल सका। अगले दिन बच्ची बुरी तरह घायल और बेहोश अवस्था में मिली। पुलिस के लिए यह पता लगाना एक चुनौती थी कि बच्ची की यह हालत कैसे हुई।

यह घटना इसलिए भी देश की चिंता में शुमार हुई कि महज आठ साल की बच्ची के साथ हुए अपराध में जिस तरह की क्रूरता की गई थी, उसने लोगों को दुख और आक्रोश से भर दिया था। आमतौर पर किसी भी आपराधिक घटना की जांच-पड़ताल को लेकर पुलिस की लापरवाही या ढीले-ढाले रवैये की आलोचना होती रही है। लेकिन इस मामले में पंद्रह सेकेंड के एक वीडियो के नगण्य-से सुराग के सहारे पुलिस ने वारदात के अगले दिन ही एक आरोपी को गिरफ्तार कर लिया और उसके जरिए बाद में अपराध में शामिल दूसरा युवक भी पकड़ा गया। कम से कम इस घटना को उदाहरण मानें तो बच्ची की तकलीफ की भरपाई में शायद वक्त लगे, लेकिन प्रशासन और डॉक्टरों की संवेदनशीलता की वजह से उसने बेहद भयावह त्रासदी को झेलने के बावजूद अपराधी की पहचान और घटना के साक्ष्यों के बारे में अच्छे से बताया। इसी वजह से पुलिस से लेकर अदालत तक में कानूनी प्रक्रिया संतोषजनक तरीके से आगे बढ़ी और दोषियों को सजा सुनाई जा सकी।

यौन हिंसा और खासकर बलात्कार एक ऐसा अपराध है जिसकी रिपोर्ट पुलिस में कम दर्ज कराई जाती है। लेकिन महिलाओं के खिलाफ अपराधों और खासतौर पर यौन हिंसा से जुड़े मामलों में लंबे समय तक चलने वाली जटिल कानूनी प्रक्रिया को न्याय में एक बड़ी बाधा के रूप में देखा जाता रहा है। इसकी वजह से सबूत धुंधले पड़ सकते हैं, गवाहों की स्थिति अस्थिर हो सकती है और कई बार पीड़ित के सामने भी मुकदमे से पीछे हट जाने की नौबत आ जाती है। सच यह है कि साक्ष्यों की उपलब्धता से लेकर अपराध साबित करने की प्रक्रिया इतनी पेचीदा है कि कई बार सदमे से गुजरती पीड़िता खुद को बेहद लाचार महसूस करती है। इसका सीधा असर मामले के फैसले पर पड़ता है। बलात्कार जैसे जघन्य अपराध में दोषसिद्धि की दर महज पच्चीस फीसद के आसपास है तो उसके पीछे एक बड़ा कारण यह भी है। फैसले में देरी को यों भी इंसाफ नहीं मिलने की तरह देखा जाता है। इस लिहाज से देखें तो अदालत के इस फैसले की सबसे बड़ी खासियत यह है कि जितने कम समय में इसकी सुनवाई पूरी हुई, वह न केवल बलात्कार जैसे अपराध के संदर्भ में, बल्कि दूसरे मुकदमों के लिहाज से भी बेहद अहम है।

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