खेल की दुनिया में योग्यता-अयोग्यता की कसौटियां कई बार क्षमताओं को बाधित करने या फिर नजरअंदाज करने की हद तक चली जाती हैं। जबकि यह संभव है कि किसी खिलाड़ी को मैदान से बाहर करने के लिए जिन नियमों का हवाला जाता है, उनका कोई खास मतलब नहीं होता है। बस कुछ पूर्वाग्रहों की वजह से नियमों को बहाना बना लिया जाता है और एक सक्षम खिलाड़ी से उसके अवसर छीन लिए जाते हैं।

दिल्ली उच्च न्यायालय ने इसी प्रवृत्ति पर टिप्पणी करते हुए भारतीय कुश्ती महासंघ को फटकार लगाई और कहा कि हमारे देश में मां बनना कोई गुनाह नहीं है और कुश्ती महासंघ को बदले की भावना से काम नहीं करना चाहिए। अदालत ने महिला कुश्ती खिलाड़ी विनेश फोगाट को एशियाई खेलों के लिए होने वाली चयन प्रतियोगिता में हिस्सा लेने की मंजूरी दे दी है।

भारतीय महिला पहलवान विनेश फोगाट मां बनने के बाद अब फिर से कुश्ती के मैदान में उतरना चाहती हैं, लेकिन भारतीय कुश्ती महासंघ ने डोपिंग-रोधी नियमों का हवाला देते हुए विनेश फोगाट को 26 जून तक घरेलू प्रतियोगिताओं में खेलने के ‘अयोग्य’ घोषित कर दिया था। दिल्ली हाईकोर्ट ने यह सवाल उठाया कि जब विनेश फोगाट देश की एक स्थापित और शीर्ष स्तर की पहलवान रही हैं, तो नियमों में अचानक बदलाव करके उन्हें खेलने से दूर रखने की कोशिश क्यों की जा रही है!

गौरतलब है कि विनेश फोगाट को भारत की सबसे कामयाब महिला पहलवानों में से एक माना जाता है। 2024 के पेरिस ओलंपिक में एक तकनीकी वजह से उनके करिअर में चुनौती सामने आई थी, लेकिन उससे पार निकल कर उन्होंने आगे का रास्ता देखा। कुछ समय पहले वे मां बनीं और मातृत्व अवकाश की वजह से वे थोड़े वक्त के लिए खेल से दूर रहीं। मगर यह उनके मैदान से बाहर होने का कारण नहीं हो सकता।

दुनिया भर में ऐसे तमाम उदाहरण हैं, जिसमें महिला खिलाड़ियों ने मां बनने के बाद भी खेल के मैदान में बेहतरीन प्रदर्शन किया और उपलब्धियां हासिल कीं। यों यह समय-समय पर साबित होता रहा है कि मातृत्व खेल क्षमताओं में बाधक नहीं है। बेहतर हो कि पूर्वाग्रहों या बदले की भावना के बजाय किसी खिलाड़ी की योग्यता का आकलन खेल में उसके सक्षम होने के आधार पर हो।