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पूर्वग्रह की गाज

नई सरकार का पूर्ववर्ती सरकार की योजनाओं-कार्यक्रमों की समीक्षा कराना और उनमें बदलाव करना कोई नई बात नहीं है। मगर जिस तरह भाजपा की सरकारें पूर्वग्रहग्रस्त होकर अतार्किक ढंग से ऐसा कर रही हैं उस पर उचित ही अंगुलियां उठ रही हैं। इसका ताजा उदाहरण राजस्थान की मंत्रिमंडलीय उपसमिति का दो विश्वविद्यालयों को बंद करने […]

Author March 18, 2015 7:30 PM
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नई सरकार का पूर्ववर्ती सरकार की योजनाओं-कार्यक्रमों की समीक्षा कराना और उनमें बदलाव करना कोई नई बात नहीं है। मगर जिस तरह भाजपा की सरकारें पूर्वग्रहग्रस्त होकर अतार्किक ढंग से ऐसा कर रही हैं उस पर उचित ही अंगुलियां उठ रही हैं। इसका ताजा उदाहरण राजस्थान की मंत्रिमंडलीय उपसमिति का दो विश्वविद्यालयों को बंद करने का सुझाव है। राज्य सरकार ने पूर्ववर्ती कांग्रेस सरकार के अंतिम छह महीनों में हुए कामकाज की समीक्षा के लिए इस उपसमिति का गठन किया था।

इसने अपनी रिपोर्ट में कांग्रेस सरकार के समय खोले गए हरिदेव जोशी पत्रकारिता विश्वविद्यालय और भीमराव आंबेडकर विधि विश्वविद्यालय को बंद करने की सिफारिश की है। इसे लेकर स्वाभाविक ही विरोध शुरू हो गया है। गौरतलब है कि पत्रकारिता विश्वविद्यालय का काम तेजी से चल रहा है। अनेक पाठ्यक्रमों और शोधकार्यों में बहुत-से विद्यार्थी दाखिला ले चुके हैं।

विभिन्न महकमों में शैक्षणिक और गैर-शैक्षणिक कर्मचारियों की नियुक्तियां हो चुकी हैं। ऐसे में विश्वविद्यालय को बंद करने की सिफारिश से विद्यार्थियों और कर्मचारियों के भविष्य को लेकर अनिश्चितता गहरा गई है। हालांकि कहा गया है कि इस विश्वविद्यालय के विद्यार्थियों को जयपुर विश्वविद्यालय के जनसंचार केंद्र से जोड़ दिया जाएगा, मगर वहां की स्थिति पहले ही ठीक न होने के कारण विद्यार्थियों में असंतोष है।

समझना मुश्किल है कि जब राजस्थान सरकार ने उपसमिति को पूर्ववर्ती सरकार के अंतिम छह महीनों के कामकाज की समीक्षा का दायित्व सौंपा था तो उसने करीब सवा साल से कार्य कर रहे पत्रकारिता विश्वविद्यालय को बंद करने की सिफारिश कैसे कर दी। फिर, सवाल है कि जब विश्वविद्यालय की स्थापना विधानसभा में विधेयक पारित करके की गई थी, जिस पर भाजपा के विधायकों ने भी सहमति जताई थी, तो अब उस फैसले को पलटने का क्या औचित्य है?

आज जब निजी विश्वविद्यालयों का जाल तेजी से देश भर में फैलता जा रहा है, निम्न आय वर्ग के विद्यार्थियों के लिए उनमें दाखिला ले पाना कठिन होता गया है, सरकारों पर सार्वजनिक शैक्षणिक संस्थान खोलने का दबाव है। हैरानी की बात है कि राजस्थान सरकार को पहले से काम कर रहे सरकारी विश्वविद्यालयों को और बेहतर संसाधन उपलब्ध कराने के बजाय उन्हें बंद करने के रास्ते तलाशने का विचार कैसे आया। पत्रकारिता और कानून का क्षेत्र जिस ढंग से निरंतर फैल रहा है, नई स्थितियों के मुताबिक इनकी पढ़ाई-लिखाई में नवाचार की अपेक्षा की जाती है। कई राज्यों में कानून और पत्रकारिता के स्वतंत्र विश्वविद्यालय खुल भी रहे हैं। खुद भाजपा शासित मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ में ऐसे विश्वविद्यालय खुल चुके हैं। मगर विचित्र है कि राजस्थान सरकार को ये अप्रासंगिक लग रहे हैं।

बढ़ती जरूरतों के मद्देनजर नए शैक्षणिक संस्थान खोलना राज्य सरकारों की जिम्मेदारी है। मगर वे यह दायित्व निजी संस्थानों को सौंप कर निश्चिंत हो जाना चाहती हैं। इसके पीछे उनका तर्क आमतौर पर पैसे की तंगी का होता है। लेकिन राजस्थान में जो दो विश्वविद्यालय पहले ही खोले जा चुके थे उन्हें बंद करने का विचार वित्तीय कारण से नहीं हो सकता।

इसमें अगर विपक्षी दल और शिक्षाविद सरकार का पूर्वग्रह और पहले से लागू शैक्षणिक नीति को बदलने की मंशा देख रहे हैं तो उसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। कई शैक्षणिक और शोध संस्थानों के प्रमुखों को हटाने और स्कूली पाठ्यक्रमों में बदलाव की केंद्र और भाजपा-शासित कुछ राज्य सरकारों की कोशिशों से यह जाहिर भी हो चुका है। अगर कोई सरकार अपने पूर्वग्रहों के चलते किसी संस्थान का गला घोंटने और विद्यार्थियों के भविष्य से खिलवाड़ की पहल करती है, तो इसे चरम शैक्षिक संवेदनहीनता ही कहा जाएगा।

 

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