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बहा जात है पानी

बांधों में जल भंडारण पहाड़ी नदियों और बरसात के पानी से होता है। उस जल को एक तय सीमा के बाद सिंचाई, कारखानों और पेयजल के रूप में उपयोग के लिए छोड़ा जाता है। इन नदियों से इकट्ठा होने वाले पानी को लेकर राज्यों के बीच करार है।

Author May 20, 2019 2:42 AM
देश के अनेक हिस्सों से जल संकट की खबरें सामने आना शुरू हो गई हैं।

गरमी के मौसम में देश के लगभग सभी इलाकों में जल संकट गहरा जाता है। कई जगहों पर पीने के पानी के लिए भी लोगों को काफी जद्दोजहद करनी पड़ती है। हर साल इस समस्या से पार पाने के उपायों पर विचार करने का भरोसा जगाया जाता है, मगर हकीकत यही है कि स्थिति सुधरने के बजाय बिगड़ती ही गई है। अब देश के बांधों में जल भंडारण का स्तर चिंताजनक स्तर तक नीचे आ गया है। इसके मद्देनजर केंद्रीय जल आयोग ने महाराष्ट्र, गुजरात, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना और तमिलनाडु सरकारों को सलाह दी है कि वे पानी का समझदारी से उपयोग करें और जब तक इन बांधों में जल भंडारण संतोषजनक स्तर पर नहीं पहुंच जाता, तब तक केवल पेयजल के लिए इसका उपयोग किया जाए। इन राज्यों में ऐसे इक्यानबे बांध हैं, जिनके जरिए पीने के पानी और सिंचाई आदि के लिए आपूर्ति की जाती है। इन बांधों की निगरानी केंद्रीय जल आयोग करता है। देखना है, राज्य सरकारें जल आयोग की सलाह पर कितना अमल करती हैं।

बांधों में जल भंडारण पहाड़ी नदियों और बरसात के पानी से होता है। उस जल को एक तय सीमा के बाद सिंचाई, कारखानों और पेयजल के रूप में उपयोग के लिए छोड़ा जाता है। इन नदियों से इकट्ठा होने वाले पानी को लेकर राज्यों के बीच करार है। सबका हिस्सा तय है। पर जब जल संकट गहराता है, तो कई बार राज्यों के बीच तनातनी की स्थिति भी बन जाती है। समुचित पानी न मिल पाने के कारण किसान आंदोलन पर उतर आते हैं। इन सबके मद्देनजर किसी अप्रिय विवाद से बचने के लिए बांधों से अतिरिक्त पानी छोड़ दिया जाता है। इस तरह बांधों में पानी का स्तर नीचे चला जाता है। फिर कई बार मानसून ठीक न रहने, नदियों के रास्तों में अवरोध आ जाने या बीच में ही उनका पानी रोक लिए जाने की वजह से भी बांधों के जल भंडारण पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। पर इन कारणों के अलावा सबसे गंभीर कारण है, पानी का अतार्किक उपयोग। इस मामले में समुचित नियंत्रण न होने के कारण पानी का बहुत सारा हिस्सा तय क्षेत्रों को मिलने के बजाय व्यावसायिक-व्यापारिक हितों की भेंट चढ़ जाता है।

नदियों और बांधों के जल स्तर में गिरावट की कुछ वजहें साफ हैं। छिपी बात नहीं है कि जिस तेजी से बड़े कल-कारखानों को बढ़ावा दिया जा रहा है, उसी गति से उनमें पानी की खपत भी बढ़ रही है। आज स्थिति यह है कि जो पानी शहरी आबादी को पेयजल के रूप में और किसानों को सिंचाई के लिए मिलना चाहिए, वह चीनी मिलों, शीतल पेय या शराब बनाने वाले कारखानों और बोतलबंद पानी बनाने वाली कंपनियों को दे दिया जाता है। पहाड़ी इलाकों से गुजरने वाली कई नदियों में सीधे पाईप डाल कर बोतलबंद पानी के लिए जल खींच लिया जाता है। इस तरह न सिर्फ पेयजल की आपूर्ति बाधित होती है, बल्कि बांधों के जल स्तर को बनाए रखने में परेशानी पैदा होती है, क्योंकि कारोबारी लोगों का दबाव इन बांधों पर बना रहता है। गरमी में वैसे ही पानी की खपत बढ़ जाती है, पेयजल की आपूर्ति का दबाव रहता है, पर कारखानों को दिए जाने वाले पानी की मात्रा में कटौती नहीं की जाती। इसकी वजह से बांधों का जल स्तर गिरता है। इसे संतुलित किए बिना समस्या का समाधान संभव नहीं होगा।

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