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संपादकीय: सरोकार बनाम राजनीति

हाथरस की घटना के बाद पुलिस-प्रशासन का जैसा रवैया दिखा, उससे लोगों के भीतर क्षोभ पैदा हुआ। खासतौर पर पीड़िता की मौत के बाद शव का जिस तरह आनन-फानन में आधी रात को अंतिम संस्कार कर दिया गया और पीड़ित परिवार से किसी के मुलाकात को रोकने के मकसद से गांव की जैसी घेराबंदी की गई, उसने कुछ संदेह पैदा किए।

Hathras Gang-Rape, PM narendra modi, yogi adityanathHathras Gang-Rape: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को दोषियों के खिलाफ कठोरतम कार्रवाई के निर्देश दिये।

उत्तर प्रदेश के हाथरस में एक युवती से हुई बर्बरता ने निश्चित रूप से सभी संवेदनशील लोगों को झकझोर कर रख दिया है। इस अपराध की जो प्रकृति सामने आई, उससे अगर लोगों को सन 2012 में दिल्ली में ‘निर्भया’ से हुई बर्बरता की याद आ रही है और वे आक्रोश से भर जा रहे हैं तो यह स्वाभाविक है। तब भी समाज से लेकर सभी राजनीतिक दलों ने दोषियों को सख्त सजा देने और स्त्रियों की सुरक्षा के पक्ष में एक व्यापक बदलाव के लिए आवाज उठाई थी।

किसी भी जागरूक समाज में आम अवाम और राजनीतिक दलों से ऐसी प्रतिक्रिया की उम्मीद की जाती है, क्योंकि राजनीतिक हस्तक्षेप बड़े और सकारात्मक बदलावों का वाहक बन सकते हैं। एक स्वस्थ लोकतांत्रिक व्यवस्था में जनता और उनकी समस्याओं को आवाज देना और उनके समाधान को लेकर आंदोलन-प्रदर्शन करना राजनीतिक दलों का अधिकार भी है। लेकिन अगर ऐसे अपराधों के बाद उठे जनाक्रोश के बीच राजनीतिक पार्टियां अपनी प्रासंगिकता कायम करने की कोशिश करने लगती हैं, तब कई बार उनके सरोकार को लेकर कुछ सवाल उठते हैं।

दरअसल, हाथरस की घटना के बाद पुलिस-प्रशासन का जैसा रवैया दिखा, उससे लोगों के भीतर क्षोभ पैदा हुआ। खासतौर पर पीड़िता की मौत के बाद शव का जिस तरह आनन-फानन में आधी रात को अंतिम संस्कार कर दिया गया और पीड़ित परिवार से किसी के मुलाकात को रोकने के मकसद से गांव की जैसी घेराबंदी की गई, उसने कुछ संदेह पैदा किए।

निश्चित ही सरकार, पुलिस और प्रशासन का यह रवैया सवालों के घेरे में है और राजनीतिक दलों की प्रतिक्रिया भी लाजिमी है। लेकिन पीड़ित परिवार से मिलने के नाम पर जैसी होड़ शुरू हो गई, उससे भी यह विचित्र स्थिति पैदा हुई है कि क्या यह राजनीति का उचित मौका है!

वहीं पीड़ित परिवार से मिलने जाने वाले नेताओं के प्रति वहां पुलिस जैसे पेश आ रही है और कुछ अवांछित तत्त्व जैसा बर्ताव कर रहे हैं, वह अफसोसनाक है। सोमवार को आम आदमी पार्टी के नेता संजय सिंह पीड़ित परिवार से मिलने गए तो उन पर स्याही फेंक दिया गया। इसी तरह राष्ट्रीय लोक दल के नेता जयंत चौधरी और उनके कार्यकर्ताओं पर पुलिस ने लाठीचार्ज किया।

चंद्रशेखर आजाद और कई दूसरे नेताओं और कार्यकर्ताओं पर वहां नियमों के उल्लंघन के लिए मुकदमा भी किया गया है। लेकिन विडंबना यह है कि वहीं आरोपियों के बचाव के लिए जो पंचायतें की जा रही हैं, जमावड़े हो रहे हैं, पुलिस की मौजूदगी में धमकी भरी भाषा का इस्तेमाल किया जा रहा है और पुलिस उन्हें नहीं रोक पा रही है।

सवाल है कि जिस परिवार की लड़की एक भयावह आपराधिक त्रासदी का शिकार हुई है, अभी वे लोग जिस दुख और पीड़ा से गुजर रहे होंगे, उन सब पर उनके घर के आसपास घटने वाली ऐसी तमाम घटनाओं का कैसा असर पड़ रहा होगा! क्या इस सबसे उनकी पीड़ा को कम किया जा सकेगा या उनकी समस्या का हल किया जा सकेगा? क्या केवल संवेदना और आक्रोश से ऐसे अपराधों पर काबू पाया जा सकता है?

इसके लिए कानूनी स्तर पर जिस तरह की स्पष्ट पहलकदमी और बदलाव के लक्ष्य से सुचिंतित आंदोलन की जरूरत होती है, क्या उसके लिए हमारा समाज कभी स्थिर भाव से सोच पाता है? मुश्किल यह है कि हाथरस जैसी घटना अगर किन्हीं वजहों से सुर्खियों में आ जाती है तब जाकर एक व्यापक सजगता दिखती है। लेकिन यही सजगता अगर समाज के नियमित व्यवहार और सोच का हिस्सा बनती, तब शायद एक ऐसे सभ्य और संवेदनशील समाज बनने की उम्मीद की जा सकती थी, जिसमें स्त्रियों को अपने खिलाफ इस तरह के अपराध की त्रासदी का सामना नहीं करना पड़ता।

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