वोट की कीमत

किसी भी देश में लोकतंत्र अपने नतीजे में भ्रामक हो सकता है, अगर वहां चुनाव में वोट लेने के लिए राजनीतिक दल मतदाताओं को पैसे या तोहफों का प्रलोभन दें।

सांकेतिक फोटो।

किसी भी देश में लोकतंत्र अपने नतीजे में भ्रामक हो सकता है, अगर वहां चुनाव में वोट लेने के लिए राजनीतिक दल मतदाताओं को पैसे या तोहफों का प्रलोभन दें। लेकिन हमारे यहां ऐसी शिकायतें आम पाई जाती रही हैं, जिसमें किसी पार्टी के उम्मीदवार की ओर से अपने चुनाव क्षेत्र में वोट के बदले अघोषित रूप से धन या कोई अन्य सामान देने का आश्वासन दिया जाता है। लेकिन यह प्रवृत्ति तब ज्यादा अफसोसनाक शक्ल अख्तियार कर लेती है, जब राजनीतिक पार्टियां खुलेआम अपनी चुनावी सभाओं या यहां तक तक घोषणापत्रों तक में मतदाताओं को नकदी हस्तांतरण की पेशकश करने लगती हैं। निश्चित तौर पर यह लोकतंत्र का मजाक बनाने से कम नहीं है और ऐसे मसलों पर चुनाव आयोग को सख्त कार्रवाई करनी चाहिए।

विडंबना यह है कि न तो चुनाव आयोग अपनी ओर से ऐसे मामलों में कोई पहल करता है और न शिकायतों पर ही गंभीरता दिखाई जाती है। इसलिए दिल्ली उच्च न्यायालय ने बुधवार को चुनाव आयोग से बिल्कुल वाजिब सवाल किया है कि उसने उन राजनीतिक दलों के खिलाफ कार्रवाई क्यों नहीं की, जिन्होंने भ्रष्ट आचरण पर दिशानिर्देशों का उल्लंघन किया और अपने घोषणापत्र तक में मतदाताओं को धन देने का प्रस्ताव दिया।

इस मसले पर चुनाव आयोग को नोटिस जारी करने के अलावा दिल्ली हाई कोर्ट ने उस याचिका पर केंद्र सरकार से भी जवाब मांगा है, जिसमें दावा किया गया था कि वोट के बदले नोट का वादा जन प्रतिनिधित्व अधिनियम की धारा 123 का उल्लंघन करता है। जाहिर है, अगर लोकसभा या विधानसभा चुनावों के दौरान किसी उम्मीदवार या पार्टी की ओर से मतदाताओं को यह कहा जाता है कि अगर वे उन्हें वोट दें तो इसके बदले नकदी या तोहफा दिया जाएगा, तो यह कानूनन अपराध है।

लेकिन अमूमन हर चुनाव में ऐसे मामले संज्ञान में आते हैं, जिनमें लोगों का वोट लेने के लिए इस तरह का प्रलोभन परोसा गया। यह वैसी प्रवृत्तियों के अलावा है, जिसमें मतदान के दिन या उससे ठीक पहले मतदाताओं के बीच चोरी-छिपे नकदी या शराब बांट कर उनका वोट हासिल करने की कोशिश की जाती है। यानी पर्दे के पीछे चलने वाली गतिविधियां जहां आम लोगों की दृष्टि में अवैध और गलत होती हैं, वहीं पार्टियों की ओर से सभाओं या घोषणापत्रों में जब इस तरह की पेशकश की जाती है तो उसके प्रति नजरिया बदल जाता है। यह इस अवैध हरकतों की ज्यादा बड़ी जटिलता है।

सवाल है कि अगर चुनाव आयोग की नजर में वोट के बदले नकदी देना या देने की पेशकश करना अवैध है तो शिकायतें आने के बाद वह महज नोटिस जारी करने के बजाय ठोस कार्रवाई करके इस मामले में कोई सख्त संदेश क्यों जारी नहीं करता! यह छिपी बात नहीं है कि चुनावों के दौरान आए दिन सभाओं और भाषणों में वोट हासिल करने के लिए किसी राजनीतिक पार्टी या उनके बड़े नेताओं की ओर से कोई सामान देने या फिर लोगों के खातों में नकदी हस्तांतरण की बातें कही जाती हैं।

ऐसे में मतदाता अपनी समस्याओं या अभाव के व्यापक स्वरूपों और मूल कारणों की अनदेखी करके ऐसी बातों के प्रभाव में आ जा सकता है। यानी एक तरह से यह प्रवृत्ति मतदाताओं के विवेक को बाधित कर उन्हें बरगला कर वोट लेने की कोशिश है। यह ध्यान रखने की जरूरत है कि अगर लोगों को उनके अधिकारों को लेकर जागरूक करने के बजाय प्रलोभन या संजाल परोस कर वोट लेने के चलन पर रोक नहीं लगी, तो इससे न केवल मतदाताओं के बीच भ्रम और अपरिपक्वता का प्रसार होगा, बल्कि इसका विपरीत असर लोकतंत्र और आम लोगों के अधिकारों पर पड़ेगा।

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