निर्वाचन आयोग की ओर से मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण को लेकर उठ रहे सवालों का सिलसिला थम नहीं रहा है। बिहार से शुरू हुआ विवाद उत्तर प्रदेश से होकर अब पश्चिम बंगाल में केंद्रित हो गया है। पुनरीक्षण प्रक्रिया का मकसद मतदाता सूची से अपात्र लोगों को बाहर करना है, जिनमें स्थान बदलने वाले नागरिक या जिनकी मौत हो चुकी है या फिर गलत तरीके से नाम दर्ज कराने वाले लोग शामिल हो सकते हैं। चुनाव में शुचिता सुनिश्चित करने के लिए इस कवायद को जरूरी माना गया है और इस पर किसी को आपत्ति नहीं होगी, मगर इसमें सबसे महत्त्वपूर्ण पहलू है पारदर्शिता और निष्पक्षता का।

विभिन्न राज्यों में इस प्रक्रिया के तहत मसविदा मतदाता सूची से जितनी बड़ी संख्या में लोगों के नाम बाहर होने के दावे किए जा रहे हैं, उससे आम नागरिकों के मन में कई तरह की आशंकाएं पैदा हो गई हैं। इससे संबंधित मामले में पश्चिम बंगाल सरकार ने बुधवार को सर्वोच्च न्यायालय में अपना पक्ष रखते हुए आरोप लगाया कि राज्य के लोगों के अधिकारों का हनन हो रहा है। इस पर शीर्ष अदालत ने कहा कि हर समस्या का समाधान होता है और हमें यह सुनिश्चित करना होगा कि कोई भी पात्र व्यक्ति मताधिकार से वंचित न रहे।

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गौरतलब है कि पुनरीक्षण की प्रक्रिया के दौरान बड़ी संख्या में ऐसी शिकायतें सामने आई हैं कि नागरिकों के नाम मनमाने तरीके से मतदाता सूची से बाहर कर दिए गए और उन्हें इस संबंध में कारणों की जानकारी भी नहीं दी गई। ऐसे में निर्वाचन आयोग की इस प्रक्रिया में मतदाता सूची से बाहर होने वाले लोगों को समय पर सूचित करने और उन्हें अपनी पात्रता साबित करने के पर्याप्त अवसर देने को लेकर सवाल उठना स्वाभाविक है।

जाहिर है, अगर पुनरीक्षण को निष्पक्ष और पारदर्शी बनाने को प्राथमिकता दी जाती, तो संभवत: अनावश्यक विवाद खड़े नहीं होते। इससे पहले भी सुप्रीम कोर्ट ने पश्चिम बंगाल में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण के संदर्भ में स्पष्ट निर्देश दिया था कि इस पूरी प्रक्रिया में तार्किक विसंगतियों की श्रेणी में रखे गए मतदाताओं का सत्यापन पारदर्शी ढंग से होना चाहिए, ताकि इससे नागरिकों को किसी भी तरह की असुविधा या तनाव न हो।

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पश्चिम बंगाल सरकार ने सर्वोच्च न्यायालय में दलील दी कि निर्वाचन आयोग को तार्किक विसंगति सूची में नामों का उल्लेख करने के कारणों को तत्काल सार्वजनिक करना चाहिए, ताकि संबंधित व्यक्ति यह जान सके कि गड़बड़ कहां हुआ है और उसमें अपेक्षित सुधार किया जा सके। दावा किया जा रहा है कि राज्य में नाम, उपनाम या आयु में गड़बड़ी को लेकर अब तक 1.36 करोड़ लोगों को तार्किक विसंगतियों के उल्लंघन के लिए नोटिस जारी किए जा चुके हैं।

इस पर शीर्ष अदालत ने बांग्ला भाषा में बोलचाल का जिक्र करते हुए कहा कि कभी-कभी इसकी वजह से भी नामों की वर्तनी गलत हो जाती है, लेकिन पात्र व्यक्तियों का मतदाता सूची में बने रहना जरूरी है। सवाल है कि विशेष गहन पुनरीक्षण की प्रक्रिया को पारदर्शी बनाने का जो काम निर्वाचन आयोग को खुद अपने स्तर पर शामिल करना चाहिए था, उस संबंध में न्यायालय को निर्देश देने की जरूरत क्यों पड़ रही है। ऐसे में यह सुनिश्चित करने की नितांत आवश्यकता है कि कोई भी पात्र व्यक्ति मतदाता सूची से बाहर न हो, ताकि निर्वाचन आयोग पर आम लोगों का भरोसा पूरी तरह कायम रहे।