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संपादकीय:अभिव्यक्ति पर अंकुश

एक संवेदनशील मसले पर विपक्ष और अन्य सभी पक्षों की ओर से आई आपत्तियों के मद्देनजर केरल सरकार ने लोकतांत्रिक चरित्र का उदाहरण पेश करते हुए अपने कदम वापस खींच लिए। लेकिन सवाल है कि जिस कानून से लोकतंत्र की बुनियाद के रूप में बोलने या अभिव्यक्ति की आजादी बाधित होने की आशंका खड़ी हो रही हो, उसे लागू करने की केरल सरकार को इतनी हड़बड़ी क्यों थी! राष्ट्रीय राजनीति में वामपंथी पार्टियां निजता और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की मुखर पक्षधर रही हैं।

expressionकेरल की सरकार ने अभिव्यक्ति की आजादी मुद्दे पर अपनाा फैसला बदला। फाइल फोटो।

एक ऐसे दौर में जब दुनिया भर में लोकतांत्रिक स्वरों और अभिव्यक्ति की आजादी के लिए आवाजें उठ रही हैं, केरल में पहले से लागू कानूनों में संशोधन करके बोलने के अधिकार पर अंकुश लगाने की कोशिश हैरान करती है। हालांकि इस कदम के साथ ही देश भर में इसके खिलाफ तीखी आवाजें उठीं, उसके बाद राज्य की वाम लोकतांत्रिक मोर्चा की सरकार ने इस अधिनियम को वापस लेने की घोषणा की।

विचित्र यह भी है कि सरकार और मोर्चे में शामिल अन्य दलों तक को इस मसले पर विश्वास में लेने की जरूरत नहीं समझी गई थी। जबकि संशोधित केरल पुलिस अधिनियम के अमल में आने के बाद बोलने की आजादी पर अंकुश लगाए जाने की आशंका खड़ी हो रही थी। शायद यही वजह है कि न केवल राज्य की विपक्षी पार्टियां, बल्कि खुद सत्ताधारी खेमे में शामिल सहयोगी पार्टियों ने भी इस अधिनियम पर आलोचनात्मक रुख अख्तियार किया।

इसका हासिल यह हुआ कि सरकार ने इसे असहमति का सम्मान करने का हवाला देकर वापस लेकर वापस लेने की घोषणा कर दी। गौरतलब है कि राज्य सरकार ने केरल पुलिस अधिनियम में संशोधन करके उसमें एक नया प्रावधान जोड़ा था, जिसके तहत अगर कोई व्यक्ति सोशल मीडिया पर जारी टिप्पणियों के जरिए किसी की मानहानि या अपमान करता तो उसे दस हजार रुपए जुर्माना, तीन साल की कैद या दोनों सजा एक साथ दी जा सकती थी।

सही है कि एक संवेदनशील मसले पर विपक्ष और अन्य सभी पक्षों की ओर से आई आपत्तियों के मद्देनजर केरल सरकार ने लोकतांत्रिक चरित्र का उदाहरण पेश करते हुए अपने कदम वापस खींच लिए। लेकिन सवाल है कि जिस कानून से लोकतंत्र की बुनियाद के रूप में बोलने या अभिव्यक्ति की आजादी बाधित होने की आशंका खड़ी हो रही हो, उसे लागू करने की केरल सरकार को इतनी हड़बड़ी क्यों थी! राष्ट्रीय राजनीति में वामपंथी पार्टियां निजता और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की मुखर पक्षधर रही हैं।

अक्सर दूसरे दलों की सरकारों की ओर जब लोगों पर गैरजरूरी पहरेदारी जैसे कोई नियम-कायदे थोपे जाते हैं, तब वामपंथी पार्टियां जरूरी सवाल उठाती हैं। लेकिन सत्ता में होने पर उसके पैमाने क्यों बदल जाते हैं? इस बात की सफाई केवल यह नहीं हो सकती कि यह प्रावधान केवल महिलाओं और बच्चों को साइबर अपराधों और धमकियों से बचाने के लिए किया गया था और इस पर अन्य पक्षों की ओर से आपत्ति जताए जाने के बाद सरकार ने अपना फैसला बदल लिया।

दरअसल, इस कानून से जुड़े संवेदनशील पहलू पर गौर करना, व्यवहार में उसके असर का ध्यान रखना और अन्य सहयोगियों और विपक्षी पार्टियों से सलाह लेना लोकतांत्रिक प्रक्रिया में पारदर्शिता को सुनिश्चित करता। इसके बजाय सरकार ने मनमर्जी तरीके से इस कानून को थोपना चाहा। यह किसी से छिपा नहीं है कि देश में कई ऐसे कानून अमल में आएं, जिन्हें लागू करते हुए यह आश्वासन दिया गया था कि इससे देश विरोधी गतिविधियों और आतंकवाद को रोकने में मदद मिलेगी। लेकिन व्यवहार में ऐसे कुछ कानूनों के दुरुपयोग पर तीखे सवाल उठे और उन्हें लोकतंत्र, आलोचना, अभिव्यक्ति की आजादी पर हमले और दमन के औजार के तौर पर देखा गया।

इसी के मद्देनजर केरल में अब वापस ले लिए गए संशोधित कानून का इस्तेमाल स्वतंत्र स्वरों और आलोचनाओं के दमन के लिए होने की आशंकाएं जताई जा रही थीं। जबकि आलोचनाओं की मंशा अगर बेवजह अपमानित करना या धमकी देना न हो तो आलोचक स्वर लोकतंत्र को मजबूत करते हैं। बेहतर हो कि आधुनिक और सभ्य होती दुनिया में निजता की सुरक्षा, व्यक्तिगत, सामुदायिक गरिमा सहित लोकतंत्र और अभिव्यक्ति की आजादी के अधिकारों को भी मजबूत किया जाए।

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