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संपादकीयः विश्वास की बलि

अमेरिका को पेरिस जलवायु समझौते से अलग करने का राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का फैसला इस समझौते के लिए एक बड़ा झटका तो है ही, खुद अमेरिका की साख को इससे काफी नुकसान पहुंचेगा।

Author June 3, 2017 02:32 am
अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप (File Photo)

अमेरिका को पेरिस जलवायु समझौते से अलग करने का राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का फैसला इस समझौते के लिए एक बड़ा झटका तो है ही, खुद अमेरिका की साख को इससे काफी नुकसान पहुंचेगा। देशों के भीतर सरकारें बदलती रहती हैं, पर वैश्विक प्रतिज्ञाएं और अंतरराष्ट्रीय संधियां उनसे प्रभावित नहीं होतीं। लेकिन लगता है, ट्रंप वैश्विक जिम्मेदारी और जवाबदेही की परवाह नहीं करते। यों पर्यावरण संरक्षण के मामले में अमेरिका का रवैया शुरू से आलोचना का विषय रहा है। दुनिया का सबसे बड़ा कार्बन उत्सर्जक देश होने के बावजूद वह क्योतो संधि में शामिल नहीं हुआ। बाद की जलवायु वार्ताओं और समझौतों में भी उसका रुख जिम्मेदारी से भागने और रोड़े अटकाने का ही रहा। लेकिन पेरिस जलवायु समझौते में तो अमेरिका ने बढ़-चढ़ कर भूमिका निभाई थी। तब के राष्ट्रपति ओबामा लंबे समय से अपने अलग रुख पर डटे रहे चीन और भारत को राजी करने के साथ ही समझौते में शामिल हुए 198 देशों में से अधिकतर को सहमति के मुकाम तक ले आए।

इस तरह जिस समझौते का सबसे ज्यादा श्रेय अमेरिका को जाता है, ट्रंप ने उसी से पल्ला झाड़ लिया है। मानो उन्हें इस बात की तनिक परवाह न हो कि दुनिया फिर अमेरिका पर भरोसा कैसे करेगी। यह सही है कि ट्रंप ने अपने चुनाव अभियान के दौरान अंतरराष्ट्रीय जलवायु समझौते से अलग हो जाने का वादा किया था। इस लिहाज से देखें तो उन्होंने अपना एक चुनावी वायदा पूरा किया है। लेकिन उन्होंने अमेरिकापर पूरी दुनिया के विश्वास का बलि चढ़ा दी है। मजे की बात यह है कि ट्रंप के इस फैसले से खुद उनकी पार्टी के कई सांसद, यहां तक कि कई मंत्री और उनके बेटी-दामाद तक खुश नहीं हैं। इसलिए ट्रंप का यह फैसला अमेरिका के भीतर भी तीखे विवाद का विषय बनने जा रहा है। ट्रंप ने पेरिस जलवायु समझौते से यह कह कर किनारा किया है कि यह समझौता अमेरिका के प्रति अन्याय है, यह चीन और भारत की तरफ झुका हुआ है। लेकिन क्योतो संधि के समय से ही उन देशों की ज्यादा जिम्मेदारी मानने का सिद्धांत चला आ रहा है जिन्होंने ऐतिहासिक रूप से ज्यादा कार्बन उत्सर्जन किया है। अलबत्ता चीन कुछ साल पहले अमेरिका को पीछे छोड़ कर सबसे बड़ा कार्बन उत्सर्जक हो गया। लेकिन आंकड़े बताते हैं कि 2015 में अमेरिका का कार्बन उत्सर्जन पूरे यूरोप से अधिक रहा।

भारत की आबादी अमेरिका से चार गुना ज्यादा है, फिर भी भारत का कार्बन उत्सर्जन अमेरिका के आधे से भी कम है। लेकिन ट्रंप ऐसे शख्स हैं जो न तथ्यों की फिक्र करते हैं न मूल्यों की। उन्हें बस अपने कंजरवेटिव समर्थन-आधार की चिंता है। पर इस चक्कर में वे अमेरिका को किधर ले जा रहे हैं? अमेरिका दुनिया का सिरमौर है, पर इस बुलंदी में यूरोप का साथ हासिल होने का बड़ा हाथ रहा है। पर जैसे ब्रेक्जिट ने यूरोप को स्तब्ध कर दिया, वैसे ही ट्रंप के रवैए से भी यूरोप हिल गया है। पेरिस जलवायु समझौते से अमेरिका के अलग होने के बाद, जलवायु कोष का लक्ष्य पूरा करना काफी कठिन होगा। पर उससे बड़ा संकट आपसी भरोसे का है जो ट्रंप ने पैदा किया है।

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