युद्ध मानव सभ्यता की सबसे बड़ी त्रासदियों में से एक है। इतिहास गवाह है कि किसी भी युद्ध ने समस्याओं का स्थायी समाधान करने के बजाय नई जटिलताओं को जन्म दिया है। अपनी जीत का डंका बजाने वाला देश भी वास्तव में बहुत कुछ खो देता है। युद्ध के परिणाम जान-माल की भारी क्षति, आर्थिक बर्बादी, विस्थापन और सामाजिक अस्थिरता के रूप में सामने आते हैं।

यह केवल दो देशों या दो पक्षों के बीच सीमित नहीं रहता, बल्कि इसका असर सीमाओं को पार कर अर्थव्यवस्था, व्यापार, ऊर्जा और खाद्य सुरक्षा के लिए गंभीर चुनौतियां पैदा करता है। रूस-यूक्रेन और पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष इसके उदाहरण हैं। इनसे बनी परिस्थितियों से पता चलता है कि आज की परस्पर जुड़ी हुई वैश्विक व्यवस्था में किसी एक क्षेत्र की अस्थिरता का असर पूरी दुनिया पर पड़ सकता है।

भारत हमेशा वैश्विक शांति का समर्थक रहा है और युद्ध के बजाय महात्मा बुद्ध के मार्ग पर चलने का संदेश देता रहा है। इसी प्रतिबद्धता को दर्शाते हुए किर्गिस्तान के बिश्केक में शंघाई सहयोग संगठन के शिखर सम्मेलन के मौके पर रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के साथ बैठक में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अंतहीन युद्ध के बजाय इसके अंत की ओर बढ़ने की वकालत की।

गौरतलब है कि पिछले करीब साढ़े चार वर्षों से जारी रूस-यूक्रेन युद्ध का सबसे बड़ा प्रभाव ऊर्जा और खाद्य सुरक्षा पर पड़ा है। रूस दुनिया के प्रमुख तेल, गैस और उर्वरक उत्पादक देशों में से एक है, जबकि यूक्रेन गेहूं, मक्का और सूरजमुखी जैसे कृषि उत्पादों का महत्त्वपूर्ण निर्यातक रहा है।

मगर युद्ध के कारण इन वस्तुओं का उत्पादन, परिवहन और निर्यात प्रभावित हो रहा है। काला सागर के रास्ते अनाज की आपूर्ति में रुकावट ने कई देशों में आवश्यक वस्तुओं की कीमतों और खाद्य सुरक्षा को लेकर चिंता बढ़ाई है। पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष ने इस संकट को और गंभीर बना दिया है। यह क्षेत्र ऊर्जा और अंतरराष्ट्रीय व्यापार के लिए महत्त्वपूर्ण है। होर्मुज जलमार्ग को बंद किए जाने से तेल और गैस की वैश्विक आपूर्ति शृंखला बाधित हुई है, जिससे भारत समेत कई देशों को ऊर्जा संकट का सामना करना पड़ रहा है।

संघर्ष के इन मोर्चों से समुद्री मार्गों में जोखिम बढ़ा है और जहाजों के लंबे वैकल्पिक रास्ते अपनाने से माल ढुलाई की लागत भी बढ़ी है, जिसका सीधा असर आम उपभोक्ताओं पर पड़ा है। ऐसे में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का यह संदेश और भी महत्त्वपूर्ण हो जाता है कि युद्धकाल का हर दिन मानवता को पीछे ले जाता है, जबकि शांति की दिशा में उठाया गया हर कदम नई आशा, उत्साह और समाधान की ओर ले जाता है।

प्रधानमंत्री ने यह भी दोहराया कि भारत अपनी ओर से रूस-यूक्रेन और पश्चिम एशिया में संघर्षों को समाप्त करने के लिए हर संभव एवं जरूरी कदम उठाने को तैयार है, क्योंकि इसका वैश्विक समुदाय पर बहुत गहरा असर पड़ रहा है। इन संघर्षों के बहुआयामी प्रभाव पर नजर डालें, तो इनसे विश्व की भू-राजनीति में भी हलचल पैदा हुई है।

अमेरिका, यूरोप, रूस, चीन और पश्चिम एशिया के देशों के बीच संबंधों में नए समीकरण बन रहे हैं। हालांकि, भारत ने रूस और पश्चिमी देशों के साथ अपने संबंधों में संतुलन बनाए रखा है तथा वह अपने राष्ट्रीय हितों के अनुरूप विदेश नीति तय करने के लिए प्रतिबद्ध है। आज विश्व समुदाय के सामने सबसे बड़ी आवश्यकता संघर्ष की नहीं, बल्कि संवाद, कूटनीति और सहयोग को मजबूत करने की है।

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